शुक्रवार, 18 जून 2010

अभी और होंगे बहुत से भोपाल

मैक्सिको की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम की तरफ से हुई तबाही और उस पर सख़्त अमेरिकी रुख़ के बाद कंपनी द्वारा चुस्ती से कार्रवाई करते हुए 20 अरब डॉलर का मुआवज़ा दिए जाने की घटना से भारतीयों के मन में क्षोभ है, गुस्सा है। अमेरिकी भेदभाव का गुस्सा। यूनियन कार्बाइड और डाओ केमिकल की उदासीनता का गुस्सा। यह गुस्सा इस बात का प्रमाण है कि अभी और भी बहुत से यूनियन कार्बाइड होने बाकी हैं। यह गुस्सा इस बात का प्रमाण है कि भारत अब भी ग़ुलाम मानसिकता के साथ जी रहा है। आंखों में महाशक्ति बनने के सपने के बावजूद हृदय की गहराइयों में हम ग़ुलाम हैं।

कोई हमारे देश में आकर हमारी ही धरती पर क़त्ल-ए-आम करके चला जाता है और उसे न केवल क़त्ल करने के बाद निकलने में, बल्कि क़त्ल करने में भी वे लोग सहयोग देते हैं, जिनके लिए हम जय-जयकार के नारे लगाते हैं। फिर भी, हमारा गुस्सा ओबामा और बीपी पर निकलता है। चुरहट लॉटरी में करोड़ों की रकम डकारने वाले (जिसमें यूनियन कार्बाइड ने भी कुछ करोड़ रुपए का 'अनुदान' दिया था) अर्जुन सिंह तिल-तिल मरने वाले उस समाज में आज भी सुरक्षित घूम रहे हैं। उनके घर में अब भी आग नहीं लगाई गई है।

एंडरसन को देश से निकालने में सूत्रधार की भूमिका निभाने वाले राजीव गांधी की बेवा आज भी चुपचाप मूर्ख, जाहिल और तलवे चाटने वाले कांग्रेसियों की भगवान बनी हुई है, 6 साल के अपने केंद्रीय शासनकाल और 10 वर्षों से ज्यादा से अपने राज्य शासन के दौरान चुपचाप भोपाल को मरते देखने वाली और वोट मांग कर सत्ता का जश्न मनाने वाली भारतीय जनता पार्टी के निर्लज्ज नेता अब भी अपने एयरकंडीशन मीडिया रूम में बैठकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं। उनके घर और कार्यालय अब भी मटियामेट नहीं हुए। तो ओबामा और बीपी की न्यायप्रियता पर सवाल उठाना क्या केवल हमारी नपुंसक ग़ुलाम मानसिकता का परिचायक नहीं है।

तुलसीदास 500 साल पहले ही कह गए थे- समरथ को नहीं दोष गोसाईं। जनसंहार के हथियारों की काल्पनिक कहानी बनाकर इराक को नेस्तोनाबूद कर देने की कहानी दरअसल अमेरिका के सामर्थ्य की ही कहानी है। दूसरी तरफ महाशक्ति बनने की गाल बजाने वाला भारतीय नेतृत्व है, जो पाकिस्तान की ज़मीन में तमाम आतंकवादियों की जड़े होने के पुख्ता प्रमाण के बावजूद वर्षों से अमेरिका से अनुरोध ही करता जा रहा है कि वह पाकिस्तान को रोके। भीख में केवल रोटी के टुकड़े मिलते हैं, आत्मसम्मान और जीने का अधिकार नहीं। यह बात पता नहीं भारत की जनता कब समझेगी। अपनी बहन और बेटी की इज़्जत बचाने के लिए अगर हम गांव के ज़मींदार का दरवाजा खटखटाएंगे, तो बदले में वह उसी बहन और बेटी का एक रात का नजराना तो मांगेगा ही। अपने बुजुर्ग पिता के सम्मान के लिए अगर हम अपने पड़ोसी के आगे गिड़गिड़ाएंगे, तो अपनी महफिल में पानी पिलाने के लिए हमारे पिताजी की सेवाएं तो वह मांगेगा ही।

माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले मेरे एक मित्र हैं, जिन्होंने एक दिन कहा कि भोपाल गैस पीड़ितों ने सैकड़ों की संख्या में वर्षों तक जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन किया और बदले में उन्हें क्या मिला? धोखा, अन्याय और मौत। यही लोग अगर हाथ में हथियार लेकर सड़कों पर उतर जाएंगे, तो उन्हें माओवादी कहकर उनके खिलाफ सेना उतार दी जाएगी। नैतिकता, अध्यात्म और राष्ट्रवाद के तर्क की कसौटी पर इसके खिलाफ बहुत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन भावुकता के मोर्चे पर क्या वास्तव में यह लाजवाब नहीं है? जिसके घर दिन-रात मौत का तांडव हो रहा हो, जिसके देखते-देखते जिसकी पीढ़ियां अपंगता और लाचारी के अंधकूप में समा गई हों, वह नैतिकता, अध्यात्म और राष्ट्रवाद के तर्क समझेगा या नक्सलवाद के करारे जवाब का तर्क। यहां मजेदार बात यह है कि अर्जुन सिंह का बचाव करने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह नक्सवादियों के ज़बर्दस्त पैरोकार भी रहे हैं।

भोपाल पर चल रहे हंगामें में रोज नए खुलासे हो रहे हैं। लेकिन इन खुलासों से जितने जवाब मिल रहे हैं, उनसे कहीं ज्यादा सवाल खड़े हो रहे हैं। इन तमाम सवालों के बीच एक जवाब तो मुझे साफ समझ आ रहा है कि पिछले हजार सालों में हम भारतीयों की ग़ुलाम मानसिकता और परमुखापेक्षी स्वभाव में कुछ भी बदलाव नहीं आया है। जब तक हम अपने घर की सुरक्षा के लिए अमेरिका, चीन और पाकिस्तान से भीख मांगते रहेंगे, तब तक कई यूनियन कार्बाइड कई भोपाल बनाते रहेंगे और हमारी कई पीढ़ियां मानसिक और शारीरिक तौर पर विकलांग पैदा होती रहेंगी।

8 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप सही कहते हैं, जब तक मुनाफाखोरी की व्यवस्था कायमं रहेगी यह सब चलता रहेगा।

Maria Mcclain ने कहा…

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Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

सत-प्रतिसत सहमत हूँ आपसे | मेकाले की दी हुई हमारी शिक्षा पद्धति हमें आरम्भ से ही गुलामी वाली मानशिकता की ओर ले जाती है |

कदम कदम पे नेताओं, ख़ास कर, कांग्रेस सरकार की बयानबाजी आम लोगों के घाव पे नमक छिडके जा रही है जा रही है ... फिर भी हम चुप चाप बैठे हैं ... कर भी क्या सकते हैं, कर भी क्या सकते हैं ?

prabuddhajain.com ने कहा…

अगर न्युक्लियर लायबलिटी बिल यूंही पास हो गया तो इस मुल्क़ में कभी किसी भोपाल की कोई ख़ास ज़िम्मेदारी नहीं होगी। एक तथाकथित उभरती सुपरपावर की औकात शायद यही है। इसी बारे में लिखा था कल अपने ब्लॉग पर।

Umra Quaidi ने कहा…

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”

hr consultants ने कहा…

अंधेर नगरी चोपट राजा |
टेक सेर भाजी टेक सेर खाजा |
क्या होगा मेरे भारत का ?

बन्‍धुवा मजदूर सविंदा कार्मिक ने कहा…

नये किस्‍म के बन्‍धुवा मजदूरो पर एक ब्‍लाग

http://contract-labour.blogspot.com

ravi ranjan kumar ने कहा…

अनुकरण पर आधारित तरक्की और ३५ रुपये की अमीरी ने हमें सबसे पहले हमारी मौलिकता से दूर करता है. अपने मूल को पहचान कर ही हम आत्मविस्वास को पा साकते हैं