बुधवार, 12 अगस्त 2009

भारत के 20-30 टुकड़े करने के चीनी सपने का तोड़

चीन के एक थिंक टैंक की चीन सरकार को सलाह है कि भारत के 20-30 टुकड़े कर देने चाहिए। उनकी यह सलाह एक अर्द्धसरकारी वेबसाइट पर प्रकाशित हुई है। हालांकि इस स्पष्टीकरण का कोई खास मतलब है नहीं, क्योंकि चीन में वैसे भी प्रकाशित या प्रसारित होने वाली हर राय सरकारी ही होती है। और ऐसा भी नहीं है कि इस राय के सामने आने से पहले तक किसी को भारत के प्रति चीन की शुभेच्छा पर कोई संदेह था। तो ऐसे में यह राय प्रकाशित करने के लिए हमें उन थिंक टैंक महोदय का शुक्रगुज़ार होना चाहिए। क्योंकि उन्होंने एक ओर तो हमारी आंखों से जबरिया दोस्ती का यूटोपियन चश्मा नोंचने की भरपूर कोशिश की है, दूसरी ओर उन्होंने हमारी तमाम कमजोरियों को सूचीबद्ध कर हमारे सामने खुद की मजबूती का एक लक्ष्य भी दे दिया है।

गांधी जी की अनूठी और सफल रणनीति ने अपने देश में शांति को महिमामंडित करने का फैशन कुछ इस कदर चला दिया है, कि मजबूती की बात करने वाले तुरंत उपद्रवी करार दिया जाता है। यह अलग बात है कि खुद गांधी जी मजबूती की एक जीती-जागती मिसाल थे और उनका मानना था कि बिना मजबूती के शांति की चाह दूसरों की कृपा पाने की गुहार से ज्यादा और कुछ नहीं है। चीन ने हाल के वर्षों में जो आर्थिक और सामरिक ताकत बढ़ाई है, उसके बाद भारत उसके सामने एक बच्चा लगता है। आजादी के 62साल बाद हमने जो पहली परमाणु पनडुब्बी अरिहंत बनाई है, उस तरह की 10 पनडुब्बियां पहले से ही चीन की नौसेना का अंग हैं। चाहे अंतरमहाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्र हों या अत्याधुनिक युद्धक विमानों का दस्ता, हर मोर्चे पर चीन हमसे दशकों आगे है। अरुणाचल और सिक्किम में हमने अब सड़कें और हेलीपैड बनाने पर जोर देना शुरू किया है, जबकि चीन भारत की सीमा से लगने वाले हर इलाके तक ट्रेन और सड़कों का जाल आज से 5 साल पहले बिछा चुका है।

चीन के थिंक टैंक महोदय ने भारत के टुकड़े करने की जो रणनीति बताई है, उसमें दो मसले हैं। एक तो भारत के अंदर सक्रिय आतंकवादी गुटों को बढ़ावा देना और दूसरा भारत के पड़ोसी देशों, पाकिस्तान, बंगलादेश, म्यांमार आदि का सहयोग लेना। यानी हमारे दुश्मनों और हमारी कमजोर नसों की पहचान बहुत साफ है। आतंकवाद के प्रति हमारी नीति के बारे में तो बहुत कुछ कहा-सुना जा चुका है। लेकिन विदेश नीति के मोर्चे पर नजर डालें, तो वहां भी चीन हमसे मीलों आगे है। पाकिस्तान की बात छोड़ देते हैं, लेकिन बंगलादेश के साथ हमारे संबंध पूरी तरह दल आधारित हैं। शेख हसीना की सरकार के रहते बंगलादेश, भारत का मित्र है। लेकिन जैसे ही सत्ता खालिदा ज़िया के हाथ में आएगी (जो कि लगभग हर पांच साल बाद होता है), बंगलादेश, भारत विरोधी गतिविधियों का केन्द्र बन जाएगा। अफसोस यह है कि इस स्थिति के जो ऐतिहासिक कारण है, उन्हें हम चाह कर भी बदल नहीं सकते।

म्यांमार में परेशानी यह है कि वहां एक ऐसी सैनिक सरकार है, जिसके लिए मानवाधिकार और मौलिक स्वतंत्रता गालियों की तरह हैं। भारत भले ही चीन के दबाव में म्यांमार का दोस्त होने की कसमें खाए, लेकिन म्यांमार की सरकार को पता है कि दोनों देशों की आत्माएं भिन्न हैं और इसलिए तमाम कूटनीतिक संबंधों के बावजूद वह चीन के साथ ज्यादा आत्मीय अनुभव करती है। नेपाल में एक बार तो नियति ने भारत को बचा लिया है, लेकिन कितनी बार बचाएगी, कहना कठिन है। श्रीलंका में लिट्टे से लड़ने की वहां की सरकार की तैयारियों में जिस तरह पाकिस्तान और चीन ने सहयोग किया, उसके बाद उनके आपसी संबंध वहीं खत्म हो जाएंगे, यह सोचना भोलापन ही होगा। साफ है कि हमारे पड़ोसी देशों के साथ हमारे संबंधों की सीमाएं हमारी सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन, इन सीमाओं को तोड़ कर इन चुनौतियों को हल करने का कोई विकल्प भी नहीं है। भारत को किसी भी हालत में यह करना होगा और इसके लिए हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।

पड़ोस से अलग हट कर अगर देखें, तो भारतीय राजनीतिक नेतृत्व की अक्षमता और अकर्मण्यता के असली दर्शन होते हैं। पिछले करीब एक दशक की कोशिश से चीन ने अफ्रीका को अपने आर्थक हितों का जबर्दस्त केन्द्र बना लिया है, जबकि भारत ने अब इस बारे में कोशिशें शुरू की हैं। हिंद महासागर में स्थित दसियों द्वीप देशों के साथ चीन के संबंध इस हद तक मधुर हो गए हैं कि वहां उसने नौसैनिक अड्डे बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। श्रीलंका में एक चीनी नौसैनिक अड्डे ने काम करना भी शुरू कर दिया है और हालत यह है कि मॉरीशस जैसे देश से भी भारत के मुकाबले चीन के संबंध ज्यादा अच्छे हो गए हैं। हिंद महासागर में फैले छोटे-छोटे देशों में चीन ने योजनाबद्ध तरीके से एक निश्चित अंतराल पर अपने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख, चीन के सेना प्रमुख जैसे अधिकारियों को भेजना जारी रखा है, जबकि इनमें से कई ऐसे भी देश हैं, जहां पिछले छह दशकों में एक भी भारतीय राष्ट्राध्यक्ष नहीं गया।

इन परिस्थितयों में स्वाभाविक ही है कि चीन के थिंक टैंक महोदय भारत को 20-30 टुकड़ों में तोड़ने का सपना देख रहे हैं। इस सपने का तोड़ इसका विरोध नहीं है, बल्कि इसका तोड़ रणनीतिक और कूटनीतिक तौर पर खुद को उस हद तक मजबूत करना है कि चीन के थिंक टैंक महोदय अपनी सरकार को शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की सलाह देने पर मजबूर हों और भारत से इसलिए डरें कि कहीं सैनिक ताकत के बल पर बनी उनकी राष्ट्रीय एकता के 20-30 टुकड़े न हो जाएं...

3 टिप्‍पणियां:

अर्शिया अली ने कहा…

Vichaarneey.
{ Treasurer-S, T }

एकलव्य ने कहा…

मैंने भी समाचार पत्र में पढ़ा था यह भड़ास किसी चीनी ब्लागर ने निकाली थी .

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

हमारे नेताओं को वोट बैंक, मुस्लिम तुस्टीकरण, जातिगत राजनीति, परिवारवाद से फुर्सत मिले तब ना देश की बारे मैं सोचेंगे ?

जहाँ तक देश के टुकड़े की बात है तो मैं समझता हूँ हमर देश तो already 20-30 टुकडों मैं बता हुआ है | हम तमिल, मराठी, मलयाली, बिहारी, पंजाबी .... है, भारतीय हैं कहाँ ?

आज अपने देश मैं "कुपथ पथ जो रथ दौडाता, पथ निर्देशक वही है |"