बुधवार, 2 सितंबर 2009

हे ईश्वर, इन गहलोतों को चिदंबरम की सद्बुद्धि दे

दिल्ली और दूसरे संघ शासित राज्यों में अब किसी भी टुच्चे नेता या अपराधी विधायक के लिए एक फोन कॉल पर एसएचओ या इंस्पेक्टर का तबादला करवा देने सरीखी धमकी शायद अब काम न आ सके। चिदंबरम ने पुलिस सुधार की दिशा में पहला कदम बढ़ाते हुए यह व्यवस्था कर दी है कि साधारण परिस्थितियों में इंस्पेक्टर या उससे ऊपर दर्जे के पुलिस अधिकारियों को कम से कम 2 साल से पहले ट्रांसफर नहीं किया जा सकेगा। सभी केन्द्रशासित प्रदेशों में राज्य सुरक्षा आयोग बनेंगे, जो पुलिस महकमे के लिए नीतियां तैयार करने के अलावा पुलिस अधिकारियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन भी करेंगे।

इसके अलावा दो और बोर्ड बनेंगे, जो पुलिसकर्मियों के ट्रांसफर, उनकी पोस्टिंग और प्रमोशन के अलावा उनकी नौकरी से जुड़े दूसरे तमाम फैसले करेंगे। एक बोर्ड इंस्पेक्टर और उससे ऊपर रैंक के अधिकारियों के लिए होगा और दूसरा सब इंस्पेक्टर और उससे नीचे रैंक के लिए। सबसे अच्छी बात यह है कि उन बोर्डों में जनता के कथित सेवकों की कोई भूमिका नहीं रहेगी (अगर कोई चोर दरवाजा बचा रखा गया हो, तो कम से कम अब तक तो उसकी जानकारी नहीं है।)

ये फैसले दिल को खुश करने वाले हैं और पुलिसिया अत्याचार एवं पुलिस-राजनीति गठजोड़ से त्रस्त समाज के लिए उम्मीद की किरण जगाते हैं। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह भी है कि देश के 28 राज्यों का इन सुधारों के प्रति क्या नजरिया है। इसकी एक बानगी राजस्थान सरकार ने दी है। गहलोत सरकार ने अपने अधिकारियों के लिए एक निर्देश जारी किया है, जिसमें ताकीद की गई है कि अगर किसी विधायक या सांसद के आने पर अफसर अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा नहीं होगा, तो उसका निजी रिकॉर्ड खराब कर दिया जाएगा। कहा गया है कि कोई भी विधायक या सांसद कभी भी किसी भी अधिकारी से अगल मिलना चाहे, तो उसे प्राथमिकता से समय देना होगा। मानो, अधिकारियों का एकमात्र 'सब्जेक्ट' ये माननीय जनप्रतिनिधि ही हैं।

इसके अलावा ज्यादातर राज्यों ने भी इन सुधारों के प्रति अनिच्छा ही जताई है। यह स्वाभाविक ही लगता है क्योंकि किसी भी राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी पुलिस के जरिए ही अपनी राजनीतिक ताकत का सही-ग़लत इस्तेमाल कर पाती है। फर्ज़ कीजिए कि अगर बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार के हाथ में राज्य पुलिस की लगाम न होती, तो क्या वामपंथी गुंडे सिंगूर और नंदीग्राम में पाशविकता का वो नंगा नाच कर पाते, जैसा कि उन्होंने किया। मान लीजिए कि गुजरात के पुलिस प्रमुख को यह डर न होता कि मोदी सरकार उन्हें किसी पुलिस महाविद्यालय का प्रिंसिपल बना देगी, तो क्या गोधरा नरसंहार के बाद हुए दंगों में उसकी भूमिका अधिकतर मामलों में मूकदर्शक की होती।

याद कीजिए जयललिता के शासनकाल में टेलीविजन पर दिखे वे दृश्य, जब कुछ पुलिस अधिकारी आधी रात के अंधेरे में पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि को लगभग घसीटते हुए लेकर गए थे। क्या पुलिस पर नियंत्रण के बिना जयललिता द्वारा प्रशासन का इतना घृणित इस्तेमाल संभव था। जब लालू यादव चारा घोटाले के सिलसिले में पटना हाईकोर्ट की पेशी पर पहुंचते थे, तो पटना की डीएम राजबाला वर्मा वहां उनकी कार का दरवाजा खोलने के लिए पहले से ही मौजूद होती थीं। अगर पुलिस सुधार लागू हो जाएंगे, तमाम राज्यों की गद्दी पर बैठे घोटालाबाज लालुओं का क्या होगा?

ऐसे में चिदंबरम ने 7 केन्द्रशासित प्रदेशों की जनता पर जो उपकार किया है, उसके लिए उन्हें मेरी ओर से बधाई। ईश्वर करे दूसरे गहलोतों, मोदियों, लालुओं और जयललिताओं को भी सद्बुद्धि आए, क्योंकि ये महानुभाव हमेशा सत्ता में नहीं रहने वाले और फिर जब वसुंधराएं, नीतीशों और करुणानिधिओं के हाथ में सत्ता आएगी तो उसका शिकार वे खुद भी होंगे। जनता का क्या है, अगर पुलिस सुधार नहीं हुए तो शासन किसी का भी हो, उसके लिए तो हर हाल में ही खाकी खौफ का प्रतीक है।

3 टिप्‍पणियां:

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

काफी सधा विश्लेषण किया है आपने | ये समाचार मेरे लिए तो नया ही है |

शशंकित इस बात को लेकर हूँ की पुलिस या सरकारी अधिकारी को इस हद तक गिराने मैं चिदंबरम की पार्टी कांग्रेस का योगदान सबसे ज्यादा है | और जब खुद कांग्रेस शासित राज्यों मैं इसका अनुपालन नहीं हो रहा तो और क्या कहा जाए ? हो सकता है इसी बहाने कांग्रेस सरकार गैर कांग्रेस शासित राज्यों मैं अपना उल्लू सीधा करना चाहता हो !

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

खैर जो भी हो, आपके लेखसे तो यही प्रतीत होता है की चिदंबरम का कदम अच्छा है | औए अच्छे कदम का स्वागत होना ही चाहिए |

संजय भास्कर ने कहा…

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