Sunday, July 6, 2008

एक और खिलाफत! ईश्वर जाने इस बार परिणाम क्या होगा

अब तक जो बात ढ़क-छिप कर कही जा रही थी, वह सामने है। एक वामपंथी नेता और मायावती ने खुल कर कह दिया है परमाणु करार इसीलिए बुरा है क्योंकि वह देश के मुसलमानों को पसंद नहीं है। और मुसलमानों को इसलिए पसंद नहीं है क्योंकि यह अमेरिका के साथ किया जा रहा है। और अमेरिका मुसलमानों का शत्रु इसलिए है क्योंकि उसने इराक और तालिबान पर हमला किया है। इस तर्क के पीछे का तर्क क्या है? कि पूरी दुनिया के मुसलमान एक राष्ट्र हैं और उनका राष्ट्रहित उन मुद्दों से नहीं जुड़ा है जो उनके देश से जुड़े हैं, बल्कि दुनिया के मुसलमानों से जुड़ा है।

और मैं बहुत जोर देकर यह भी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि यह बात भारत का मुसलमान नहीं कह रहा, बल्कि यह कह रहा है एक चीन परस्त वामपंथी नेता और खुद को गहनों में तुलवा कर दलित हित का बिगुल बजाने वाली एक ऐसी नेता, जिसने साल भर पहले मुसलमानों को कट्टरतापसंद कौम करार दिया था। आज के इंडियन एक्सप्रेस में कुछ बयान हैं, जो इस मुद्दे पर भारतीय मुसलमानों की राय जानने में काफी हद तक मदद करते हैं। उमर अब्दुल्ला ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि परमाणु करार अच्छा है या बुरा, इस पर बहस तो हो सकती है, लेकिन यह हिंदुओं और मुसलमानों के लिए किस तरह अलग-अलग है, यह उन्हें समझ में नहीं आता। घोर साम्प्रदायिक इतिहास के वारिस इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के मुहम्मद बशीर ने भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए यूपीए का समर्थन करते रहने की बात कही है। जद (यू) के सांसद महाज अली अनवर ने वामपंथियों और मायावती के विरोध को राजनीति प्रेरित बताया है वहीं हर मुद्दे पर हमेशा साम्प्रदायिक दृष्टि से सोचने वाले सांसद असादुद्दीन ओवैसी ने मायावती के बयान को गंदी राजनीति करार दिया है और कहा है कि मुसलमान प्रेम के नाम पर करार का विरोध करने वाले दरअसल स्वार्थी लोग हैं। तो साफ है कि करार का समर्थन या विरोध केवल एक राजनीतिक मुद्दा है, साम्प्रदायिक नहीं।

लेकिन एक चुके हुए वामपंथी और अपने कॅरियर के शीर्ष पर चल रही मायावती का परमाणु करार पर रुख कुछ याद दिलाती है आपको। आजादी से बहुत पहले 1919-1924 के बीच चला एक आंदोलन, जिसे खिलाफत आंदोलन का नाम दिया गया था। यह आंदोलन दक्षिण एशियाई मुसलमानों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ चलाया था। मुद्दा था कि ब्रिटेन ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद ओट्टोमन साम्राज्य के खलीफा के साथ किया गया वादा पूरा नहीं किया था। अब क्योंकि खलीफा मुसलमानों का मजहबी नेता हुआ करता था, तो मुसलमानों के लिए इस आंदोलन में शामिल होना एक मजहबी मसला माना गया। भारतीय मुसलमान भी उसमें शामिल हो गए थे। भारत में उस समय आजादी की लड़ाई चल रही थी और ऐसे में गांधी जी को लगा कि ब्रिटेन के खिलाफ मुस्लिमों की नाराजगी को भुनाने का यह एक अच्छा मौका है। सो उन्होंने खिलाफत को अपना समर्थन दे दिया। बहुत से लोग (मैं भी) इसे गांधी जी की वह ऐतिहासिक भूल मानते हैं, जिसने पाकिस्तान के निर्माण को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी। अल्लाम इकबाल ने जब पाकिस्तान की सोच परोसी, तो यह कहा कि क्योंकि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं, इसलिए वह एक देश में नहीं रह सकते। गांधी जी का इस आंदोलन को समर्थन देना यह स्वीकार कर लेना था कि मुसलमानों को इस देश के मुद्दे से जोड़ कर आंदोलित नहीं किया जा सकता। उन्हें इस देश के हितों के लिए खड़ा करने के वास्ते किसी भी मुद्दे को मजहब की चाशनी में लपेट कर पेश करना होगा। यह एक तरफ तो मुसलमानों के अलग राष्ट्र होने के सिद्धांत पर मुहर था, दूसरी ओर उनकी बाह्य निष्ठा को मान्यता देना था।

खैर, अब इराक और तालिबान पर हमले के कारण अमेरिका के मुसलमानों का शत्रु होने का फतवा देना और इसी को अमेरिका से भारत के संबंध तय करने का आधार बनाना, एक बार फिर उसी खिलाफत आंदोलन की याद दिला रहा है। इस नए खिलाफत का परिणाम क्या होगा, भगवान जाने। उम्मीद है तो बस इतनी कि न तो ज़मीन से कटे वामपंथी नेता और मायावती, गांधी जी के कद के सामने कहीं ठहरते हैं और न ही जनता अब किसी भी नेता को उस तरह पूजने को तैयार है, जैसा कि वह 1924 में गांधी जी को पूजती थी।

Friday, July 4, 2008

अमरनाथ हो या परमाणु करार, बवाल की जमीन तो एक ही है

कश्मीर की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां आजकल एक ही राजनीतिक रणनीति पर काम कर रही हैं। पीडीपी ने साढ़े चार साल तक कश्मीर की सत्ता का सुख लिया, वामपंथियों ने चार साल से ज्यादा तक भारत की सत्ता का। अब जब कश्मीर में विधानसभा और देश में लोकसभा चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है, तब दोनों को ध्यान आया कि जिसके साथ मिलकर वे सत्ता का सुख ले रहे हैं, उसी के खिलाफ तो उन्हें चुनाव भी लड़ना है। पश्चिम बंगाल और केरल में कांग्रेस को गालियां देकर वामपंथियों को जहां अपने लिए वोट बटोरने हैं, वहीं कश्मीर में कांग्रेस के खिलाफ पीडीपी को जंग लड़नी है। तो दोनों ने अपने-अपने इलाकों में उन्हीं मुद्दों पर सरकार से समर्थन वापस लेने का एलान किया है, जो पिछले चार-साढ़े चार साल के सत्ता में उनकी भागीदारी के दौरान पैदा हुए और पले।

लेकिन यह गणित कोई महान गुप्त विज्ञान तो है नहीं, जिसे कोई समझ न सके। इसके बावजूद ये निर्लज्ज पार्टियां अगर इस रणनीति पर काम कर रही हैं, तो इसका मतलब है कि उन्हें पता है कि मतदाता मूलतः मूर्ख होता है और भावनाओं में बहकर ही अपने मताधिकार का इस्तेमाल करता है। सच है, कि बाद के पांच सालों में रोता-कलपता ही रहता है, लेकिन तब तक तो चिड़िया खेत चुग चुकी होती है।

दरअसल यह केवल राजनीतिक रणनीति का सवाल नहीं है, दोनों पार्टियों का चरित्र भी एक ही है। वामपंथियों का चीन प्रेम जगजाहिर है और इसके लिए वे भारत के हितों की बलि चढ़ाने से भी नहीं चूकते। खास बात यह है कि इन्हें इसमें कोई शर्म भी महसूस नहीं होती और 1962 में हुए चीन हमले, अरुणाचल, सिक्किम पर चीन के दावे और अमेरिका से परमाणु करार के अनेकों मसले पर उनके रुख को देखते हुए साफ है कि उन्हें भारत से ज्यादा चीन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने की चिंता ज्यादा होती है। इसका एक प्रकट कारण तो उनकी विचारधारा ही हो सकती है, लेकिन इसके गुप्त कारणों को जानने के लिए उस बातचीत का ब्योरा जानने की जरूरत होगी जो हर कुछ महीनों पर चीन जाने वाले वाम दलों के प्रतिनिधिमंडल और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के बीच होती है। वामपंथी दलों की फंडिंग की जांच से भी इसका कुछ अंदाजा मिल सकता है।

दूसरी ओर पीडीपी है। पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती की प्रेस कॉन्फ्रेंस या सार्वजनिक तकरीरें सुनी हैं आपने? उनके भाषणों में भारत और भारतीय सेना का जिक्र ऐसे होता है, जैसे वह किसी तीसरे मुल्क के बारे में बात कर रही हों। अभी हाल ही में वह पाकिस्तान गई थीं और वहां उनका जैसा भव्य स्वागत हुआ और वह उससे जितनी अभिभूत हुईं, उसका ब्योरा गूगल बाबा के शरण में जाकर कोई भी जान सकता है। कश्मीर लौटकर भी उन्होंने बार-बार पाकिस्तान की अपनी यात्रा का जिक्र इस तरह किया जैसे उनका जन्म ही इसी यात्रा के लिए हुआ था और इसके बाद वह सफल हो गया। तो इसे उनका पाकिस्तान प्रेम कहा जा सकता है। लेकिन महबूबा मुफ्ती के पाकिस्तान प्रेम का कारण समझना बहुत मुश्किल नहीं है। उनकी जवाबदेही पूरे देश के सामने नहीं है। उनका टार्गेट ऑडिएंस केवल कश्मीरी मुसलमान है और सच्चाई यही है कि आज भी कश्मीरी मुसलमान का अधिसंख्य हिस्सा भारत से प्रेम नहीं करता। उसके मन में एक अलगाव बोध (sense of alienation) है। कश्मीर (जम्मू के अलावा) में जो भारतीय पक्ष है, उसका प्रतिनिधित्व कांग्रेस के पास है, जो भारत के प्रति तटस्थ हैं और विरोधी है, उनके प्रतिनिधित्व के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी में मारामारी है। साथ ही चाहे महबूबा मुफ्ती हों या उमर अब्दुल्ला, कोई भी अलगाववादियों और आतंकवादियों से सीधे टक्कर लेकर कश्मीर में अपनी राजनीति नहीं चला सकता।

तो यही कारण है कि न तो महबूबा मुफ्ती को इस बात से कोई मतलब है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड पर शुरू हुई राजनीति से कश्मीर में अलगाववादियों को कितनी ताकत मिलेगी और न ही वामपंथियों को इससे कि परमाणु करार नहीं होने से देश की ताकत पर किस तरह का और कितना असर पड़ेगा।

Thursday, July 3, 2008

मैं एक प्रखर हिंदू हूं, लेकिन मैं आहत नहीं हूं

मेरी पत्नी एक गृहिणी हैं और राजनीति से उनका संबंध उतना ही है, जितना हमारे देश की महिलाओं (चाहे गृहिणी हों या कामकाजी) का आम तौर पर होता है। लेकिन वे अखबार पढ़ती हैं और बड़े ध्यान से पढ़ती हैं। खास बात यह है कि वे उसमें राजनीति की खबरें भी पढ़ती हैं। इस बात का पता मुझे आज सुबह तब चला जब मेरे सोकर उठते ही उन्होंने इस देश में अल्पसंख्यक के विशेषण से विशेष आदर और सम्मान पाने वाले करीब 17-18 फीसदी भारतवासियों के खिलाफ बहुत ही कड़े और उग्र विचार व्यक्त करने शुरू किए। वे विचार इतने उग्र और भड़काउ थे कि यहां उन्हें लिखने का साहस मैं नहीं जुटा पा रहा। मैं इन विचारों को सुनकर घबरा गया और पूछा कि इस तरह के अलोकतांत्रिक और अराष्ट्रीय विचारों का कारण क्या है। पता चला कि वह अमरनाथ श्राइन बोर्ड से ज़मीन वापस लेने के सरकार के फैसले से बहुत आहत थीं। मैंने सोचा कि हो न हो, उन्होंने किसी राजनेता का कोई भड़काउ बयान पढ़ लिया होगा। मैं आश्वस्त था कि उन्हें इस मुद्दे की पूरी जानकारी नहीं होगी, इसलिए मैंने उनके अज्ञान को ही उनके विचारों की काट का हथियार बनाना चाहा। मैंने पूछा कि क्या आपको पता है ये पूरा मुद्दा क्या है। उन्होंने घटना का सटीक ब्योरा भी दे दिया। फिर मैंने उन्हें समझाने के लिए कुछ दूसरी बातों का सहारा लिया, लेकिन मैं बहुत सफल रहा, इसका मुझे भरोसा नहीं है।

दरअसल इस देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हो रहे भेदभावपूर्ण रवैये पर साम्प्रदायिक और फासिस्ट करार दिए जाने से डरे बगैर मैंने हमेशा से लिखा है। यह जानने के लिए कोई डॉक्टरेट लेने की जरूरत नहीं है कि इस देश की राजनीति समय-बेसमय हिंदुओं को लतियाने-गलियाने में लेश भी नहीं हिचकती, जबकि मुसलमानों से लात-जूते और गालियां खाने पर भी दांत निपोर कर उन्हें गले लगाने को बेचैन रहती है। लेकिन अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन दिए जाने और फिर लिए जाने का खेल सामान्य राजनीति नहीं है। इस राजनीति से कश्मीर का भविष्य जुड़ा है।

इस खेल को समझने के लिए यह समझना होगा कि किस पार्टी का क्या दांव पर लगा है। कश्मीर में इस खेल के दो मुख्य पक्ष हैं। कांग्रेस और पीडीपी। कांग्रेस से कोई पूछे कि अगर पिछली आधी शताब्दी से सब कुछ ठीक ही चल रहा था, तो एकाएक बोर्ड को ज़मीन देने की जरूरत क्या पड़ गई। दरअसल ऐन चुनाव के वक्त किया गया कांग्रेस का यह खेल शाहबानो केस की याद दिलाता है। पहले मुसलमानों को खुश करने के लिए संविधान संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलना, फिर नाराज हिंदुओं को खुश करने के लिए बिना किसी उकसावे के अयोध्या के राम मंदिर के ताले खोलना। इस बार मामला थोड़ा उलटा है। पहले हिंदुओं को खुश करने के लिए अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन देना और फिर मुसलमानों को खुश करने के लिए उसे वापस लेना।

पीडीपी की राजनीति में उलझाव नहीं है। उसे कश्मीरी मुसलमानों का वोट चाहिए (वैसे भी घाटी में अब शायद ही कोई हिंदू बचा है)। इसके साथ ही उसकी जमीनी मजबूरियां हैं कि वह अलगाववादी और आतंकवादी ताकतों के सीधे निशाने पर नहीं आना चाहेगी। जिस कांग्रेस सरकार ने बोर्ड को ज़मीन दी, पीडीपी उसका हिस्सा थी और उसके उप मुख्यमंत्री ने संबंधित दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। ऐसे में चुनाव के ठीक पहले पीडीपी के इस नाटक को समझने के लिए राजनीति का पंडित होने की जरूरत नहीं है।

अब एक तीसरा पक्ष भी है, जो वैसे तो इस घटनाक्रम में पक्ष नहीं है, लेकिन भारतीय राजनीति में हिंदू हितों के एकमात्र पैरोकार के तौर पर उसका पक्ष बनना लाजिमी है। यह तीसरा पक्ष है भाजपा और विहिप का, जिन्होंने बोर्ड से ज़मीन वापस लिए जाने के विरोध में आज भारत बंद रखा है। भाजपा और विहिप आहत हैं हिंदू हितों पर हुए आघात से।

लेकिन एक प्रखर और मुखर हिंदू होने के बावजूद मैं इस भारत बंद से अलग हूं। मैं आहत नहीं हूं, क्योंकि मैं समझ सकता हूं घात और प्रतिघात की यह राजनीति। जिस तरह पीडीपी ने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए कश्मीरी मुसलमानों के मन में भारत के प्रति जहर भरा है, कुछ वही काम भाजपा और विहिप देश के मन में कश्मीरी मुसलमानों के प्रति जहर भर के कर रहे हैं।

पाकिस्तान न तो कश्मीरियों का हामी है, न उसे कश्मीर से कोई मतलब है। उसका एकमात्र उद्देश्य भारत को तोड़ना और कमजोर करना है। इस बात के पूरे संकेत हैं कि घाटी में हुआ बवाल पाकिस्तान के इशारे पर हुआ। बोर्ड को ज़मीन देने का मुद्दा अलगाववादियों और आतंकवादियों के लिए कश्मीरी जनता के बीच फिर से अपनी पकड़ बनाने का एक बेहतरीन मौका लेकर आया था। इसलिए मेरे विचार से बोर्ड से ज़मीन वापस लेकर आजाद सरकार ने एक सही कदम उठाया है। कश्मीरी जनता बोर्ड को ज़मीन देने का विरोध नहीं कर रही थी, दरअसल वह इस अफवाह के कारण सड़क पर उतरी थी कि यह जमीन स्थाई निर्माण और बाहर से लोगों को वहां बसाने के लिए दिया गया है। इस पर अड़ने का अर्थ कश्मीर अवाम में फिर यह सोच मजबूत करना होता कि बाकी देश को उसकी भावनाओं से कोई मतलब नहीं है।

यहां प्रकारांत से एक और मुद्दा भी उठा है। यह है धारा 370 का। मेरा सुविचारित मत है कि इस धारा को हटना चाहिए और कश्मीर में बाहरी लोगों के बसने का रास्ता खुलना चाहिए। लेकिन यह जोर-जबर्दस्ती से नहीं हो सकता। इसके लिए पहले कश्मीर की जनता को तैयार करना होगा। पूरी कश्मीरी जनता को खिलाफ कर हम कश्मीर को अपने साथ नहीं रख पाएंगे। वैसे भी जब राज ठाकरे जैसा देशद्रोही महाराष्ट्र से गैर मराठियों को बाहर करने का अभियान छेड़ कर जननेता कहला सकता है, तो कश्मीरियों को इसी मांग के लिए देशद्रोही कहने का हमें क्या अधिकार है?

Sunday, May 25, 2008

राजदीप के सवाल पर जयंती का 'वफादार' जवाब

राजदीप सरदेसाई का एक सवाल है, जो उन्होंने कांग्रेस नेता जयंती नटराजन से पूछा। जयंती कुछ भी जवाब दें, राजदीप के सवाल से उठने वाले सवाल वाकई मजेदार हैं। राजदीप जानना चाहते हैं कि जिस एस एम कृष्णा को कर्नाटक की सक्रिय राजनीति में उतारने के लिए महाराष्ट्र के राज्यपाल पद से इस्तीफा दिलाया गया, उन्हें पूरे प्रचार अभियान के दौरान कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी क्यों नहीं दी गई। यहां तक तो ठीक है। लेकिन इसके बाद राजदीप ने जो सवाल पूछा और जयंती ने जो जवाब दिया, वह बहुत मजेदार है।

राजदीप ने पूछा कि कृष्णा के साथ इस तरह की रणनीति के लिए जिम्मेदार कौन है, इसके लिए जवाबदेही किसकी होगी। जयंती को चाहिए था कि वे अपने पुराने नेता और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव की शैली में मुस्करा कर शांत रह जातीं। क्योंकि देश की राजनीति का ककहरा जानने वाला आदमी भी जानता है कि कृष्णा को राज्यपाल पद से इस्तीफा दिलाना सोनिया-राहुल के अलावा किसी और के वश की बात नहीं थी। कृष्णा को कर्नाटक की जिम्मेदारी देने या न देने का फैसला करने की औकात कांग्रेस में सोनिया-राहुल के अलावा किसमें है? फिर अगर कृष्णा को अगर राज्यपाल से केवल इस एक चुनाव के लिए इस्तीफा दिलाया गया, तो साफ था कि उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया जाना चाहिए था। क्या जयंती बता सकती हैं कि यह अधिकार कांग्रेस में किसके पास है?

लेकिन जिस पार्टी की पूरी राजनीति एक परिवार के प्रति वफादारी के एलान पर टिकी हुई हो, उसके किसी नेता से चुप रहने की राजनीतिक ईमानदारी की अपेक्षा भी मुश्किल है। इसलिए जयंती ने कहा, हम जरूर इसकी समीक्षा करेंगे। मतलब सोनिया की असफलता के लिए एक बार फिर कुछ और गर्दन कटेंगे। खैर, राजशाही में होता भी तो यही है।

Saturday, May 24, 2008

युवराज के दौरों से फिर तन सकेगा कांग्रेस का 'बहुरंगी' शामियाना?- 2 (अंतिम)

इसके बाद की कहानी भी दिलचस्प है। पटेल के बेटे-बेटियों का हममें से कोई नाम तक नहीं जानता, लेकिन नेहरू की बेटी पूरे देश की बेटी बन गई। गांधी जी की गोद में खेलती इंदिरा से लेकर फिरोज से विवाह के बंधन में बंधती इंदिरा तक की तस्वीरें, देश की धरोहर बनती गईं। इंदिरा को लिखी नेहरू की चिट्ठियों से साफ है कि नेहरू आजादी के पहले से ही उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाने की योजना बना चुके थे। इसके कारण समझना भी मुश्किल नहीं है। जवाहरलाल अपने जमाने के देश के गिने-चुने वकीलों में से एक मोतीलाल के बेटे थे। गोखले सरीखे विशाल कद वाले राजनेता का उनके घर आना-जाना था। राजनीति उन्हें विरासत में मिली थी। उनके पास आनंद भवन जैसा विशाल महल था। उनके पास पिता से मिली आलीशान विरासत थी। पटेल के पास कुछ नहीं था। राजनीति में उनका प्रवेश न अपने पारिवारिक रसूख के कारण था, न किसी महान राजनीतिक हस्ती से करीबी के कारण। देश के प्रति जज्बा और जनता से उनके दिल का रिश्ता ही उन्हें राजनीति में लेकर आया। इसलिए वह कभी गांधी जी को नेता मानने के बावजूद, उन्हें असीम सम्मान देने के बावजूद वह कभी उनके व्यक्तित्व में विलीन नहीं हुए। और इसलिए उनकी राजनीतिक धारा भी उनके साथ ही खत्म हो गई।

सुभाष चन्द्र बोस हों या तिलक, भगत सिंह हों लाला लाजपत राय, उन्होंने अपने सिद्धांतों की राजनीति की। न दूसरों की विरासत का बोझ ढोया, न किसी के ढोने के लिए अपनी विरासत का बोझा बनाया। लेकिन नेहरू ने वही किया। उनकी राजनीति का उद्देश्य साफ था। देश की जनता ने सोचा एक राजकुमार अगर अपना राजमहल छोड़ हमारे लिए सड़क पर आया है, तो यह उसका त्याग है। उसी त्याग की विरासत इंदिरा को मिली। शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने तक इंदिरा का कद बहुत बड़ा नहीं हुआ था। लेकिन अपनी निष्ठा की दुहाई देने वाले अर्जुन सिंह जैसे नेताओं की पहली पीढ़ी के सामने संकट था। शास्त्री जी जैसे नेताओं के रहते उनका साम्राज्य नहीं चल सकता था। इसलिए इंदिरा को मजबूत करने का काम शुरू हुआ जिसका परिणाम कांग्रेस के विभाजन के तौर पर सामने आया। इंदिरा ने तमाम राजनीतिक प्रपंच कर अपने विरोधियों को पटखनी दी, अवैध तरीके से चुनाव जीतीं और फिर अपनी सत्ता पुख्ता करने के लिए आपातकाल लगाया। लेकिन वह सब उनका बलिदान था। जैसे उन्होंने यह सब कुछ इसीलिए किया था क्योंकि उन्हें पता था कि 31 अक्टूबर 1984 को सतवंत सिंह और बेअंत सिंह उन्हें अपनी गोलियों का निशाना बनाने वाले हैं। इंदिरा जी की हत्या के बाद देश अनाथ हो गया। 80 करोड़ की जनता में इंदिरा जी के बड़े बेटे राजीव को छोड़कर एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, जो प्रधानमंत्री बन सके। इसलिए यह जानते हुए भी कि 1989 की 21 मई को श्रीपेरुंबुदूर में लिट्टे के हमले में उनकी मौत हो जाएगी, वे प्रधानमंत्री बने। जानते हुए इसलिए कह रहा हूं कि केवल तभी उनके प्रधानमंत्री बनने को बलिदान कहा जा सकेगा। उसके बाद सालों तक ना-ना कहने के बाद इटली की गलियों में खेलकर बड़ी हुईं और ब्रिटेन में पढ़ी-लिखीं सोनिया जी, जो राजीव जी से प्रेम करने के कारण पूरे भारत की बहू बन गईं, कांग्रेस अध्यक्ष बनीं। फिर उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर बलिदान की वह गाथा लिख दी, जो त्रेता युग के
राम-भरत प्रकरण के बाद दिखी ही नहीं थी। यह अलग बात है कि राम ने जंगल में जाकर जो गलती की थी, उसे न दुहराते हुए सोनिया जी ने अपने निवास 10, जनपथ को देश सेवा का वह केन्द्र बनाया जिसके कारण दुनिया की 100 सबसे प्रभावशाली हस्तियों की फोर्ब्स की सूची में प्रधानमंत्री को तो जगह नहीं मिल सकी, सोनिया जी जरूर उसमें शामिल हो गईं। अब त्याग और बलिदान की यही गाथा लिखने की तैयारी युवराज कर रहे हैं।

तो क्या कांग्रेस का बहुरंगी शामियाना फिर तन पाएगा। मुझे तो मुश्किल लगता है। क्योंकि अब जनता उतनी भावुक नहीं रही। जनता अब अपने जीवन में वास्तविक बदलाव होते देखना चाहती है। एक गरीब, तंगहाल, अछूत माने जाने वाले दलित के घर देश के सबसे बड़े ब्राह्णण का रुकना जरूर इस उपेक्षित समाज के मन पर एक अच्छी छाप छोड़ेगा। लेकिन उसके जाने के बाद उसकी झोपड़ी क्या महल बन जाएगी? क्या थाने का हवलदार उस पर डंडा फटकारना बंद कर देगा? गांव के ठाकुर साहब या पंडित जी क्या उसे हिकारत की नजर से देखना बंद कर देंगे? दूसरी ओर क्या कांग्रेस का संगठन ऐसा है, जो मन पर पड़े इस अच्छे छाप को बैलेट पेपर पर हाथ छाप में बदल पाएगा? इन सभी सवालों का जवाब नकारात्मक है।

दूसरी एक जो बात उड़ीसा के एससी, एसटी सम्मेलन में हुई, उसके भी दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। युवराज की बैठक से सभी गैर एससी, एसटी नेताओं, कार्यकर्ताओं को बाहर कर दिया गया। इसका उन कार्यकर्ताओं के मन पर क्या असर हुआ होगा? संगठन शास्त्र में हर कार्यकर्ता की भूमिका चुंबक की होती है, जो सामान्य लोहे को पहले तो खुद से चिपका कर संगठन में ले आता है और फिर धीरे-धीरे लंबे संपर्क से उसे भी चुंबक यानी कार्यकर्ता बना देता है। नए सदस्यों को पार्टी के संस्कार में दीक्षित करना भी अंतिम पंक्ति के कार्यकर्ता की ही जिम्मेदारी होती है। ऐसे में नए कार्यकर्ताओं में अपमानबोध होना या अपने कॅरियर को लेकर उनके मन में असुरक्षा का भाव पैदा होना, संगठन की कब्र खोदने के लिए काफी है।

इन सबके बावजूद अप्रैल-मई की जलती गर्मी में धूल भरे रास्तों पर घूमते हुए हर तरह से सुविधाविहीन घरों में राहुल गांधी का रुकना और देश के सबसे ज्यादा वंचित समाज की जरूरतों और उनके दुखों को समझने की कोशिश करना मुझे एक ऐसी ईमानदार कोशिश लगती है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। अगर राहुल इनमें से कुछ भी न करें तो भी अपने जीवन काल में उनका देश का प्रधानमंत्री बनना तय है। ऐसे में देश की उनकी समझ, एक आम आदमी की परेशानियों की समझ और संगठन को जमीनी स्तर पर देखने से बनी उनकी समझ का दूरगामी फायदा उनकी पार्टी और देश को होगा, यह मानने में मुझे कोई परेशानी नहीं है। राजनाथ सिंह जब भाजपा के अध्यक्ष बने थे तो भी मेरा मानना यही था कि क्योंकि वह कभी एक राष्ट्रीय नेता नहीं रहे, तो उन्हें 2 साल का समय देश के हर प्रखंड में जाकर वहां के पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच 2-3 दिन रहने, उनकी समस्याओं को समझने और संगठन से परिचय करने में लगाना चाहिए। लेकिन राजनाथ सिंह का मानना कुछ और था। उन्होंने इस समय का सदुपयोग पार्टी में दूसरी पंक्ति के अन्य नेताओं को निपटाने में, अपने बेटे की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति करने, उत्तर प्रदेश में पार्टी का अपराधीकरण करने और ठाकुरवाद फैलाने में करना ज्यादा जरूरी समझा। परिणाम सामने है कि भाजपा एक अचेत विपक्ष बन कर रह गई है।

तो अगर लेख का निचोड़ देना हो तो मैं यही कहूंगा कि युवराज यानी राहुल गांधी के जमीनी दौरों से यह उम्मीद तो नहीं है कि पार्टी एक बार फिर 50 और 60 के दशक का रुतबा पा लेगी, लेकिन खुद राहुल के लिए और पार्टी के लिए इसके कुछ फायदे हो सकते हैं। बशर्ते कि राहुल खुद पार्टी को जातिगत आधार पर बांटने का राजनीतिक खेल न खेलें और एक ऐसी पार्टी बनाने की कोशिश करें जहां पहले से मजबूत जातियां कमजोरों का हाथ पकड़ कर पार्टी प्लेटफॉर्म पर खींचने को तैयार हों।

Thursday, May 22, 2008

युवराज के दौरों से फिर तन सकेगा कांग्रेस का 'बहुरंगी' शामियाना?- 1

कांग्रेस के युवराज दलितों के घरों का दौरा कर रहे हैं और बहन जी के पसीने छूटने शुरू हो गए हैं। तीसरी-चौथी के बच्चों की आपसी लड़ाई के स्तर पर वह सार्वजिनक तौर से आरोप लगा रही हैं कि युवराज दलित के घर से जाने के बाद खास साबुन से नहाते हैं। इधर मीडिया में अटकलें लगने लगी हैं कि अपने दौरों से युवराज कांग्रेस को उसकी खोई जमीन कितनी वापस दिला पाएंगे।

दरअसल राजनीतिक विश्लेषकों को मैंने अक्सर यह कहते सुना है कि कांग्रेस आजादी के बाद चार दशकों तक अपने बहुरंगी शामियाने के भीतर देश के सभी वर्गों, सभी मजहबों और सभी जातियों को समेटे रही। लेकिन बाद में क्योंकि संकीर्ण स्वार्थों का पोषण करने वाली बहुत सी क्षेत्रीय पार्टियां भारत के राजनीतिक पटल पर उभरती गईं, तो कांग्रेस का वोट आधार बिखरता गया। मुझे लगता है कि यह उन कई झूठे सिद्धांतों में से एक है, जो आजादी के बाद से देश में योजनापूर्वक फैलाया गया है।

दरअसल आजादी के चार दशकों तक देश में कांग्रेस का एकछत्र राज्य देश की जनता के राजनीतिक भोलेपन और अशिक्षा का नतीजा था। आज भी कई कांग्रेसी बेवकूफी मिश्रित श्रद्धा से नेहरू-गांधी परिवार के बलिदानों की बात करते हैं। सिंधिया परिवार, वी पी सिंह, अर्जुन सिंह जैसे रजवाड़ों के वंशजों के प्रति उनके इलाकों के लोगों की श्रद्धा हमारी उसी वंशवादी राजनीतिक मानसिकता के प्रतीक हैं, जिनकी बात ये कांग्रेसी करते हैं। नहीं तो, अरबी हमलावरों, मुगलों और अंग्रेजों के हजार साल के शासन के बाद भी अगर कोई रजवाड़ा अपना किला, अपना ऐश्वर्य और अपना धन सुरक्षित रखने में कामयाब रहा, तो मतलब साफ है कि उसने देश और देश की जनता के खिलाफ विदेशी षड्यंत्रों में साझेदारी की, गरीबों का खून चूसा और आजादी के परवानों को अंग्रेजों के जाल में फंसाया। क्योंकि महाराणा प्रताप और भगत सिंह सरीखों के परिवारों का तो आज नामोनिशान भी नहीं मिलता, किलों और रजवाड़ों की तो बात ही क्या?

आज हम नेहरू और पटेल के विचारों, उनकी समझ, उनके सिद्धांतों और उनके जीवन के आधार पर यह विवेचना करने की कोशिश करते हैं कि देश का पहला प्रधानमंत्री किसे बनना चाहिए था। लेकिन 1947 की कल्पना कीजिए। साक्षरता दर 14 फीसदी थी, मतलब ग्रैजुएट कितने होंगे और उनमें भी ऐसे कितने होंगे जो वास्तव में अखबार पढ़ते होंगे, रेडियो सुनते होंगे। सोचिए, शायद 1 या 2 फीसदी। दूसरी ओर 85-90 फीसदी से ज्यादा ऐसी जनता थी, जो गांवों में रहती थी, साइकिल भी जिनके लिए लग्जरी होती थी और अंग्रेजी, हवाई जहाज या मोटर गाड़ी उनके लिए राजा-रानी के किस्सों का हिस्सा हुआ करते थे। जवाहरलाल नेहरू इन्हीं कहानियों के राजकुमार थे। उनकी नफासत, उनकी शेरवानी, उनकी जेब में लगा गुलाब, उनका अंग्रेजी रहन-सहन जनता के लिए ख्वाबों की तरह था और राजा की उनकी कल्पनाओं में फिट बैठता था। उनका स्वतंत्रता आंदोलन में कूदना देश और जनता पर उनकी कृपा के तौर पर देखा गया। दूसरी ओर पटेल का रहन-सहन, बोली, एटीट्यूड सब कुछ खालिस देसी था। वह चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा नहीं हुए थे, इसलिए आजादी के लिए उनका संघर्ष उनका कर्तव्य माना गया। यह मानसिकता समझना आज भी मुश्किल नहीं है। इसके बावजूद कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद के लिए पटेल को ही ज्यादा योग्य माना और यह सब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है किस तरह गांधी जी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए पहले सुभाष चन्द्र बोस को और फिर पटेल को कमजोर कर नेहरू की राह साफ की। जनता ने गांधी जी के प्रति श्रद्धा और नेहरू के प्रति अपने आह्लाद के कारण उन्हें तुरंत स्वीकार स्वीकार कर लिया। .......(जारी)

तो इसीलिए सोनिया जी को पसंद हैं पाटिल

देश के गृहमंत्री शिवराज पाटिल का मानना है कि भारत में पैदा हुआ और संसद पर हमले का आरोपी अफजल गुरू तथा पाकिस्तान की जेल में फांसी की सजा पा चुका भारतीय सरबजीत दोनों एक ही जैसे हैं। अभी तक सरबजीत का परिवार और भारत सरकार उसके मामले को 'गलत पहचान का मामला' बताते हुए उसके लिए क्षमा की मांग कर रहे थे। लेकिन पाटिल का मानना है कि सरबजीत आतंकवादी है। अगर सरबजीत आतंकवादी है और फिर भी भारत सरकार उसे छुड़ाना चाहती है, तो इसका साफ मतलब है कि उसे पाकिस्तान में आतंकवाद फैलाने के लिए भारत सरकार ने भेजा है। यानी जिस तरह पाकिस्तान भारत में आतंकवाद फैला रहा है, उसी तरह भारत पाकिस्तान में आतंकवादी भेज रहा है।

और यह कहना है देश के गृहमंत्री का। वह भी ऐसे समय में जब भारत का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल इस समय पाकिस्तान में है और कल ही हम सबने पढ़ा कि उसने पाकिस्तान सरकार को साफ कहा है कि अगर वास्तविक शांति चाहते हो, तो आतंक रोकना पड़ेगा। पाकिस्तान ने भारत को पलट कर यह नहीं कहा कि तुम भी तो आतंक फैला रहे हो, पहले उसे रोको। तो क्या हुआ, हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हमारा गृहमंत्री है न पाकिस्तान की भाषा बोलने के लिए।

हम सभी भारतीयों को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए कि हम ऐसे मूर्ख गृहमंत्री की प्रजा हैं। वैसे यह वही गृहमंत्री हैं, जो संसदीय चुनाव में अपना क्षेत्र तक नहीं जीत सके थे। जिनके पूरे राजनीतिक कॅरियर में कोई ऐसा तमगा नहीं है, जिससे इनके एक मजबूत प्रशासक होने का सबूत मिले। लेकिन सोनिया जी को गृहमंत्री बनाने के पूरी कांग्रेस में इनसे कोई योग्य आदमी नहीं मिला। पाटिल की सबसे बड़ी योग्यता है कि उनकी रीढ़ की हड्डी नहीं है। ऐसे आदमी को बैठने और खड़े होने की तो बात छोड़िए, सोने के लिए भी दो लोगों का सहारा चाहिए। फिर इससे बढ़िया व्यक्ति कौन हो सकता था देश की आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने को। सोनिया जी का अपना पूरा परिवार, यानी बेटा, बेटी, दामाद सभी देश की सबसे इलीट सुरक्षा एजेंसी से घिरे रहते हैं। फिर देश की सुरक्षा एक रीढ़विहीन के हाथ में हुई, तो क्या बुरा है?