मंगलवार, 28 अक्तूबर 2008

मराठा गृहमंत्री की इस मर्दानगी पर लाखों राहुल राज न्योछावर

महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेता शिवराज पाटिल जैसे रीढ़विहीन गृहमंत्री को पांच साल से झेलते-झेलते हम भूल गए हैं कि यह एक ऐसा मंत्रालय है, जिसके ऊपर देश की आंतिरक सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है और इसलिए इसकी अगुवाई करने वाला नेता ऐसा होना चाहिए जो राज्य के प्रति अपराध करने वालों के लिए अपने-आप में एक सख्त संदेश हो। ऐसी विस्मृति के दौर में ही आज जब एकाएक एक और मराठा गृहमंत्री आर आर पाटिल का संदेश सुना तो नसों में रोमांच दौड़ गया। महाराष्ट्र राज्य के मराठा गृहमंत्री आर आर पाटिल ने कहा है कि जो भी कानून के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश करेगा और लोगों को डराएगा, उसे गोली से जवाब दिया जाएगा। छोटे पाटिल साहब ने ये वीरतापूर्ण उद्गार व्यक्त किए वीर मराठा पुलिस की उस मुठभेड़ को जायज ठहराने के लिए, जिसमें बिहार के एक बेरोजगार युवक को इसलिए गोली मार दी गई थी, क्योंकि वह एक बस को 'हाईजैक' कर रिवॉल्वर लहराते हुए मुंबई के कमिश्नर से बातचीत करने की जिद कर रहा था।

एक बिहारी होने के नाते, पिछले कुछ महीनों से मुंबई और महाराष्ट्र में बिहारियों और उत्तर भारतीयों के खिलाफ जो कुछ हो रहा है, उस पर मेरा मन भी आक्रोश से भरा है। वोट की राजनीति के धुन में पागल एक राज ठाकरे ने दोनों राज्यों के करोड़ों लोगों के बीच जिस तरह का अविश्वास और जैसी तल्खी पैदा की है, उससे एक बिहारी को ही नहीं, हर भारतवासी को क्षुब्ध होना चाहिए। लेकिन छोटे पाटिल साहब इससे क्षुब्ध नहीं हुए। राज ठाकरे के गुंडे भारत के अन्य प्रांतों के नागरिकों को सड़कों पर दौड़ाते रहे, उत्तर भारतीय टैक्सी चालकों की टैक्सियों के शीशे तोड़ते रहे, बिहारियों, राजस्थानियों की दुकानें जलाते रहे, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के गरीब, दिहाड़ी मजदूरों को सरेआम पीटते रहे, लेकिन उससे न तो कानून का उल्लंघन हुआ और न ही कोई भयभीत हुआ। क्योंकि अगर इन दोनों में से कुछ भी हुआ होता, तो पौरुष से लबरेज छोटे पाटिल साहब ने इन तमाम गुंडागर्दियों की जड़ में राजनीति सेंक रहे देशद्रोही राज ठाकरे को भी गोलियों से जवाब दिया होता, जैसा कि उन्होंने 'बिहारी माफिया राहुल राज' (आर आर पाटिल कम से कम इस विशेषण के लिए जरूर बाल ठाकरे से सहमत होंगे) को दिया।

राहुल राज पटना के एक प्रतिष्ठित प्रोफेसर का बेटा था, जो कि परसों नौकरी की तलाश में मुंबई पहुंचा था। उसने उस कृत्य को अंजाम देने की कोशिश की, जो आज हर देशभक्त आपसी बातचीत में अनौपचारिक तौर पर एक-दूसरे से कह रहा है, 'राज ठाकरे जैसे पागलों को तो सड़क पर खड़ा कर गोली मार देना चाहिए।' लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि आपसी बातचीत में जिस तरह आप अपना आक्रोश निकालते हैं, उसे आप हकीकत में भी अंजाम देने लगें। राहुल राज ने जो किया, उसके बाद वह न केवल कानून का बल्कि समाज का भी अपराधी हो गया था। बहस इस बात पर है भी नहीं कि वह अपराधी था कि नहीं। बहस इस बात पर है कि क्या वह दर्जे का अपराधी या आतंकवादी था, जिसे गोली मार देनी चाहिए थी। पूरी बस में एक आदमी, हाथ में एक रिवॉल्वर, किसी यात्री को नुकसान न पहुंचाने की उसकी चीखें, कमिश्नर से बातचीत करने के लिए मोबाइल की मांग क्या ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करती हैं, कि उसे सीधे सिर में और पेट में शूट कर दिया जाना चाहिए था।

और इन सबसे बढ़कर एक सवाल यह है कि नौकरी की तलाश में आया एक मध्यवर्गीय युवक अगर किसी ऐसे गुंडे को मारने के लिए हथियार उठा रहा है, जो न तो किसी विचारधारा के तौर पर और न ही किसी व्यक्तिगत तौर पर उसका दुश्मन है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? वह क्या उसकी उस कुंठा का चरम नहीं है, जो सरकार की अकर्मण्यता और समाज की राजनीतिक चुप्पी से पैदा हुई है? क्या एक राहुल राज को माफिया करार देकर गोली मार देने से मध्यवर्गीय युवाओं के उस विद्रोह और कुंठा को भी जवाब मिल पाएगा, जो कि न जाने कितने लाख दिलों में धधक रही है?

2 टिप्‍पणियां:

Paliakara ने कहा…

महाराष्ट्र पुलिस ने घोर अनुत्तरदायित्व पूर्ण व्यवहार का परिचय दिया है. गृह मंत्रियों कि भूमिका भी निंदनीय है. वोटों कि राजनीति देश को कहाँ ले जा रहा है?

http://mallar.wordpress.com

संजय बेंगाणी ने कहा…

किसे नहीं मारना चाहिए? जो अफजल गुरू जैसा आतंकवादी हो...राहूल को तो मारना ही चाहिए था. शौराबूद्दीन व बटाला में मारे गए आतंकीयो के लिए हाय तौबा मचाईए...राहूल के साथ तो ठीक ही हुआ.