गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

हम खुद का सम्मान करना कब सीखेंगे?

आज से ठीक एक महीना पहले 10 मार्च को दलाई लामा के निर्वासन की 49वीं सालगिरह मना रहे शांतिप्रिय तिब्बती बौद्धों के दमन से शुरू हुआ ताजा संघर्ष अब विश्वव्यापी बन गया है। किसी को नहीं मालूम कि इन 30 दिनों में कितने तिब्बती बौद्धों को मौत के घाट उतार दिया गया, कितनों को जेल में अमानवीय अत्याचार झेलना पड़ रहा है और कितने गायब हैं। इन एक महीनों में मेरे सामने चीन और तिब्बत से जुड़े जो भी लेख और समाचार आए, मैंने सभी पढ़े। अमेरिकी स्पीकर का दलाई लामा से मिलना भी जाना और चीन में भारतीय राजदूत निरुपमा राव को रात के 2 बजे बुलाकर दी गई बंदरघुड़की के बाद उपराष्ट्रपित हामिद अंसारी का दलाई लामा से अपनी मुलाकात रद्द करना भी पढ़ा। विरोध प्रदर्शनों के कारण बीजिंग के लिए चले ओलंपिक मशाल के का तीन-तीन बुझना भी पढ़ा और भारत में संभावित विरोध को कुचलने के लिए की जा रही भारी सुरक्षा तैयारियों के कारण किरण बेदी का मशाल दौड़ में शामिल होने से इंकार भी सुना।

भारत सरकार की चीन नीति की यह खास बात है। भारतीय जनता की भावनाएं कुछ और हैं, सरकार की मजबूरी (?) कुछ और है। तभी तो चीन जाकर तिब्बत के चीन का अभिन्न हिस्सा होने का ऐलान करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज सार्वजनिक तौर पर उसे दुश्मन नंबर एक मानने की घोषणा करते हैं। तभी तो एनडीए सरकार में विदेश मंत्री रहे भारतीय जनता पार्टी के थिंक टैंक पार्टी लाइन से हटकर तिब्बत की पूर्ण स्वतंत्रता का समर्थन कर बैठते हैं। चीन से जुड़ी सरकार की कथित मजबूरी के पीछ छिपे डर को हम सभी भारतीय भी स्वीकार करते हैं। हम सब चीन की सैनिक शक्ति और राजनीतिक आक्रामकता से डरते हैं। हम मतलब जनता भी और सरकार भी। लेकिन प्रतिक्रिया हम दोनों की अलग-अलग है।

मैंने इस विषय पर जितने भी लेख इस दौरान पढ़े, सभी जाने-माने विद्वानों के थे, चीन मामलों के जानकारों के थे। ये वे विश्लेषक हैं, जो वर्षों से चीन की मिजाज, उसकी ताकत, उसके स्वभाव और उसके इतिहास पर नजर रख रहे हैं। मुझे एक भी, जी बिल्कुल, मैं जोर देकर कह रहा हूं कि एक भी लेख ऐसा नहीं मिला, जो इस मुद्दे पर भारत सरकार की नीतियों को सही कह रहा हो। ठीक है, हम सैनिक, आर्थिक और राजनीतिक तौर पर चीन से उन्नीस हैं। तो क्या इसीलिए हम तिब्बत के प्रति अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को अनदेखा करते रहें? राष्ट्रवाद की बात से बहुतों को खुजली होने लगती है, तो आइए कूटनीति यानी डिप्लोमेसी की बात करते हैं। क्या चीन हमसे नाराज होकर हम पर हमला कर देगा? यह सोचना बेवकूफी है। क्योंकि अपने आर्थिक उत्थान को लेकर चीन हमसे ज्यादा गंभीर है, इसलिए 21वीं सदी के पहले दशक में वह ऐसा कभी नहीं करेगा। और फिर भी अगर हम मान लें कि वो ऐसा कर ही देगा, तो क्या हम अपनी चापलूसी से ऐसा होने से रोक लेंगे? क्या इसी डर से 1962 के पहले नेहरू ने चीन की सभी कारगुजारियों पर आंखें नहीं मूंद ली थीं?

इसी बात पर मेरी एक दिन जेएनयू के एक विद्वान मित्र (क्योंकि जेएनयू में हर कोई विद्वान ही होता है) से बातचीत हो रही थी। मैंने उनसे कहा कि नेहरू ने तिब्बत को चीन की गोद में बैठा दिया। उन्होंने मुझसे विद्वत्तापूर्ण मुस्कुराहट के साथ कहा, आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे उस समय भारत के बूते में कुछ कर लेना था। ऐसी बात अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की नासमझी में ही कही जा सकती है। वियतनाम चीन के सामने एक पिद्दी भर देश है, जिसे दुनिया में किसी बड़े देश का समर्थन नहीं है। लेकिन उसने चीन की नाक में दम तो किया हुआ है ही न। और जहां तक न रोक पाने का सवाल है, तो भारत तो तवांग में चीनी सैनिकों के घुसकर बुद्ध की मूर्ति तोड़ पाना भी नहीं रोक पाता है। फिर क्या हम अरुणाचल भी चीन को सौंप दें? खैर, मेरा सवाल भारतीय कम्युनिस्टों से नहीं है क्योंकि ऐसा होने पर शायद चीन से ज्यादा खुश वहीं होंगे जो आज भी चीन द्वारा 1962 में हड़पी गई भारतीय ज़मीन को विवादित भूमि मानते हैं।

चीन ने निरुपमा राव को रात के 2 बजे बुलाकर एक सूची दी, जिसमें उन जगहों के नाम थे, जहां ओलंपिक मशाल के दौरान विरोध प्रदर्शन होने का डर है। क्या यह सूची दिन में नहीं दी जा सकती थी? भारत सरकार ने विरोध जताना तो दूर, उपराष्ट्रपति की दलाई लामा से पहले से तय मुलाकात भी रद्द कर दी। और भारत के तमाम पिलपिले रुख के बाद भी जब चीन ने 15 देशों के राजनयिकों को तिब्बत का जायजा लेने के लिए आमंत्रित किया, तो उसमें भारत को जगह नहीं दिया गया। दूसरी ओर अमेरिका की तीसरी सबसे शक्तिशाली शख्सियत (नैन्सी पेलोसी) सात समुन्दर पार कर दलाई लामा से मिलने आईं, फ्रांस के राष्ट्रपति ने सार्वजनिक तौर पर ओलंपिक खेलों में भाग नहीं लेने की संभावना जताई, लेकिन इन दोनों देशों के राजनयिक उस टीम में शामिल किए गए। मोरल ऑफ द स्टोरी यही है कि जो अपना सम्मान खुद नहीं करना जानता, दुनिया उसे ठोकरों पर ही रखती है। कहानी का ट्विस्ट यह है कि जिस बात को आम जनता समझ रही है, चीन को समझने वाले तमाम विद्वान समझ रहे हैं, रक्षा विश्लेषक और सेना के अधिकारी समझ रहे हैं, उसे साउथ ब्लॉक में बैठे सरकारी बाबू और हमारा पिलपिला राजनीतिक नेतृत्व क्यों नहीं समझ पा रहे हैं।

4 टिप्‍पणियां:

Pankaj Parashar ने कहा…

भुवन बाबू, नमस्कार, मैं भी जे.एन.यू. से हूं लेकिन माफ कीजिये, बेहद औसत बुद्धि का हूं। मेरे जैसे और भी कई गंवार हैं वहां, और आते रहेंगे। अतएव (क्योंकि जेएनयू में हर कोई विद्वान ही होता है) जैसे व्यंग्य से मैं पूरी तरह असमहति व्यक्त करता हूं।

Ghost Buster ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने. बधाई. जेएनयू पर भी अच्छी कही.

हर्षवर्धन ने कहा…

सही है लेकिन, शायद राजनीति करने वाले अब मजबूत इरादों वाले होते ही नहीं। और, सबकुछ तो आपने कही दिया है।

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