Thursday, June 18, 2009

भाजपाई हार के चीथड़े बीनने की एक और कोशिश - 2

अब बात करें भाजपा के स्पेशियलाइज्ड सब्जेक्ट की- हिंदू राष्ट्रवाद। कई विश्लेषकों का मत है कि हिंदुत्व के मुद्दे में चुनाव जिताने की क्षमता नहीं है। हिंदुत्व का मुद्दा भारतीय जनता पार्टी को पूरे भारत की जनता का प्रतिनिधि बनने में बाधा है। ये वही विश्लेषक हैं, जो हमेशा मुस्लिमों को एक वोट वर्ग मानते हुए उसे पाने की जुगत में लगी तमाम पार्टियों की तुष्टिकरण नीतियों की सहज रूप से चर्चा करते हैं। लेकिन हिंदुओं के हित में बोले गए शब्द इन्हें इन्क्लूजिव पॉलिटिक्स की राह में सबसे बड़ी बाधा लगते हैं। खैर, यहां मुद्दा ये विश्लेषक नहीं हैं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी है। अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे को अपनी रीढ़ बना कर सत्ता के करीब पहुंची भाजपा के भीतर हिंदुत्व को लेकर भ्रम कोई नई बात नहीं है। यह भ्रम उसी वक्त से शुरू हो गया था, जब राम मंदिर आंदोलन थकने लगा था। यह कहा जाने लगा कि हिंदुत्व का मुद्दा लंबे समय तक वोट नहीं खींच सकता।

पके बालों वाले खांटी विचारकों और थिंक टैंकों से भरी भाजपा और संघ में कोई भी इसे भ्रम का निदान नहीं खोज सका। दरअसल हिंदू राष्ट्रवाद और उग्र हिंदूवादी आंदोलनों का फर्क समझने की जरूरत है। हिंदू राष्ट्रवाद भारत का एक चिरंतन सत्य है, जबकि हिंदू आंदोलन किसी खास घटना की तात्कालिक प्रतिक्रिया। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि भारत में अपने 25 वर्षों के स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी ने 4-5 बड़े आंदोलन किए। लेकिन इन आंदोलनों की एक खास अवधि रही। क्योंकि एक महान जन नेता होने के नाते गांधी को पता था कि जनांदोलनों को अनिश्चितकाल तक नहीं चलाया जा सकता। इसीलिए जब-जब उन्होंने अपने आंदोलनों को जनता से दूर होते देखा, बिना आलोचकों की परवाह किए, उन्हें वापस ले लिया। चौरी-चौरा कांड के बाद वापस लिया गया असहयोग आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। गांधी के आंदोलन वापस लेने का मतलब कभी भी यह नहीं था कि उन्हें जनता में आज़ादी की प्रतिबद्धता को लेकर संदेह कोई संदेह पैदा हो गया। दरअसल गांधी जानते थे कि आम जनता की सहनशीलता और जुझारूपन की एक सीमा होती है। एक महान नेता वही होता है, जो उस सीमा को पहचान कर उसके टूटने से ठीक पहले आंदोलन समाप्त कर दे, नहीं तो प्रतिद्वंद्वी पक्ष को उसकी कमजोरी का आभास हो जाता है। लेकिन फिर महान नेता का काम यहीं खत्म नहीं हो जाता है। वह उस आंदोलन की मुख्य धारा को जीवित ऱखने के लिए दूसरे सामाजिक-आर्थिक माध्यमों का सहारा लेता है, जैसा कि गांधी जी ने आज़ादी की मुख्य धारा को जीवित रखने के लिए खादी, स्वदेशी, महिला शिक्षा, छुआछूत निषेध जैसे माध्यमों से लिया।

लेकिन भाजपा के ज्ञानी रणनीतिकार इस सिद्धांत को या तो समझ नहीं पाए या फिर सत्ता भोग की लिप्सा ने उनकी समझदारी पर पर्दा डाल दिया। राम मंदिर आंदोलन से जगी हिंदू राष्ट्रवाद की धारा की अनंतकाल तक के लिए सत्ता प्राप्ति का माध्यम मान लिया गया। हर बार किसी चुनाव के समय अयोध्या का मुद्दा उछाल कर भाजपा ने न केवल राम मंदिर मुद्दे पर अपनी विश्वसनीयता खो दी, बल्कि हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी के तौर पर बनी उसकी पहचान पर भी धब्बे लगने लगे। पार्टी ने अपनी अगुवाई वाले 6 साल के शासन में मदरसों को मुख्यधारा में शामिल करने, बंगलादेशी घुसपैठियों को बाहर करने और आतंकवाद की रीढ़ तोड़ने से संबंधित कोई ऐसा कदम नहीं उठाया, जिसके लिए वह उसे जनादेश मिला था। यहां तक कि राम मंदिर मुद्दे पर फास्ट ट्रैक अदालत का गठन कर और दैनिक सुनवाई करा कर वह कम से कम जनता को यह संदेश तो दे ही सकती थी कि वह इस मसले के समाधान के लिए गंभीर है। 1991 से 2009 तक भारतीय जनता पार्टी ने केवल आंदोलनों की राजनीति करने की कोशिश की क्योंकि उसके नीतिकारों को भरोसा था कि आंदोलन से पैदा उन्माद ही उन्हें सत्ता में ला सकता है। दो आंदोलनों के बीच उसकी मुख्य धारा को पोषित करने वाले सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रमों से न तो कभी उसका कोई सरोकार रहा और न ही उन्हें चलाने की इच्छा शक्ति।

यही कारण है कि चुनाव परिणाम आने के ठीक एक महीने बाद भी भाजपा नेता हार के असली कारणों की मीमांसा करने के बजाए सरफुटौव्वल में लगे हैं। हिंदुत्व को गालियां दी जा रही हैं और हार का ठीकरा उसी के सिर फोड़ा जा रहा है। इन्हें कौन समझाए कि आंदोलनों के बल पर मिली सत्ता की नींव बहुत कमजोर होती है। उसे मजबूत बनाने के लिए सालों की मेहनत और योजनाबद्ध कार्यक्रम की जरूरत होती है। आडवाणी की एक रथ यात्रा ने 6 साल की सत्ता तो दे दी, लेकिन वह ज़मीनी मेहनत और योजनाबद्ध कार्यक्रम कहां है, जिनसे इस सत्ता की नींव मजबूत होनी थी।

Wednesday, June 17, 2009

भाजपाई हार के चीथड़े बीनने की एक और कोशिश - 1

15वीं लोकसभा चुनाव के परिणामों आए ठीक एक महीना बीत गया है। नतीजों का विश्लेषण अब भी जारी है। कुछ विश्लेषक राहुल गांधी के युवा नेतृत्व की जीत करार दे रहे हैं और कुछ आडवाणी के थके-बूढ़े नेतृत्व की हार। कुछ ने इसे विकासपरक राजनीति के एक नए दौर का आग़ाज़ क़रार दिया है, तो कुछ ने हिंदुत्ववादी राजनीति का अंत।

कुछ विद्वान इसे क्षेत्रीय राजनीति के अंत की शुरुआत बता रहे हैं, कुछ ने दो दलीय राजनीति के युग का प्रारंभ घोषित कर दिया है और कुछ आत्ममोहित अति उत्साही बंधुओं ने इसे भारतीय जनता पार्टी के ताबूत में आखिरी कील साबित कर दिया है। देश के एक जागरूक नागरिक और सक्रिय पत्रकार होने के नाते मैं भी पिछले 1 महीने से इन तमाम विश्लेषणों और मतों को पढ़ता रहा हूं, सोचता रहा हूं।

अगर यह केवल राहुल गांधी के युवा नेतृत्व की जीत है, तो उड़ीसा में युवा नवीन पटनायक की ऐतिहासिक जीत का क्या राज है? यदि यह केवल बूढ़े और थके आडवाणी का हार है, तो बूढ़े येदियुरप्पा के कर्नाटक में मिली भाजपा की जीत को क्या कहा जाएगा? अगर यह विकासपरक राजनीति की जीत है, तो फिर अपने आप में यह साफ है कि यह कोई राष्ट्रीय जनादेश नहीं है, बल्कि राज्यों के जनादेशों का जोड़ है।

अगर यह हिंदुत्ववादी राजनीति के अंत की शुरुआत है, तो पिछले साल भर में हुए नौ विधानसभा चुनावों में से छह में भाजपा को मिली जीत की व्याख्या कैसे होगी? अगर यह क्षेत्रीय राजनीति का अंत है, तो चुनाव की पूर्व संध्या पर श्रीलंका में अलग तमिल देश के समर्थन की होड़ और एक परिवार में सिमटे द्रमुक को मिली भारी जीत को कैसे समझा जाए?

इसलिए मुझे लगता है कि यह जनादेश, ये चुनाव परिणाम इनमें से कुछ भी नहीं हैं, जो हमें अब तक बताया जा रहा है। मेरा साफ मत है कि यह परिणाम देश में एक सक्षम, समर्थ विपक्षी दल के अभाव का नतीजा है। क्यों? क्योंकि आप खुद याद कर देखिए। चुनाव परिणाम आने और उसके पहले के लगभग 4-5 महीने में कौन से मुद्दों ने आपके विचार को मथा है। किन मुद्दों ने एक मतदाता के तौर पर आपको झकझोरा है? आप जब मतदान केंद्र पर गए, उस समय आपके दिमाग में क्या मुद्दे थे? मैं जब आज इन्हीं सवालों पर विचार करता हूं, तो मन वितृष्णा से भर जाता है।

वितृष्णा इस देश की उस विपक्षी पार्टी के लिए, जिसे एक मजबूत प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने का जनादेश मिला था। पिछले पांच साल में यूपीए की सरकार आतंकवादी घटनाओं को रोक पाने में पूरी तरह विफल रही, लेकिन चुनाव की पूर्व संध्या पर यह तर्क दिया गया कि आडवाणी के गृहमंत्री रहते एक आतंकवादी को अफगानिस्तार ले जाकर सी ऑफ किया गया था। यानी क्योंकि वाजपेयी की सरकार आतंकवाद के खिलाफ घुटने टेकने में डॉक्टरेट है, इसलिए को भी इसमें पीएचडी करने का पूरा अधिकार है।

पिछले पांच साल में आर्थिक मोर्चे पर सरकार का योगदान शून्य रहा, लेकिन तर्क यह दिया गया कि वाम मोर्चे ने कुछ करने ही नहीं दिया। विपक्ष ने यह सवाल नहीं उठाया कि जिस तरह मनमोहन सिंह ने परमाणु करार के मुद्दे पर जुआ पटक दिया, उसी तरह उन्हें देश हित के लिए जरूरी आर्थिक सुधारों के लिए सत्ता छोड़ने की धमकी देने का साहस क्यों नहीं किया?

नरेगा जैसे सामाजिक कार्यक्रमों से निश्चत तौर पर आम ग्रामीण जनता को अपेक्षाकृत काफी फायदा हुआ, लेकिन उसमें चल रहे भ्रष्टाचार और वादे से काफी कम कामकाजी दिन काम देने जैसी विसंगतियों को देश के सामने लाना क्या एक सशक्त विपक्ष का काम नहीं था? लेकिन महत्वाकांक्षी सत्तालोभियों से भरी भ्रष्ट भाजपा ने लगभग तमाम घेरे जा सकने वाले मुद्दों पर कांग्रेस को वाकओवर दे दिया।

(अगले खंड में हिंदू राष्ट्रवाद के मसले पर भारतीय जनता पार्टी की रणनीतियों का विश्लेषण)

Monday, June 15, 2009

'डायन हिंदुत्व! इसे नंगा कर चौराहे पर घुमाओ'

भारतीय जनता पार्टी चुनाव क्या हारी, बेचारी हिंदुत्व पर तो मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा है। उसे समझ ही नहीं आ रहा है कि उसका दोष क्या है। उसकी हालत उत्तर प्रदेश या बिहार में आए दिन होने वाली उन घटनाओं से समझा जा सकता है, जिनमें किसी एक दबंग जाति के कुछ 'जांबाज़ मर्द' इसलिए किसी दलित अबला को नंगा कर गांव में घुमाते हैं, क्योंकि उनके घर का कोई लड़का ज्यादा दारू पीने से बीमार हो गया। बेचारी वह दलित स्त्री अपनी झोपड़ी में पड़ी होती है या फिर किसी के खेत में मजदूरी कर रही होती है कि तभी उन जांबाज़ मर्दों की टोली आती है, उस पर डायन होने का आरोप लगाती है और इससे पहले कि वह कुछ समझ पाए, उसके कपड़े फाड़ कर उसे गांव भर में घुमाती है। वो तो उसे क़यामत के उन सदियों से लंबे घंटों के बीतने के बाद पता चलता है कि दरअसल उसे इसलिए डायन क़रार दिया गया कि वह बाबू साहब के घर के सामने से निकली थी और उसी के बाद उनके दारूबाज बेटे को खून की उलटियां होने लगीं थीं।

भाजपा की हार के बाद बेचारी हिंदुत्व की हालत भी उसी दलित बेसहारा स्त्री की सी हो रही है। हिंदुत्व बेचारी को तो भाजपा ने बहुत पहले, यानी जब अटल जी की 13 दिन की सरकार बनी थी, उस की पूर्व संध्या पर ही धकिया दिया था। वह तो बस अब अपने उन कुछ शुभचिंतकों की रूखी-सूखी रोटियां खाकर अपनी ज़िंदगी निकाल रही थी, जिनके लिए वह कभी केवल सत्ता चढ़ने की सीढ़ियां नहीं रही। लेकिन अब उसके करीब 12 साल बाद एकाएक उसे अपने नाम का शोर सुनाई दे रहा है। कुछ 'जांबाज़ भाजपाई', जो कल तक सत्ता की कुंजी जानकर उसके दरवाजे पर मत्था टेकते थे, उसकी झोपड़ी के आगे उसे ललकार रहे हैं। उसे पार्टी की हार का दोषी बताया जा रहा है।

लगभग ढाई महीने के चुनाव अभियान में किसी भाजपाई नेता ने उसका नाम तक नहीं लिया। वरुण गांधी के मूर्खतापूर्ण एक बयान ने ज़रूर उसकी जगहंसाई कराई, लेकिन कहीं भी उसके सच्चे स्वरूप यानी हिंदू राष्ट्रवाद का नामलेवा नहीं था। पार्टी के पीएम इन वेटिंग की चुनावी रणनीति तय करने वाले सुधींद्र कुलकर्णी ने कमजोर पीएम के नारे को केन्द्रीय विषय बनाने के बाद बहुत बेशर्मी से हार के बाद यह सलाह दे डाली कि हिंदुत्व ने ही उनकी यह दुर्गति करा दी। पार्टी के अल्पसंख्यक कोटे से तमाम विशेष पद और जिम्मेदारियां हथियाने वाले और अपने संसदीय क्षेत्र में चौथे स्थान पर आने वाले मुख्तार अब्बास नकवी ने तो चुनाव परिणाम आने के अगले दिन ही घोषणा कर दी थी कि अब हिंदुत्व की राजनीति का अंत हो गया है। स्वप्न दास गुप्ता ने अपने एक लेख में हिंदुत्व के सर हार का ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि भावनात्मक ज्वार के आधार पर लंबे समय की राजनीति नहीं की जा सकती।

इन सब दिग्गज रणनीतिकारों के बयानों से ऐसा लग रहा है कि भाजपा ने यह चुनाव हिंदुत्व के केन्द्रीय मुद्दे पर ही लड़ा था। वरुण गांधी के जिस बयान पर सबसे ज्यादा वितंडा खड़ा किया गया और किया जा रहा है, हालांकि वह हिंदुत्व की राजनीति का आत्मघाती पक्ष है, लेकिन फिर भी भाजपा ने कौन सा उसका समर्थन कर दिया था और उसे अपना केन्द्रीय विषय बना लिया था। उसमें भी दो कदम आगे, तीन कदम पीछे का रणनीतिक खोखलापन ही दिखा। इसके अलावा हिंदू राष्ट्रवाद की दृष्टि से जो भी महत्वपूर्ण मुद्दे थे, उनमें से एक पर भी पार्टी ने ढाई महीने में एक क्षीण सा स्वर भी नहीं निकाला।

प्रधानमंत्री का देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक बताना, आम शेयरधारकों और जमाकर्ताओं की हिस्सेदारी वाले सरकारी बैंकों पर कर्ज देने के लिए मुसलमानों को आरक्षण देने का दबाव बनाना, सेना में मजहबी आधार पर गिनती कराना, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद बंगलादेशी घुसपैठियों को संरक्षण देने वाले आईएमडीटी एक्ट को बनाए रखना, सुप्रीम कोर्ट के ही आदेश का उल्लंघन कर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा बरक़रार रखना, मदरसे के दकियानुसी और साम्प्रदायिक पाठ्यक्रम को सीबीएसई के समकक्ष मान्यता देना और ऐसे तमाम गंभीर और राष्ट्र विरोधी फैसले कांग्रेसी सरकार के नाम हैं। लेकिन आप सर्वे कर लीजिए, देश की कितनी फीसदी जनता को इन मुद्दों में से आधे की भी जानकारी है। ये हैं हिंदू राष्ट्रवाद के असल मुद्दे। क्या इनमें से कोई भी एक हममें से किसी ने भी चुनाव प्रचार के दौरान सुना। यहां तक कि वरुण गांधी के मूर्खतापूर्ण बयान के तुरंत बाद आंध्र प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष ने लगभग वैसा ही बयान दिया कि मुसलमानों के खिलाफ उठने वाली उंगली के बदले पूरा हाथ काट लिया जाएगा। मैं अपने अनुभव के आधार पर कहता हूं कि देश की 90 फीसदी से ज्यादा जनता को इस बयान का पता भी नहीं है, जबकि वरुण गांधी पर हुआ बवाल हम सब जानते हैं। क्या यह भाजपा की जिम्मेदारी नहीं थी कि इन मुद्दों से देश को अवगत कराएं।

'मजबूत नेतृत्व, निर्णायक सरकार' का ढोल पीटने वाली पार्टी अब हिंदुत्व पर लाल-पीला हो रही है। जैसे यह पूरा चुनाव हिंदुत्व के केन्द्रीय विषय पर ही लड़ा गया। ऐसे में हिंदुत्व सबसे निरीह और बेचारा दिख रहा है। देखें इसकी बेचारगी खत्म करने के लिए राष्ट्रवाद के किसी नायक के उभरने का इंतजार और कितना लंबा होगा?

Monday, May 25, 2009

अब थोड़ी बहस विकास पर भी कर लें

पिछले साल जब विधानसभाओं चुनावों में राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस की और गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में भाजपा की जीत हुई थी, तब इसे भारतीय राजनीति में एक सकारात्मक अध्याय की शुरुआत करार दिया गया था। कहा गया था कि देश की राजनीति अब जाति, प्रांत, भाषा और पंथ के दायरे से निकल कर विकास की गोद में बैठने लगी है। खैर, 2009 के लोकसभा चुनाव परिणामों पर शुरुआती आश्चर्य के बाद धीरे-धीरे एक बार फिर विश्लेषक समुदाय इसी निष्कर्ष पर पहुंचने लगा है कि कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए की जीत दरअसल विकासोन्मुख राजनीति की जीत है। और तो और भाजपा के प्रवक्ता और रामपुर से चौथे स्थान पर रहे मुख्तार अब्बास नकवी ने भी तुरंत घोषणा कर दी कि मंडल (जाति केन्द्रित) और कमंडल (हिन्दुत्व केन्द्रित) राजनीति का दौर खत्म हो गया है और अब केवल विकास ही सत्ता का फॉर्मूला है।

मैं व्यक्तिगत तौर पर इस आकलन से सहमत नहीं हूं कि 2009 की जीत के पीछे कांग्रेस का विकासोन्मुख एजेंडा है। लेकिन यह बिल्कुल अलग विषय है, जिस पर एक अलग लेख लिखने की जरूरत होगी। फिलहाल तो जो विषय मेरे दिमाग में 16 मई के बाद से लगातार घूम रहा है, वह दूसरा है। मैं तमाम राजनीतिक पंडितों की विश्लेषणात्मक क्षमता का सम्मान करते हुए थोड़ी देर के लिए यह मान लेता हूं कि कांग्रेस की यह जीत दरअसल विकास की राजनीति की जीत है। विकास यानी अर्थव्यवस्था की मजबूती, बुनियादी ढांचे का प्रसार, शिक्षा का विस्तार, स्वास्थ्य सुविधाओं तक ज्यादा से ज्यादा जनता की पहुंच और ऐसे ही तमाम दूसरे मानक। लेकिन सवाल यह है कि विकास के ये तमाम मानक किसके लिए हैं? क्या किसी खास समुदाय या वर्ग के लिए किया गया विकास में पूरे देश की भागीदारी मानी जा सकती है। पिछले साल 110 करोड़ लोगों के प्रधानमंत्री ने एक बयान दिया था, जिसकी चर्चा कम की गई (पता नहीं क्यों?), कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। चुनाव की तैयारी में दिए गए अपने इस बयान को प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए अपने भाषणों में भी दुहराया। बात केवल भाषणबाजी तक ही सीमित नहीं रही। पिछले साल के बजट में बाकायदा इस बात के प्रावधान किए गए कि बैंकों द्वारा बांटे जाने वाले कर्ज में अल्पसंख्यकों (यानी मुसलमान) का प्राथमिकता दी जाए। यहां तक कि वित्त मंत्री ने बैंकरों के साथ अपनी बैठक में भी बार-बार इस बात के लिए दबाव बनाया कि देश के तमाम नागरिकों से लिए गए जमा से बांटे जाने वाले कर्ज में एक खास हिस्सा मुसलमानों के लिए सुरक्षित हो। यानी अगर कोई मुसलमान उस खास आरक्षित हिस्से के लिए लोन एप्लिकेशन न दे, तो वह बैंक के पास ही पड़ा रहे, लेकिन किसी दूसरे जरूरतमंद को न दिया जाए।

अगर कांग्रेस के विकास की यही परिभाषा है, तो मुझे यह विकास नहीं चाहिए। मुझे लगता है कि पूरे देश को यह विकास नहीं चाहिए। देश ने अगर कांग्रेस को चुनाव जितवाया है, तो इसलिए नहीं कि उसे विकास का यह मॉ़डल पसंद है, बल्कि इसलिए कि विपक्षी दल भाजपा देश को इस कांग्रेसी विकास के मायने बता पाने में पूरी तरह नाकाम रही है। विदर्भ में कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर रहे किसान को केवल इसलिए बैंकों के कर्ज का पहला अधिकारी नहीं माना जाएगा, क्योंकि वह एक खास पूजा पद्धति को नहीं मानते या किसी खास पवित्र किताब की इबादत नहीं करते। क्या हम सचमुच एक पंथनिरपेक्ष देश में रह रहे हैं? और अगर सचमुच हमें किसी भी कीमत पर विकास चाहिए, तो हम ओबामा को ही अपना राष्ट्रपति क्यों नहीं घोषित कर देते? क्या किसी हाइवे के निर्माण में यह शर्त लगाई जा सकती है कि इस पर से गुजरने वाली पहली 500 गाड़ियां किसी खास सम्प्रदाय की होंगी या किसी फ्लाईओवर पर चढ़ने वाली पहली 50 कारें उन्हीं लोगों की होंगी, जो एक खास मजहब में यकीन रखते हों। यह विकास का कैसा मॉ़डल है? क्या कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए को मिला जनादेश इस मॉडल के समर्थन में है। मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने की 'धर्मनिरपेक्ष' कोशिशों को स्वयं सुप्रीम कोर्ट ख़ारिज़ कर चुका है। इसके बावजूद इस विश्वविद्यालय को यह सुविधाएं जारी हैं। निजी शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण की देशव्यापी नीति से मुस्लिम संस्थानों को छूट दी गई है। मदरसों की पढ़ाई को सीबीएसई के समतुल्य होने का दर्जा दिया जा चुका है। यह विकास का कौन सा मॉडल है, कोई मुझे समझाए। आप देश के मुसलमानों को यह संदेश दे रहे हैं कि आपको देश की मुख्यधारा में शामिल होने की कोई जरूरत नहीं है, आप जहां हैं, जड़ बुद्धि से वहीं जमे रहिए, हम आपकी धारा को ही मुख्यधारा बना देंगे। फिर भी वे कहते हैं कि आपकी जीत विकास की जीत है। माफ कीजिए, आपकी जीत विकास की जीत नहीं, नपुंसक विपक्ष की हार है। मैं इस देश में तमाम सुविधाओं से केवल इसलिए वंचित किया जा रहा हूं क्योंकि मेरा नाम भुवन भास्कर है, मैं मंदिर जाता हूं, रामायण और गीता में आस्था रखता हूं, राम और कृष्ण में श्रद्धा रखता हूं। उस पर तुर्रा यह कि यह सब इस देश की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को अक्षुण्ण रखने के लिए किया जा रहा है। इसलिए मेरा साफ मत है कि कांग्रेस की यह जीत विकास की नहीं, बल्कि आम जनता की
उदासीनता और जानकारियों के अभाव की जीत है।

Saturday, April 25, 2009

गरीब की लुगाई, धर्मनिरपेक्षता बेचारी

धर्मनिरपेक्षता तो भइया, जैसे गरीब की लुगाई हो गई है। अबला पांचाली के तो पांच ही पति थे, लेकिन इस धर्मनिपेक्षता के तो पचीस खसम उसे अपनी अंकशायिनी बनाने के लिए एक-दूसरे की गर्दन उतारने को तैयार हैं। अब धर्मनिरपेक्षता कनफ्यूज हो गई है। बिचारी को समझ ही नहीं आ रहा कि किसे बलात्कारी माने और किसके गले लगे। अभी कुछ महीने पहले तक तो सब ठीक था। उसे समझा दिया गया था कि केवल जो भी हिंदुओं के पक्ष की बात करे, उसे अपनी दुश्मन मान लेना। वह भी खुश थी। केवल एक भाजपा थी, जो उसकी दुश्मन थी। बाकी लालू और मुलायम टाइप के समाजवादी, प्रकाश करात और बुद्धदेव टाइप के वामपंथी, सोनिया और अर्जुन टाइप के कांग्रेसी सब धर्मनिरपेक्ष थे। नीतीश और नवीन टाइप के लोग, वैसे तो धर्मनिरपेक्ष (अल्पसंख्यक हितों के प्रति लगातार निष्ठा जताते रहने के कारण) थे, लेकिन भाजपाइयों के साथ होने के कारण उनके सिर भी धर्मनिरपेक्षता के खून के छींटे थे। तो सीन कुछ साफ था। लेकिन ये एकाएक सब गड़बड़ हो गई है।

एक ओर कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्ष गठबंधन की अगुवा होने का दावा ठोंका, तो दूसरी ओर लालू-मुलायम-पासवान की तिकड़ी ने ऐलान कर दिया कि चुनाव के बाद जो धर्मनिरपेक्ष गठबंधन सत्ता बनाएगा, उसमें कांग्रेस शामिल ही नहीं होगी। अब धर्मनिरपेक्षता का तमगा लेने की जब ऐसी होड़ मची हो, तो हिंदू शब्द सुनते ही जिनके पूरे देह में खुजली मच जाती हो, वैसे वामपंथी भला कैसे चुप रहते। तो, हरकिशन सिंह सुरजीत के बाद जोड़तो़ड़ और अवसरवादी राजनीति के नए सरताज बनने को बेताब प्रकाश करात ने भी घोषणा कर दी कि नई धर्मनिरपेक्ष सरकार में कांग्रेस का कोई स्थान नहीं होगा। अभी धर्मनिरपेक्षता बिचारी थोड़ी सांस ले पाती, गणित बैठा पाती और लालू-मुलायम-पासवान के साथ करात की जोड़ी मिला पाती, तब तक करात जी के अनुशासित सिहापी और नंदीग्राम नरसंहार के प्रणेता बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कह दिया कि कांग्रेस के बिना तो किसी धर्मनिरपेक्ष सरकार का अस्तित्व ही नहीं हो सकता। लो, फिर वही ढाक के तीन पात। धर्मनिरपेक्षता तो है एक और एक-दूसरे पर तलवार ताने इसके दावेदारों की जमात है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती।

मुसलमानों पर उठने वाली उंगली के बदले हाथ काटने का ऐलान करने वाले आंध्र प्रदेश के धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस अध्यक्ष डी श्रीनिवास, भाजपा के साथ गठबंधन का कलंक धोने के लिए बात-बात में मुस्लिम हितों की सुरक्षा की कसमें खाने वाले धर्मनिरपेक्ष नीतीश कुमार, कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बाद वनवासियों द्वारा चर्च पर किए गए हमलों से आहत धर्मनिरपेक्ष नवीन पटनायक जैसे धर्मनिरपेक्षता के स्वयंभू दावेदार अलग से। आपकी पता नहीं, पर मेरी तो पूरी सहानुभूति है इस धर्मनिरपेक्षता से। आप ही बताएं, क्या करे बिचारी धर्मनिरपेक्षता ?

Friday, April 24, 2009

नेपाल में बन रही है गृह युद्ध की पृष्ठभूमि

कभी तिब्बत, भारत और चीन के बीच का बफर स्टेट हुआ करता था। नेहरू जी की अदूरदर्शी और आत्म केन्द्रित विदेश नीति के कारण आज वह चीन का हिस्सा बन चुका है। अब निशाने पर नेपाल है। नेपाल भी अब तक भारत और चीन के बीच एक बफर स्टेट का ही काम करता रहा है और 1962 के हमले से अब तक चीन की तमाम शत्रुतापूर्ण कूटनीति के बावजूद कम से कम नेपाल की सीमा पर तो हम बहुत हद तक निश्चिंत ही रहे हैं। लेकिन अब स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। हालिया घटना नेपाल के सेना प्रमुख को हटाने की है। भारत ने जहां एक ओर इस घटनाक्रम पर चिंता जताई है, वहीं चीन ने प्रचंड को अपना खुला समर्थन दे दिया है। यह चीन की एक और धूर्त कूटनीति है और साथ ही यह आने वाले कल का एक संकेत भी है।

नेपाल जल्दी ही गृह युद्ध के अगले दौर में प्रवेश करने वाला है। प्रचंड को निर्दोष लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाने की सहूलियत और देश में पानी, बिजली, सड़क, रोजगार जैसी व्यवस्थाएं खड़ी करने की कठिनाई समझ में आने लगी है। करीब तीन साल पहले तक जिन राजनीतिक दलों ने प्रधानमंत्री बनने में प्रचंड का साथ दिया था, अब वे उनके खिलाफ खड़े होने लगे हैं। वामपंथ और लोकतंत्र कभी एक साथ नहीं चल सकते और पिछले 100 साल की वामपंथी क्रांतियों के इतिहास में शायद ही इसका कोई अपवाद हो। आम जनता (जिन्हें वामपंथियों की शब्दावली में सर्वहारा कहा जाता है) के समर्थन से सत्ता हासिल करने के बाद वामपंथी शासकों ने हर बार पहला काम उसी जनता के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने का किया है, लेकिन नेपाल में राजशाही के विरोध में उठी लहर ने इतिहास के इस सबक से आंखें मूंद लीं। इस गलती का परिणाम नेपाल को तो अभी भुगतना ही है, भारत भी उसकी धधक से नहीं बच सकेगा। इसलिए बिना कोई समय गंवाए भारतीय नीति निर्माताओं को इसकी तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।

माओवादियों और नेपाली सेना के टकराव की पृष्ठभूमि समझना जरूरी है। दरअसल यह उन हजारों माओवादियों की रोजी-रोटी की लड़ाई का सवाल है, जिन्होंने प्रचंड के राजनीति की मुख्य धारा में शामिल होने से पहले 10 सालों तक हिंसा, लूट, अपहरण और अपराध छोड़ कर कुछ किया ही नहीं। अब प्रचंड तो बन गए प्रधानमंत्री, लेकिन ये रंगरूट क्या करें? उनसे यह उम्मीद करना तो बेवकूफी ही होगी न कि वे 10 साल तक अराजक और स्वच्छंद जीवन जीने के बाद अब एकाएक हल पकड़ कर किसान बन जाएं या फिर किराने की दुकान खोल कर आटा और मैदा बेचने लगें। तो फिर वे क्या करेंगे? उनके लिए एक ही काम हो सकता है, और वह है नेपाली सेना में उन्हें शामिल करना। लेकिन जिस नेपाली सेना ने करीब एक दशक तक इन्हीं लुटेरों, हत्यारों के खिलाफ लड़ाई में अपने सैकड़ों जवान शहीद किए हों, उसके लिए इन्हें अपना हिस्सा बनाना एक दुःस्वप्न हो होगा। लेकिन प्रचंड पर अपने पुराने लड़ाकों और कैडर की ओर से भारी दबाव है कि उन्हें सेना में भर्ती किया जाए। इसके अलावा दूसरा पहलू सैनिक निष्ठा का है। नेपाली सेना हमेशा से राजशाही समर्थक मानी जाती रही है। राजशाही नहीं रही, फिर भी उससे माओवादियों के समर्थन की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। जबकि देश में अपनी तरह का शासन स्थापित करने के लिए प्रचंड को सेना की बिना शर्त निष्ठा चाहिए और वह उन्हें केवल अपने माओवादी रंगरूटों से ही मिल सकती है।

किसी देश के संदर्भ में विदेश नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उस देश में सरकार हमारे लिए कितनी अनुकूल है। यह दरअसल विदेश नीति का ऐसा पहलू है, जो अब तक हमारी रणनीति में या तो शामिल नहीं रहा है या फिर अदृश्य रहा है। इसीलिए हम जब नेपाल में भारत के दोस्त महाराज वीरेन्द्र विक्रम शाह की पूरे परिवार के साथ हत्या हो गई, तो हम उसे नेपाल का आंतिरक मामला बताकर तमाशा देखते रहे। उसी के बाद से नेपाल में आईएसआई और चीन की पैठ बढ़ती गई और भले ही माओवादियों के नेतृत्व में हुए राजशाही विरोधी आंदोलन को जनता का भारी समर्थन देखा गया, लेकिन इसके पीछे चीन की भूमिका पर शायद ही कोई अध्ययन किया गया हो। अफ्रीका तक पर दबाव डाल कर दलाई लामा का वीजा अस्वीकार करवाने वाले चीन के बारे में कोई बेवकूफ ही ऐसा सोच सकता है कि वह माओवादी आंदोलन के बारे में तटस्थ रहा हो। खास कर तब, जब विदेश नीति का ककहरा जानने वाला भी यह समझ सकता था कि माओवादियों के सत्ता में आने के बाद नेपाल चीन की गोद में बैठ जाएगा और भारत के लिए एक स्थाई सिरदर्द हो जाएगा।

प्रचंड की राह में नेपाली सेना और न्यायपालिका ही सबसे बड़ी बाधा हैं। न्यायपालिका ने पहले पशुपतिनाथ मंदिर के पुजारी और अब सेना प्रमुख को अपदस्थ करने की प्रचंड की कोशिशों को तो असफल तक दिया है, लेकिन इससे प्रचंड की बढ़ती झुंझलाहट का अंदाजा भी लगाया जा सकता है। अगले साल तक मौजूदा माओवादी सरकार को नया संविधान लागू करना है, लेकिन प्रचंड के रूख से ऐसा लग रहा है कि उनकी प्राथमिकताएं कुछ और हैं। जिस तरह नेपाल में माओवादी शासन अपना जनसमर्थन खोता जा रहा है, उसमें इस बात की महती संभावना बन रही है कि आने वाले महीनों में प्रचंड पर सत्ता छोड़ने का दबाव बनने लगे और अगर ऐसा हुआ तो प्रचंड के पास अपने पुराने तौर-तरीकों का सहारा लेने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा, क्योंकि सत्ता तो वह अब छोड़ने से रहे। ऐसे में उसके लिए चीन का बढ़ता समर्थन हिमालय की गोद में बसे इस खूबसूरत देश की क्या गत बनाएगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। सवाल यह है कि क्या हम एक बार फिर इस समूचे घटनाक्रम के तमाशबीन बने रहेंगे और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक और चिरस्थाई सरदर्द छोड़ जाएंगे, या अभी से कोई ठोस रणनीति बनाकर ऐसी पहल करेंगे कि आने वाला समय नेपाल और भारत, दोनों के लिए अमन और विकास की पृष्ठभूमि तैयार करे।

Thursday, April 23, 2009

फिर तैयार हो रही है एक असफल विदेश नीति की भूमिका

मेरे एक तमिल मित्र से जब मैंने यह पूछा कि श्रीलंका में चल रहे संघर्ष पर तमिलनाडु की आम जनता क्या सोचती है, तो मैंने यह सोचा था कि जवाब एक बड़े सैद्धांतिक आवरण के साथ डिप्लोमैटिक किस्म का होगा। लेकिन मेरे मित्र ने बहुत साफ कहा कि भले ही प्रभाकरन आतंकवादी हो या चाहे जो कुछ हो, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि वह तमिल हितों के लिए लड़ रहा है। इसके बाद उसने जिस रूप में अपनी बात का विस्तार किया, वह काफी गंभीर था और उससे एक ओर तो श्रीलंका को लेकर भारतीय विदेशी नीति की द्वंद्वात्मक स्थिति समझ में आ जाती है, वहीं दूसरी ओर एक राष्ट्र के रूप में भारतीयता के सूत्र की स्थापना पर भी कुछ असहज सवाल उठते हैं।

मेरे तमिल मित्र ने कहा कि आखिर इंदिरा गांधी के समय भारत ने भी तो प्रभाकरण की मदद की ही थी, फिर बाद में उसके बारे में भारतीय नीति क्यों बदली। इस सवाल का जवाब खुद ही देते हुए उसने कहा कि कश्मीर में आतंकवाद के बढ़ने से भारत ने मजबूरन तमिल हितों के लिए अपने समर्थन को तिलांजलि दे दी। कश्मीर तो वैसे भी अपने पास है नहीं, थोड़ा सा हिस्सा बचा है, उसके लिए तमिल हितों के प्रति भारत अपनी जिम्मेदारी से कैसे पीछे हट सकता है। इस दलील में जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा झकझोरा, वह था एक ऐसा स्वर, जो कहीं न कहीं कश्मीर को भारत से जोड़े रखने की अहमियत के लिए केवल इसलिए पूरी तरह उदासीन था, क्योंकि उसे लगता है कि यह उसके अपने जातीय भाइयों के हितों के आड़े आ रहा है।

तुलसीदास ने लिखा है, "बहुत कठिन जाति अपमाना।'' करुणानिधि जब प्रभाकरण को अपना दोस्त बताते हैं और वाइको जब प्रभाकरण के समर्थन के लिए जेल जाने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो जातीय अपमान के प्रति इसी असहनीयता का बोध होता है। तमिलनाडु की जनता के प्रभाकरण और लिट्टे से इसी भावनात्मक जुड़ाव ने श्रीलंका जैसे रणनीतिक तौर पर भारी महत्वपूर्ण देश के प्रति भारतीय विदेश नीति को अपंग बना दिया है। भारत के प्रति घोर शत्रुता का भाव रखने वाले दोनों पड़ोसी देश, पाकिस्तान और चीन इसका भरपूर फायदा उठा रहे हैं। पाकिस्तान से पिछले कुछ वर्षों में श्रीलंका के सामरिक संबंध काफी बढ़े हैं और पाकिस्तानी सेना लिट्टे से लड़ने के लिए श्रीलंका को हथियारों की सीधी आपूर्ति करने लगी है। इधर चीन ने भी सीधे तौर पर लिट्टे के खिलाफ कार्रवाई में राजपक्षे सरकार का पूरा समर्थन कर दिया है।

पाकिस्तान और चीन के इरादे किसी से छिपे नहीं हैं। नेपाल और बंगलादेश में अपना आधार बनाने के बाद आईएसआई को श्रीलंका में भी अपनी उपस्थिति मजबूत करनी है ताकि भारत को घेरा जा सके। दूसरी ओर चीन ने हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति मजबूत करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है और इस समुद्री सीमा के दूसरे महत्वपूर्ण देशों, जैसे मॉरीशस और सिशली से पहले ही पींगे बढ़ा रहा है। ऐसे में लिट्ट के खिलाफ चल रही कार्रवाई पर भारत की 'दो कदम आगे, एक कदम पीछे' नीति भले ही मानवीय आधार और तमिल जनता की भावनाओं के लिहाज से व्यावहारिक हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से यह खतरनाक साबित हो सकती है।

सवाल यह है कि भारत के पास विकल्प क्या हैं? भारत दो तरह की रणनीति पर विचार कर सकता है। पहला, राष्ट्रीय स्तर पर एक ताकतवर अभियान चला कर देश की जनता, खास तौर पर पर तमिलनाडु की जनता के दिलोदिमाग में यह बैठाना जरूरी है कि सभी श्रीलंकाई तमिल लिट्टे के सदस्य नहीं हैं और क्योंकि श्रीलंका में एक स्वतंत्र तमिल राष्ट्र की स्थापना व्यावहारिक नहीं है, इसलिए हिंसात्मक अभियान तमिल समाज को न केवल कमजोर करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रगति और विकास के रास्ते बंद करेगा। दूसरा, राजपक्षे सरकार पर दबाव डाल कर भारत अपनी मशीनरी के बूते श्रीलंका के भीतर बड़े पैमाने पर राहत कार्य चला सकता है और गृह युद्ध में तबाह हुए तमिलों के पुनर्वास की पूरी व्यवस्था अपने कंधों पर ले सकता है। अगर भारत ऐसा कर सका, तो हम तमिल जनभावना का सम्मान करते हुए लिट्टे के खिलाफ सरकारी लड़ाई में पूरी तरह मददगार बन सकते हैं।

श्रीलंका सरकार अभी अपने राष्ट्रीय जीवन की सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ रही है और इस समय उसका बिना शर्त समर्थन कर पाकिस्तान और चीन उसके लिए वही महत्व प्राप्त कर सकते हैं, जो कभी दुर्योधन का कर्ण के जीवन में हो गया था। कर्ण के जीवन में आए ऐसे ही संकट के समय उसका समर्थन कर दुर्योधन ने उसके जीवन में वह स्थान प्राप्त कर लिया, जहां कर्ण ने न्याय-अन्याय, उचित-अनुचित की सारी सीमाएं छोड़ कर दुर्योधन के समर्थन को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। इसलिए ऐसे मौके पर श्रीलंका को ऐसा संकेत देना, कि हम उसके राष्ट्रीय संकट में उससे मोलभाव कर रहे हैं, हमारी विदेश नीति के लिए घातक साबित हो सकता है।