शुक्रवार, 4 जुलाई 2008

अमरनाथ हो या परमाणु करार, बवाल की जमीन तो एक ही है

कश्मीर की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां आजकल एक ही राजनीतिक रणनीति पर काम कर रही हैं। पीडीपी ने साढ़े चार साल तक कश्मीर की सत्ता का सुख लिया, वामपंथियों ने चार साल से ज्यादा तक भारत की सत्ता का। अब जब कश्मीर में विधानसभा और देश में लोकसभा चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है, तब दोनों को ध्यान आया कि जिसके साथ मिलकर वे सत्ता का सुख ले रहे हैं, उसी के खिलाफ तो उन्हें चुनाव भी लड़ना है। पश्चिम बंगाल और केरल में कांग्रेस को गालियां देकर वामपंथियों को जहां अपने लिए वोट बटोरने हैं, वहीं कश्मीर में कांग्रेस के खिलाफ पीडीपी को जंग लड़नी है। तो दोनों ने अपने-अपने इलाकों में उन्हीं मुद्दों पर सरकार से समर्थन वापस लेने का एलान किया है, जो पिछले चार-साढ़े चार साल के सत्ता में उनकी भागीदारी के दौरान पैदा हुए और पले।

लेकिन यह गणित कोई महान गुप्त विज्ञान तो है नहीं, जिसे कोई समझ न सके। इसके बावजूद ये निर्लज्ज पार्टियां अगर इस रणनीति पर काम कर रही हैं, तो इसका मतलब है कि उन्हें पता है कि मतदाता मूलतः मूर्ख होता है और भावनाओं में बहकर ही अपने मताधिकार का इस्तेमाल करता है। सच है, कि बाद के पांच सालों में रोता-कलपता ही रहता है, लेकिन तब तक तो चिड़िया खेत चुग चुकी होती है।

दरअसल यह केवल राजनीतिक रणनीति का सवाल नहीं है, दोनों पार्टियों का चरित्र भी एक ही है। वामपंथियों का चीन प्रेम जगजाहिर है और इसके लिए वे भारत के हितों की बलि चढ़ाने से भी नहीं चूकते। खास बात यह है कि इन्हें इसमें कोई शर्म भी महसूस नहीं होती और 1962 में हुए चीन हमले, अरुणाचल, सिक्किम पर चीन के दावे और अमेरिका से परमाणु करार के अनेकों मसले पर उनके रुख को देखते हुए साफ है कि उन्हें भारत से ज्यादा चीन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने की चिंता ज्यादा होती है। इसका एक प्रकट कारण तो उनकी विचारधारा ही हो सकती है, लेकिन इसके गुप्त कारणों को जानने के लिए उस बातचीत का ब्योरा जानने की जरूरत होगी जो हर कुछ महीनों पर चीन जाने वाले वाम दलों के प्रतिनिधिमंडल और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के बीच होती है। वामपंथी दलों की फंडिंग की जांच से भी इसका कुछ अंदाजा मिल सकता है।

दूसरी ओर पीडीपी है। पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती की प्रेस कॉन्फ्रेंस या सार्वजनिक तकरीरें सुनी हैं आपने? उनके भाषणों में भारत और भारतीय सेना का जिक्र ऐसे होता है, जैसे वह किसी तीसरे मुल्क के बारे में बात कर रही हों। अभी हाल ही में वह पाकिस्तान गई थीं और वहां उनका जैसा भव्य स्वागत हुआ और वह उससे जितनी अभिभूत हुईं, उसका ब्योरा गूगल बाबा के शरण में जाकर कोई भी जान सकता है। कश्मीर लौटकर भी उन्होंने बार-बार पाकिस्तान की अपनी यात्रा का जिक्र इस तरह किया जैसे उनका जन्म ही इसी यात्रा के लिए हुआ था और इसके बाद वह सफल हो गया। तो इसे उनका पाकिस्तान प्रेम कहा जा सकता है। लेकिन महबूबा मुफ्ती के पाकिस्तान प्रेम का कारण समझना बहुत मुश्किल नहीं है। उनकी जवाबदेही पूरे देश के सामने नहीं है। उनका टार्गेट ऑडिएंस केवल कश्मीरी मुसलमान है और सच्चाई यही है कि आज भी कश्मीरी मुसलमान का अधिसंख्य हिस्सा भारत से प्रेम नहीं करता। उसके मन में एक अलगाव बोध (sense of alienation) है। कश्मीर (जम्मू के अलावा) में जो भारतीय पक्ष है, उसका प्रतिनिधित्व कांग्रेस के पास है, जो भारत के प्रति तटस्थ हैं और विरोधी है, उनके प्रतिनिधित्व के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी में मारामारी है। साथ ही चाहे महबूबा मुफ्ती हों या उमर अब्दुल्ला, कोई भी अलगाववादियों और आतंकवादियों से सीधे टक्कर लेकर कश्मीर में अपनी राजनीति नहीं चला सकता।

तो यही कारण है कि न तो महबूबा मुफ्ती को इस बात से कोई मतलब है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड पर शुरू हुई राजनीति से कश्मीर में अलगाववादियों को कितनी ताकत मिलेगी और न ही वामपंथियों को इससे कि परमाणु करार नहीं होने से देश की ताकत पर किस तरह का और कितना असर पड़ेगा।

4 टिप्‍पणियां:

संजय बेंगाणी ने कहा…

भारतीयों को आस्तीन के साँप पालने का शौक है.

निशाचर ने कहा…

बहुत सही आंकलन है....
ये वही महबूबा मुफ्ती हैं जिनकी बड़ी बहन डा0 रुबिया सईद के अपहरण (या अपहरण का नाटक) होने पर बदले में उनके पिता और देश के तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने पॉँच आतंकवादिओं को रिहा कर दिया था. ये देश के गद्दार ही तो हमारे देश को दीमक की तरह चाट रहे हैं..........

Cyril Gupta ने कहा…

कश्मीर के सेबों में ख़ून की सुर्ख़ी है.

जो कश्मीरी लोग भारत के विरोध में हैं वो कट्टरपंथियों की तकरीरों से बहके हुये हैं. मज़हब सारे फसाद की जड़ है. तो नास्तिक होना भला.

Som ने कहा…

It's part of politics. Now, it's on the people to play their part.

The voting pattern of people and behaviour of political parties are inter-linked but what is hurting more if people vote party under influence rather on rational. It exactly happening in West Bengal.