अब बात करें भाजपा के स्पेशियलाइज्ड सब्जेक्ट की- हिंदू राष्ट्रवाद। कई विश्लेषकों का मत है कि हिंदुत्व के मुद्दे में चुनाव जिताने की क्षमता नहीं है। हिंदुत्व का मुद्दा भारतीय जनता पार्टी को पूरे भारत की जनता का प्रतिनिधि बनने में बाधा है। ये वही विश्लेषक हैं, जो हमेशा मुस्लिमों को एक वोट वर्ग मानते हुए उसे पाने की जुगत में लगी तमाम पार्टियों की तुष्टिकरण नीतियों की सहज रूप से चर्चा करते हैं। लेकिन हिंदुओं के हित में बोले गए शब्द इन्हें इन्क्लूजिव पॉलिटिक्स की राह में सबसे बड़ी बाधा लगते हैं। खैर, यहां मुद्दा ये विश्लेषक नहीं हैं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी है। अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे को अपनी रीढ़ बना कर सत्ता के करीब पहुंची भाजपा के भीतर हिंदुत्व को लेकर भ्रम कोई नई बात नहीं है। यह भ्रम उसी वक्त से शुरू हो गया था, जब राम मंदिर आंदोलन थकने लगा था। यह कहा जाने लगा कि हिंदुत्व का मुद्दा लंबे समय तक वोट नहीं खींच सकता।
पके बालों वाले खांटी विचारकों और थिंक टैंकों से भरी भाजपा और संघ में कोई भी इसे भ्रम का निदान नहीं खोज सका। दरअसल हिंदू राष्ट्रवाद और उग्र हिंदूवादी आंदोलनों का फर्क समझने की जरूरत है। हिंदू राष्ट्रवाद भारत का एक चिरंतन सत्य है, जबकि हिंदू आंदोलन किसी खास घटना की तात्कालिक प्रतिक्रिया। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि भारत में अपने 25 वर्षों के स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी ने 4-5 बड़े आंदोलन किए। लेकिन इन आंदोलनों की एक खास अवधि रही। क्योंकि एक महान जन नेता होने के नाते गांधी को पता था कि जनांदोलनों को अनिश्चितकाल तक नहीं चलाया जा सकता। इसीलिए जब-जब उन्होंने अपने आंदोलनों को जनता से दूर होते देखा, बिना आलोचकों की परवाह किए, उन्हें वापस ले लिया। चौरी-चौरा कांड के बाद वापस लिया गया असहयोग आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। गांधी के आंदोलन वापस लेने का मतलब कभी भी यह नहीं था कि उन्हें जनता में आज़ादी की प्रतिबद्धता को लेकर संदेह कोई संदेह पैदा हो गया। दरअसल गांधी जानते थे कि आम जनता की सहनशीलता और जुझारूपन की एक सीमा होती है। एक महान नेता वही होता है, जो उस सीमा को पहचान कर उसके टूटने से ठीक पहले आंदोलन समाप्त कर दे, नहीं तो प्रतिद्वंद्वी पक्ष को उसकी कमजोरी का आभास हो जाता है। लेकिन फिर महान नेता का काम यहीं खत्म नहीं हो जाता है। वह उस आंदोलन की मुख्य धारा को जीवित ऱखने के लिए दूसरे सामाजिक-आर्थिक माध्यमों का सहारा लेता है, जैसा कि गांधी जी ने आज़ादी की मुख्य धारा को जीवित रखने के लिए खादी, स्वदेशी, महिला शिक्षा, छुआछूत निषेध जैसे माध्यमों से लिया।
लेकिन भाजपा के ज्ञानी रणनीतिकार इस सिद्धांत को या तो समझ नहीं पाए या फिर सत्ता भोग की लिप्सा ने उनकी समझदारी पर पर्दा डाल दिया। राम मंदिर आंदोलन से जगी हिंदू राष्ट्रवाद की धारा की अनंतकाल तक के लिए सत्ता प्राप्ति का माध्यम मान लिया गया। हर बार किसी चुनाव के समय अयोध्या का मुद्दा उछाल कर भाजपा ने न केवल राम मंदिर मुद्दे पर अपनी विश्वसनीयता खो दी, बल्कि हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी के तौर पर बनी उसकी पहचान पर भी धब्बे लगने लगे। पार्टी ने अपनी अगुवाई वाले 6 साल के शासन में मदरसों को मुख्यधारा में शामिल करने, बंगलादेशी घुसपैठियों को बाहर करने और आतंकवाद की रीढ़ तोड़ने से संबंधित कोई ऐसा कदम नहीं उठाया, जिसके लिए वह उसे जनादेश मिला था। यहां तक कि राम मंदिर मुद्दे पर फास्ट ट्रैक अदालत का गठन कर और दैनिक सुनवाई करा कर वह कम से कम जनता को यह संदेश तो दे ही सकती थी कि वह इस मसले के समाधान के लिए गंभीर है। 1991 से 2009 तक भारतीय जनता पार्टी ने केवल आंदोलनों की राजनीति करने की कोशिश की क्योंकि उसके नीतिकारों को भरोसा था कि आंदोलन से पैदा उन्माद ही उन्हें सत्ता में ला सकता है। दो आंदोलनों के बीच उसकी मुख्य धारा को पोषित करने वाले सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रमों से न तो कभी उसका कोई सरोकार रहा और न ही उन्हें चलाने की इच्छा शक्ति।
यही कारण है कि चुनाव परिणाम आने के ठीक एक महीने बाद भी भाजपा नेता हार के असली कारणों की मीमांसा करने के बजाए सरफुटौव्वल में लगे हैं। हिंदुत्व को गालियां दी जा रही हैं और हार का ठीकरा उसी के सिर फोड़ा जा रहा है। इन्हें कौन समझाए कि आंदोलनों के बल पर मिली सत्ता की नींव बहुत कमजोर होती है। उसे मजबूत बनाने के लिए सालों की मेहनत और योजनाबद्ध कार्यक्रम की जरूरत होती है। आडवाणी की एक रथ यात्रा ने 6 साल की सत्ता तो दे दी, लेकिन वह ज़मीनी मेहनत और योजनाबद्ध कार्यक्रम कहां है, जिनसे इस सत्ता की नींव मजबूत होनी थी।
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