इमाम अब्दुल्ला बुखारी ने पत्रकारों से भरे प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार को खुद भी पीटा और अपने गुंडों से भी पिटवाया। एक उर्दु अखबार के उस पत्रकार का दोष यह था कि उसने एक ऐसा सवाल पूछ लिया था, जो बुखारी को पसंद नहीं आया। सवाल था कि 1528 में अयोध्या के राम जन्मभूमि का खेसरा राजा दशरथ के नाम था। तो राजा रामचंद्र ही उसके स्वाभाविक उत्तराधिकारी होंगे। यह बात उच्च न्यायालय ने भी स्वीकार की है और सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जिलानी को भी इसकी जानकारी है। तो आपसी भाईचारे के लिए मुसलमान भाई क्यों नहीं राम जन्मभूमि हिंदुओं को सौंप देते। सवाल सुनने भर की देरी थी कि एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक मुस्लिम पूजा स्थल के मुख्य पुजारी ने गुंडों की भाषा में चिल्लाते हुए पत्रकार अब्दुल वहीद चिश्ती को गंदी और भद्दी गालियां दीं, उन्हें कौम का दुश्मन करार दिया और उनका सर कलम करने का आदेश दिया।
कल्पना कीजिए कि इस घटना में बुखारी की जगह विश्व हिंदू परिषद या बजरंग दल का कोई नेता होता या किसी प्रतिष्ठित मंदिर के पुजारी होते, तो क्या होता। एनडीटीवी जैसे सेकुलर चैनल की अगुवाई में तमाम फेसबुकिए सेकुलरों ने हंगामा खड़ा कर दिया होता। देश के गृहमंत्री ने तो पहले ही आतंकवाद पर भगवा रंग पोत दिया है, अब हिंदू संगठन और पुजारियों के लिए भी नए-नए विशेषण गढ़े जा रहे होते। लेकिन देखिए सेकुलरिज्म का चमत्कार। सेकुलरों के मुंह पर ताला जड़ा है। बुखारी की गुंडागर्दी का यह पहला उदाहरण नहीं है। अभी कुछ साल पहले इसने जी न्यूज के एक पत्रकार (इत्तेफाक से वह भी मुस्लिम थे) पर भी हमला करवाया था। इसके बावजूद मुझे याद नहीं आता कि बात-बात में हिंदू प्रतीकों, संगठनों और परंपराओं पर नाक-मुंह बिचकाने वाले सेकुलरों ने कभी औपचारिकता के लिए भी इसके खिलाफ अपने जीमेल स्टेटस में या फेसबुक लेबल में विरोध दर्ज कराया हो।
यही है भारत में सेकुलरिज्म का असली चरित्र। क्योंकि खुद को हिंदू विरोधी नहीं कह सकते, तो सेकुलर कहा जाता है। इन्हें मुसलमानों से भी प्रेम नहीं है। इन्हें बुखारियों, मदनियों और गिलानियों से प्रेम है। कोई मुसलमान इन लोगों के खिलाफ खड़ा होकर तो देखे, समर्थन तो दूर की बात ये सेकुलर उन्हें सहानुभूति देने तक नहीं आएंगे। अफसोस की बात यह है कि इसमें आप और हम तो क्या कहें, खुद ये सेकुलर भी कुछ नहीं कर सकते। इनकी मानसिक रचना ही कुछ ऐसी है, जन्मगत संस्कार ही कुछ ऐसे हैं। हिंदू संस्कृति और गौरव से जुड़ी हर बात का विरोध करने में इन्हें असीम आनंद का अनुभव होता है और उसी से उन्हें ऊर्जा भी मिलती है। इसलिए इनमें सुधार की उम्मीद व्यर्थ है। ये हिंदू परंपरा की उदारता के वेस्ट बाईप्रोडक्ट्स (कचरे) हैं, इन्हें झेलते रहिए।
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शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
सोमवार, 25 मई 2009
अब थोड़ी बहस विकास पर भी कर लें
पिछले साल जब विधानसभाओं चुनावों में राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस की और गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में भाजपा की जीत हुई थी, तब इसे भारतीय राजनीति में एक सकारात्मक अध्याय की शुरुआत करार दिया गया था। कहा गया था कि देश की राजनीति अब जाति, प्रांत, भाषा और पंथ के दायरे से निकल कर विकास की गोद में बैठने लगी है। खैर, 2009 के लोकसभा चुनाव परिणामों पर शुरुआती आश्चर्य के बाद धीरे-धीरे एक बार फिर विश्लेषक समुदाय इसी निष्कर्ष पर पहुंचने लगा है कि कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए की जीत दरअसल विकासोन्मुख राजनीति की जीत है। और तो और भाजपा के प्रवक्ता और रामपुर से चौथे स्थान पर रहे मुख्तार अब्बास नकवी ने भी तुरंत घोषणा कर दी कि मंडल (जाति केन्द्रित) और कमंडल (हिन्दुत्व केन्द्रित) राजनीति का दौर खत्म हो गया है और अब केवल विकास ही सत्ता का फॉर्मूला है।
मैं व्यक्तिगत तौर पर इस आकलन से सहमत नहीं हूं कि 2009 की जीत के पीछे कांग्रेस का विकासोन्मुख एजेंडा है। लेकिन यह बिल्कुल अलग विषय है, जिस पर एक अलग लेख लिखने की जरूरत होगी। फिलहाल तो जो विषय मेरे दिमाग में 16 मई के बाद से लगातार घूम रहा है, वह दूसरा है। मैं तमाम राजनीतिक पंडितों की विश्लेषणात्मक क्षमता का सम्मान करते हुए थोड़ी देर के लिए यह मान लेता हूं कि कांग्रेस की यह जीत दरअसल विकास की राजनीति की जीत है। विकास यानी अर्थव्यवस्था की मजबूती, बुनियादी ढांचे का प्रसार, शिक्षा का विस्तार, स्वास्थ्य सुविधाओं तक ज्यादा से ज्यादा जनता की पहुंच और ऐसे ही तमाम दूसरे मानक। लेकिन सवाल यह है कि विकास के ये तमाम मानक किसके लिए हैं? क्या किसी खास समुदाय या वर्ग के लिए किया गया विकास में पूरे देश की भागीदारी मानी जा सकती है। पिछले साल 110 करोड़ लोगों के प्रधानमंत्री ने एक बयान दिया था, जिसकी चर्चा कम की गई (पता नहीं क्यों?), कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। चुनाव की तैयारी में दिए गए अपने इस बयान को प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए अपने भाषणों में भी दुहराया। बात केवल भाषणबाजी तक ही सीमित नहीं रही। पिछले साल के बजट में बाकायदा इस बात के प्रावधान किए गए कि बैंकों द्वारा बांटे जाने वाले कर्ज में अल्पसंख्यकों (यानी मुसलमान) का प्राथमिकता दी जाए। यहां तक कि वित्त मंत्री ने बैंकरों के साथ अपनी बैठक में भी बार-बार इस बात के लिए दबाव बनाया कि देश के तमाम नागरिकों से लिए गए जमा से बांटे जाने वाले कर्ज में एक खास हिस्सा मुसलमानों के लिए सुरक्षित हो। यानी अगर कोई मुसलमान उस खास आरक्षित हिस्से के लिए लोन एप्लिकेशन न दे, तो वह बैंक के पास ही पड़ा रहे, लेकिन किसी दूसरे जरूरतमंद को न दिया जाए।
अगर कांग्रेस के विकास की यही परिभाषा है, तो मुझे यह विकास नहीं चाहिए। मुझे लगता है कि पूरे देश को यह विकास नहीं चाहिए। देश ने अगर कांग्रेस को चुनाव जितवाया है, तो इसलिए नहीं कि उसे विकास का यह मॉ़डल पसंद है, बल्कि इसलिए कि विपक्षी दल भाजपा देश को इस कांग्रेसी विकास के मायने बता पाने में पूरी तरह नाकाम रही है। विदर्भ में कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर रहे किसान को केवल इसलिए बैंकों के कर्ज का पहला अधिकारी नहीं माना जाएगा, क्योंकि वह एक खास पूजा पद्धति को नहीं मानते या किसी खास पवित्र किताब की इबादत नहीं करते। क्या हम सचमुच एक पंथनिरपेक्ष देश में रह रहे हैं? और अगर सचमुच हमें किसी भी कीमत पर विकास चाहिए, तो हम ओबामा को ही अपना राष्ट्रपति क्यों नहीं घोषित कर देते? क्या किसी हाइवे के निर्माण में यह शर्त लगाई जा सकती है कि इस पर से गुजरने वाली पहली 500 गाड़ियां किसी खास सम्प्रदाय की होंगी या किसी फ्लाईओवर पर चढ़ने वाली पहली 50 कारें उन्हीं लोगों की होंगी, जो एक खास मजहब में यकीन रखते हों। यह विकास का कैसा मॉ़डल है? क्या कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए को मिला जनादेश इस मॉडल के समर्थन में है। मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने की 'धर्मनिरपेक्ष' कोशिशों को स्वयं सुप्रीम कोर्ट ख़ारिज़ कर चुका है। इसके बावजूद इस विश्वविद्यालय को यह सुविधाएं जारी हैं। निजी शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण की देशव्यापी नीति से मुस्लिम संस्थानों को छूट दी गई है। मदरसों की पढ़ाई को सीबीएसई के समतुल्य होने का दर्जा दिया जा चुका है। यह विकास का कौन सा मॉडल है, कोई मुझे समझाए। आप देश के मुसलमानों को यह संदेश दे रहे हैं कि आपको देश की मुख्यधारा में शामिल होने की कोई जरूरत नहीं है, आप जहां हैं, जड़ बुद्धि से वहीं जमे रहिए, हम आपकी धारा को ही मुख्यधारा बना देंगे। फिर भी वे कहते हैं कि आपकी जीत विकास की जीत है। माफ कीजिए, आपकी जीत विकास की जीत नहीं, नपुंसक विपक्ष की हार है। मैं इस देश में तमाम सुविधाओं से केवल इसलिए वंचित किया जा रहा हूं क्योंकि मेरा नाम भुवन भास्कर है, मैं मंदिर जाता हूं, रामायण और गीता में आस्था रखता हूं, राम और कृष्ण में श्रद्धा रखता हूं। उस पर तुर्रा यह कि यह सब इस देश की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को अक्षुण्ण रखने के लिए किया जा रहा है। इसलिए मेरा साफ मत है कि कांग्रेस की यह जीत विकास की नहीं, बल्कि आम जनता की
उदासीनता और जानकारियों के अभाव की जीत है।
मैं व्यक्तिगत तौर पर इस आकलन से सहमत नहीं हूं कि 2009 की जीत के पीछे कांग्रेस का विकासोन्मुख एजेंडा है। लेकिन यह बिल्कुल अलग विषय है, जिस पर एक अलग लेख लिखने की जरूरत होगी। फिलहाल तो जो विषय मेरे दिमाग में 16 मई के बाद से लगातार घूम रहा है, वह दूसरा है। मैं तमाम राजनीतिक पंडितों की विश्लेषणात्मक क्षमता का सम्मान करते हुए थोड़ी देर के लिए यह मान लेता हूं कि कांग्रेस की यह जीत दरअसल विकास की राजनीति की जीत है। विकास यानी अर्थव्यवस्था की मजबूती, बुनियादी ढांचे का प्रसार, शिक्षा का विस्तार, स्वास्थ्य सुविधाओं तक ज्यादा से ज्यादा जनता की पहुंच और ऐसे ही तमाम दूसरे मानक। लेकिन सवाल यह है कि विकास के ये तमाम मानक किसके लिए हैं? क्या किसी खास समुदाय या वर्ग के लिए किया गया विकास में पूरे देश की भागीदारी मानी जा सकती है। पिछले साल 110 करोड़ लोगों के प्रधानमंत्री ने एक बयान दिया था, जिसकी चर्चा कम की गई (पता नहीं क्यों?), कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। चुनाव की तैयारी में दिए गए अपने इस बयान को प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए अपने भाषणों में भी दुहराया। बात केवल भाषणबाजी तक ही सीमित नहीं रही। पिछले साल के बजट में बाकायदा इस बात के प्रावधान किए गए कि बैंकों द्वारा बांटे जाने वाले कर्ज में अल्पसंख्यकों (यानी मुसलमान) का प्राथमिकता दी जाए। यहां तक कि वित्त मंत्री ने बैंकरों के साथ अपनी बैठक में भी बार-बार इस बात के लिए दबाव बनाया कि देश के तमाम नागरिकों से लिए गए जमा से बांटे जाने वाले कर्ज में एक खास हिस्सा मुसलमानों के लिए सुरक्षित हो। यानी अगर कोई मुसलमान उस खास आरक्षित हिस्से के लिए लोन एप्लिकेशन न दे, तो वह बैंक के पास ही पड़ा रहे, लेकिन किसी दूसरे जरूरतमंद को न दिया जाए।
अगर कांग्रेस के विकास की यही परिभाषा है, तो मुझे यह विकास नहीं चाहिए। मुझे लगता है कि पूरे देश को यह विकास नहीं चाहिए। देश ने अगर कांग्रेस को चुनाव जितवाया है, तो इसलिए नहीं कि उसे विकास का यह मॉ़डल पसंद है, बल्कि इसलिए कि विपक्षी दल भाजपा देश को इस कांग्रेसी विकास के मायने बता पाने में पूरी तरह नाकाम रही है। विदर्भ में कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर रहे किसान को केवल इसलिए बैंकों के कर्ज का पहला अधिकारी नहीं माना जाएगा, क्योंकि वह एक खास पूजा पद्धति को नहीं मानते या किसी खास पवित्र किताब की इबादत नहीं करते। क्या हम सचमुच एक पंथनिरपेक्ष देश में रह रहे हैं? और अगर सचमुच हमें किसी भी कीमत पर विकास चाहिए, तो हम ओबामा को ही अपना राष्ट्रपति क्यों नहीं घोषित कर देते? क्या किसी हाइवे के निर्माण में यह शर्त लगाई जा सकती है कि इस पर से गुजरने वाली पहली 500 गाड़ियां किसी खास सम्प्रदाय की होंगी या किसी फ्लाईओवर पर चढ़ने वाली पहली 50 कारें उन्हीं लोगों की होंगी, जो एक खास मजहब में यकीन रखते हों। यह विकास का कैसा मॉ़डल है? क्या कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए को मिला जनादेश इस मॉडल के समर्थन में है। मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने की 'धर्मनिरपेक्ष' कोशिशों को स्वयं सुप्रीम कोर्ट ख़ारिज़ कर चुका है। इसके बावजूद इस विश्वविद्यालय को यह सुविधाएं जारी हैं। निजी शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण की देशव्यापी नीति से मुस्लिम संस्थानों को छूट दी गई है। मदरसों की पढ़ाई को सीबीएसई के समतुल्य होने का दर्जा दिया जा चुका है। यह विकास का कौन सा मॉडल है, कोई मुझे समझाए। आप देश के मुसलमानों को यह संदेश दे रहे हैं कि आपको देश की मुख्यधारा में शामिल होने की कोई जरूरत नहीं है, आप जहां हैं, जड़ बुद्धि से वहीं जमे रहिए, हम आपकी धारा को ही मुख्यधारा बना देंगे। फिर भी वे कहते हैं कि आपकी जीत विकास की जीत है। माफ कीजिए, आपकी जीत विकास की जीत नहीं, नपुंसक विपक्ष की हार है। मैं इस देश में तमाम सुविधाओं से केवल इसलिए वंचित किया जा रहा हूं क्योंकि मेरा नाम भुवन भास्कर है, मैं मंदिर जाता हूं, रामायण और गीता में आस्था रखता हूं, राम और कृष्ण में श्रद्धा रखता हूं। उस पर तुर्रा यह कि यह सब इस देश की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को अक्षुण्ण रखने के लिए किया जा रहा है। इसलिए मेरा साफ मत है कि कांग्रेस की यह जीत विकास की नहीं, बल्कि आम जनता की
उदासीनता और जानकारियों के अभाव की जीत है।
शनिवार, 25 अप्रैल 2009
गरीब की लुगाई, धर्मनिरपेक्षता बेचारी
धर्मनिरपेक्षता तो भइया, जैसे गरीब की लुगाई हो गई है। अबला पांचाली के तो पांच ही पति थे, लेकिन इस धर्मनिपेक्षता के तो पचीस खसम उसे अपनी अंकशायिनी बनाने के लिए एक-दूसरे की गर्दन उतारने को तैयार हैं। अब धर्मनिरपेक्षता कनफ्यूज हो गई है। बिचारी को समझ ही नहीं आ रहा कि किसे बलात्कारी माने और किसके गले लगे। अभी कुछ महीने पहले तक तो सब ठीक था। उसे समझा दिया गया था कि केवल जो भी हिंदुओं के पक्ष की बात करे, उसे अपनी दुश्मन मान लेना। वह भी खुश थी। केवल एक भाजपा थी, जो उसकी दुश्मन थी। बाकी लालू और मुलायम टाइप के समाजवादी, प्रकाश करात और बुद्धदेव टाइप के वामपंथी, सोनिया और अर्जुन टाइप के कांग्रेसी सब धर्मनिरपेक्ष थे। नीतीश और नवीन टाइप के लोग, वैसे तो धर्मनिरपेक्ष (अल्पसंख्यक हितों के प्रति लगातार निष्ठा जताते रहने के कारण) थे, लेकिन भाजपाइयों के साथ होने के कारण उनके सिर भी धर्मनिरपेक्षता के खून के छींटे थे। तो सीन कुछ साफ था। लेकिन ये एकाएक सब गड़बड़ हो गई है।
एक ओर कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्ष गठबंधन की अगुवा होने का दावा ठोंका, तो दूसरी ओर लालू-मुलायम-पासवान की तिकड़ी ने ऐलान कर दिया कि चुनाव के बाद जो धर्मनिरपेक्ष गठबंधन सत्ता बनाएगा, उसमें कांग्रेस शामिल ही नहीं होगी। अब धर्मनिरपेक्षता का तमगा लेने की जब ऐसी होड़ मची हो, तो हिंदू शब्द सुनते ही जिनके पूरे देह में खुजली मच जाती हो, वैसे वामपंथी भला कैसे चुप रहते। तो, हरकिशन सिंह सुरजीत के बाद जोड़तो़ड़ और अवसरवादी राजनीति के नए सरताज बनने को बेताब प्रकाश करात ने भी घोषणा कर दी कि नई धर्मनिरपेक्ष सरकार में कांग्रेस का कोई स्थान नहीं होगा। अभी धर्मनिरपेक्षता बिचारी थोड़ी सांस ले पाती, गणित बैठा पाती और लालू-मुलायम-पासवान के साथ करात की जोड़ी मिला पाती, तब तक करात जी के अनुशासित सिहापी और नंदीग्राम नरसंहार के प्रणेता बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कह दिया कि कांग्रेस के बिना तो किसी धर्मनिरपेक्ष सरकार का अस्तित्व ही नहीं हो सकता। लो, फिर वही ढाक के तीन पात। धर्मनिरपेक्षता तो है एक और एक-दूसरे पर तलवार ताने इसके दावेदारों की जमात है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती।
मुसलमानों पर उठने वाली उंगली के बदले हाथ काटने का ऐलान करने वाले आंध्र प्रदेश के धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस अध्यक्ष डी श्रीनिवास, भाजपा के साथ गठबंधन का कलंक धोने के लिए बात-बात में मुस्लिम हितों की सुरक्षा की कसमें खाने वाले धर्मनिरपेक्ष नीतीश कुमार, कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बाद वनवासियों द्वारा चर्च पर किए गए हमलों से आहत धर्मनिरपेक्ष नवीन पटनायक जैसे धर्मनिरपेक्षता के स्वयंभू दावेदार अलग से। आपकी पता नहीं, पर मेरी तो पूरी सहानुभूति है इस धर्मनिरपेक्षता से। आप ही बताएं, क्या करे बिचारी धर्मनिरपेक्षता ?
एक ओर कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्ष गठबंधन की अगुवा होने का दावा ठोंका, तो दूसरी ओर लालू-मुलायम-पासवान की तिकड़ी ने ऐलान कर दिया कि चुनाव के बाद जो धर्मनिरपेक्ष गठबंधन सत्ता बनाएगा, उसमें कांग्रेस शामिल ही नहीं होगी। अब धर्मनिरपेक्षता का तमगा लेने की जब ऐसी होड़ मची हो, तो हिंदू शब्द सुनते ही जिनके पूरे देह में खुजली मच जाती हो, वैसे वामपंथी भला कैसे चुप रहते। तो, हरकिशन सिंह सुरजीत के बाद जोड़तो़ड़ और अवसरवादी राजनीति के नए सरताज बनने को बेताब प्रकाश करात ने भी घोषणा कर दी कि नई धर्मनिरपेक्ष सरकार में कांग्रेस का कोई स्थान नहीं होगा। अभी धर्मनिरपेक्षता बिचारी थोड़ी सांस ले पाती, गणित बैठा पाती और लालू-मुलायम-पासवान के साथ करात की जोड़ी मिला पाती, तब तक करात जी के अनुशासित सिहापी और नंदीग्राम नरसंहार के प्रणेता बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कह दिया कि कांग्रेस के बिना तो किसी धर्मनिरपेक्ष सरकार का अस्तित्व ही नहीं हो सकता। लो, फिर वही ढाक के तीन पात। धर्मनिरपेक्षता तो है एक और एक-दूसरे पर तलवार ताने इसके दावेदारों की जमात है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती।
मुसलमानों पर उठने वाली उंगली के बदले हाथ काटने का ऐलान करने वाले आंध्र प्रदेश के धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस अध्यक्ष डी श्रीनिवास, भाजपा के साथ गठबंधन का कलंक धोने के लिए बात-बात में मुस्लिम हितों की सुरक्षा की कसमें खाने वाले धर्मनिरपेक्ष नीतीश कुमार, कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बाद वनवासियों द्वारा चर्च पर किए गए हमलों से आहत धर्मनिरपेक्ष नवीन पटनायक जैसे धर्मनिरपेक्षता के स्वयंभू दावेदार अलग से। आपकी पता नहीं, पर मेरी तो पूरी सहानुभूति है इस धर्मनिरपेक्षता से। आप ही बताएं, क्या करे बिचारी धर्मनिरपेक्षता ?
सोमवार, 30 मार्च 2009
वरुण गांधी पर रासुका : फिर जागा धर्मनिरपेक्षता का भूत
वरुण गांधी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा दिया गया है। उन पर हत्या के प्रयास का भी मुकदमा किया गया है। इस देश के धर्मनिरपेक्षतावादी खुश हैं। इसलिए नहीं कि एक वर्ग या सम्प्रदाय विशेष के खिलाफ विष वमन करने वाले को सही जवाब दिया गया है, बल्कि इसलिए कि, पहला, विष वमन करने वाला अपने को हिंदू हितैषी बता रहा था और दूसरा, क्योंकि विष वमन करने वाला मुस्लिम सम्प्रदाय को अपना निशाना बना रहा था। लेकिन क्या केवल इसीलिए वरुण गांधी आतंकवादियों और राष्ट्रविरोधियों के लिए तैयार किए गए रासुका के हकदार बन जाते हैं?
अभी कुछ ही महीनों पहले महाराष्ट्र में राज ठाकरे के गुंडों ने रेलवे की परीक्षा देने आए विद्यार्थियों, टैक्सी ड्राइवरों और पान दुकान वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। उनके सामान लूट लिए, टैक्सियां तोड़ दीं और दुकान उजाड़ दिए। ये विद्यार्थी, टैक्सी ड्राइवर और दुकानदार दो आधारों पर पीटे गए। पहला, कि वे देश के किसी दूसरे प्रांत से थे और दूसरा, कि वे हिंदी भाषी थे। वे मुसलमान नहीं थे, क्या केवल इसीलिए इस देश की सरकार और प्रशासन ने वहां अपने संवैधानिक दायित्व को कूड़ेदान में डाल दिया? वरुण गांधी ने एक भाषण दिया और बाद में उससे मुकरने की भी कोशिश की, लेकिन राज ठाकरे ने हमले करवाए और बार-बार करवाए। भाषणों में और मीडिया इंटरव्यू में खुलेआम कहा कि वह ऐसा करते रहेंगे।
हमारे देश के धर्मनिरपेक्षतावादियों को से कोई शिकायत नहीं क्योंकि उन्होंने तो खुद को और अपनी अंतरात्मा को एक खास सम्प्रदाय के हितों की चिंता तक बांध ही रखा है। लेकिन सरकार और पुलिस की संवैधानिक जिम्मेदारियों का क्या? नक्सलवाद और आतंकवाद को न्यायोचित ठहराने के लिए पुलिसिया जुल्म और सरकारी उदासीनता को कारण बताने वाले इन धर्मनिरपेक्षतावादियों ने राहुल राज जैसे नवयुवकों की हताशा को समझने की कोशिश क्यों नहीं की? मऊ में जीप पर घूम-घूम कर दंगाइयों का नेतृत्व करने वाले विधायक की पार्टी का समर्थन करने वाले वामपंथियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों के गुजरात की मंत्री का दंगा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार होने पर खुश होने को चाहे जो सैद्धांतिक मुलम्मा चढ़ाया जाए, यह है तो केवल क्षुद्र साम्प्रदायिकता का ही दूसरा चेहरा।
और साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने वाले भाषणों की ही बात करें तो क्या ऐसा देश में पहली बार हुआ है। मेरे एक प्रगतिशील मित्र का तर्क है कि केवल इसीलिए वरुण गांधी को छोड़ देने की दलील बिलकुल गलत है कि ऐसा पहले भी होता रहा है। मैं भी उनसे बिलकुल सहमत हूं। लेकिन उनका यह तर्क तब सही होता, अगर पहले के उदाहरणों में सरकारें या सरकार से जुड़े दलों ने ऐसे लोगों का बहिष्कार किया होता। कानूनी तौर पर न सही, नैतिक तौर पर उनकी मज़म्मत की होती। पर, सुप्रीम कोर्ट को पागल करार देने वाला इमाम बुखारी तो आपका प्रिय है, लश्कर-ए-तोएबा के केरल रिक्रूटमेंट इंचार्ज के साथ गुप्त बैठकें करने वाला और कोयम्बटूर बम विस्फोट के आरोप में वर्षों जेल में रहने वाला मदनी तो आपका सहयोगी है, बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए मुख्य आतंकवादी के घर जाकर आंसू बहाने वाले नेता तो देशभक्त हैं और अपने पूरे राजनीतिक जीवन के दौरान पहली बार एक सम्प्रदाय विशेष के खिलाफ भाषण देने वाले और उसके बाद उस पर कायम न रहने वाले वरुण
गांधी देशद्रोही है। यह बात कुछ हजम नहीं होती।
लेकिन हर बार की तरह इस बार भी धर्मनिरपेक्षतावादी (छद्म लगाना जरूरी नहीं है, क्योंकि पिछले 10 सालों की धर्मनिरपेक्ष राजनीति और इसके अलंबरदारों ने इस शब्द को अपने आप छद्म साबित कर दिया है) वरुण गांधी और भाजपा दोनों के सबसे हितैषी बन कर उभरे हैं क्योंकि शायद साल भर के संभावित जेल और रासुका ने एक बार फिर चुनाव से ठीक पहले उन्हें वो ताकत दे दी है, जिसकी उन्हें जरूरत थी।
अभी कुछ ही महीनों पहले महाराष्ट्र में राज ठाकरे के गुंडों ने रेलवे की परीक्षा देने आए विद्यार्थियों, टैक्सी ड्राइवरों और पान दुकान वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। उनके सामान लूट लिए, टैक्सियां तोड़ दीं और दुकान उजाड़ दिए। ये विद्यार्थी, टैक्सी ड्राइवर और दुकानदार दो आधारों पर पीटे गए। पहला, कि वे देश के किसी दूसरे प्रांत से थे और दूसरा, कि वे हिंदी भाषी थे। वे मुसलमान नहीं थे, क्या केवल इसीलिए इस देश की सरकार और प्रशासन ने वहां अपने संवैधानिक दायित्व को कूड़ेदान में डाल दिया? वरुण गांधी ने एक भाषण दिया और बाद में उससे मुकरने की भी कोशिश की, लेकिन राज ठाकरे ने हमले करवाए और बार-बार करवाए। भाषणों में और मीडिया इंटरव्यू में खुलेआम कहा कि वह ऐसा करते रहेंगे।
हमारे देश के धर्मनिरपेक्षतावादियों को से कोई शिकायत नहीं क्योंकि उन्होंने तो खुद को और अपनी अंतरात्मा को एक खास सम्प्रदाय के हितों की चिंता तक बांध ही रखा है। लेकिन सरकार और पुलिस की संवैधानिक जिम्मेदारियों का क्या? नक्सलवाद और आतंकवाद को न्यायोचित ठहराने के लिए पुलिसिया जुल्म और सरकारी उदासीनता को कारण बताने वाले इन धर्मनिरपेक्षतावादियों ने राहुल राज जैसे नवयुवकों की हताशा को समझने की कोशिश क्यों नहीं की? मऊ में जीप पर घूम-घूम कर दंगाइयों का नेतृत्व करने वाले विधायक की पार्टी का समर्थन करने वाले वामपंथियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों के गुजरात की मंत्री का दंगा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार होने पर खुश होने को चाहे जो सैद्धांतिक मुलम्मा चढ़ाया जाए, यह है तो केवल क्षुद्र साम्प्रदायिकता का ही दूसरा चेहरा।
और साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने वाले भाषणों की ही बात करें तो क्या ऐसा देश में पहली बार हुआ है। मेरे एक प्रगतिशील मित्र का तर्क है कि केवल इसीलिए वरुण गांधी को छोड़ देने की दलील बिलकुल गलत है कि ऐसा पहले भी होता रहा है। मैं भी उनसे बिलकुल सहमत हूं। लेकिन उनका यह तर्क तब सही होता, अगर पहले के उदाहरणों में सरकारें या सरकार से जुड़े दलों ने ऐसे लोगों का बहिष्कार किया होता। कानूनी तौर पर न सही, नैतिक तौर पर उनकी मज़म्मत की होती। पर, सुप्रीम कोर्ट को पागल करार देने वाला इमाम बुखारी तो आपका प्रिय है, लश्कर-ए-तोएबा के केरल रिक्रूटमेंट इंचार्ज के साथ गुप्त बैठकें करने वाला और कोयम्बटूर बम विस्फोट के आरोप में वर्षों जेल में रहने वाला मदनी तो आपका सहयोगी है, बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए मुख्य आतंकवादी के घर जाकर आंसू बहाने वाले नेता तो देशभक्त हैं और अपने पूरे राजनीतिक जीवन के दौरान पहली बार एक सम्प्रदाय विशेष के खिलाफ भाषण देने वाले और उसके बाद उस पर कायम न रहने वाले वरुण
गांधी देशद्रोही है। यह बात कुछ हजम नहीं होती।
लेकिन हर बार की तरह इस बार भी धर्मनिरपेक्षतावादी (छद्म लगाना जरूरी नहीं है, क्योंकि पिछले 10 सालों की धर्मनिरपेक्ष राजनीति और इसके अलंबरदारों ने इस शब्द को अपने आप छद्म साबित कर दिया है) वरुण गांधी और भाजपा दोनों के सबसे हितैषी बन कर उभरे हैं क्योंकि शायद साल भर के संभावित जेल और रासुका ने एक बार फिर चुनाव से ठीक पहले उन्हें वो ताकत दे दी है, जिसकी उन्हें जरूरत थी।
गुरुवार, 15 मई 2008
सोनिया जी की धर्मनिरपेक्षता और जयपुर के विस्फोटों में संबंध तो है
कितना आसान होता है ऊंची दीवारों के बीच रह कर, लोगों को निर्भीकता का पाठ पढ़ाना, कितना आसान होता है छत के नीचे से बारिश में भीगते लोगों को धैर्य बनाए रखने की शिक्षा देना, कितना आसान होता है खुद एसपीजी के साये में रहकर डरी हुई जनता को शांति का ज्ञान देना। जिस दिन जयपुर में 11 जगहों पर हुए बम विस्फोटों ने 100 घरों में मातम भर दिया, उसी दिन सोनिया गांधी बंगलुरु में एक चुनावी सभा में लोगों को धर्मनिरपेक्षता के विरोधी ताकतों का मुकाबला करने की सलाह दे रही थीं।
ठीक भी है, किसी समाज और देश के अंतर्मन में सर्वधर्म समभाव का उसकी उन्नति और शांति में क्या भूमिका है, इससे किसी को इंकार नहीं। लेकिन जयपुर के धमाके और सोनिया गांधी की धर्मनिरपेक्षता में कुछ संबंध तो है। साल 2000 के बाद से देश में जो भयंकर आतंकवादी हमले हुए हैं, उनकी फेहिरस्त देखिए। लाल किला हमला, संसद हमला, समझौता एक्सप्रेस विस्फोट, मुंबई बम विस्फोट, दिल्ली में लाजपत नगर विस्फोट, वारणसी में संकटमोचन हनुमान मंदिर विस्फोट, हैदराबाद में हुए विस्फोट, मालेगांव में हुए विस्फोट और अब जयपुर में हुए ताजा विस्फोट। इनमें लाल किला और संसद पर हुए हमलों को छोड़कर बाकी सभी सोनिया गांधी जी की सरकार में हुए। लाल किला और संसद हमलों की जांच पूरी हो चुकी है। अदालतों के फैसले आ चुके हैं। क्या किसी को भी पता है कि इनके अलावा बाकी विस्फोटों की जांच कहां तक पहुंची है?
यह सही है कि सरकार हर जगह हर हमला नहीं रोक सकती। लेकिन प्रशासन का ककहरा समझने वाला भी जानता है कि रथ में जुते सात घोड़ों के नियंत्रण के लिए सातों के पीठ पर सवार होना जरूरी नहीं। सारथी के लगाम पकड़ने का तरीका ही घोड़े को बता देता है कि उसे नियंत्रण में चलना है। सोनिया जी ने सरकार के रथ का लगाम पकड़ते हुए घोड़ों को जो संदेश दिया, वह था कि इस देश का हर आतंकवादी एक मुसलमान है और क्योंकि मुसलमान से हमारी सत्ता है इसलिए किसी भी आतंकवादी को परेशान न किया जाए। सुनने में बहुत ही कठोर और सनकी सा बयान लगता है ये, लेकिन जिस सरकार की पहली प्राथमिकता आतंकवाद का मुकाबला करने को खास तौर पर तैयार किया गया कानून पोटा हटाना हो, उसके अधिकारियों को क्या संकेत मिलेगा, आप ही बता दीजिए।
पोटा पर आरोप था कि इसमें केवल मुसलमानों को ही पकड़ा जा रहा है। इस आरोप का जवाब आप सबको पता है। लेकिन मैं यह कहता हूं कि अगर किसी कानून में खामी होने का मतलब ही उसे खत्म करना है, तो सबसे पहले इस देश से पुलिस व्यवस्था को खत्म करना चाहिए। क्योंकि जितना दुरुपयोग इस व्यवस्था का हो रहा है, गरीबों पर जितना अत्याचार इस संस्था ने किया है, उतना पूरी ज़मींदारी व्यवस्था ने मिलकर भी नहीं किया होगा। हां, लेकिन यहां गरीबों की बात है, मुसलमानों की नहीं, इसलिए पुलिस व्यवस्था का अत्याचार, भ्रष्टाचार सब सहनीय है।
तो इसीलिए मैंने कहा कि सोनिया गांधी की धर्मनिरपेक्षता और जयपुर के विस्फोट में कुछ संबंध तो है। सोनिया गांधी या वामपंथियों के लिए धर्मनिरपेक्षता के दुश्मन का मतलब क्या है, यह जानने के लिए किसी खास खुफिया रिपोर्ट की जरूरत नहीं है। उनके लिए साम्प्रदायिक का मतलब हर वह हिन्दू है, जो गला फाड़ कर यह कह सकता है कि हां मैं हिन्दू हूं। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब प्रधानमंत्री का यह बयान है कि देश के संसाधनों पर पहला हक देश के अल्पसंख्यकों (मतलब मुसलमानों) का है। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब न्यायालय में हलफनामा देना है कि राम एक काल्पनिक चरित्र हैं। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब कुतुब मीनार के लिए मेट्रो का रास्ता तबदील करना और समुद्री जहाज चलाने के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा फायदेमंद विकल्पों को छोड़ कर राम सेतु तुड़वाना है। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब एक छोटे से गुट के चलते तसलीमा नसरीन को नजरबंद कर मानसिक तौर पर इस हद तक प्रताड़ित करना है कि वह देश छोड़कर चली जाएं। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब कोयम्बटूर बम विस्फोट के आरोपी केरल के मदनी का जेल से छूटने पर जोरदार स्वागत करना है। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब बंगलादेशी घुसपैठियों को बसाने में सहयोग करना है। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब मुस्लिम बहुल जिलों की पहचान कर उन्हीं पर विकास की वर्षा करना है। और जो कोई भी उनकी इस धर्मनिरपेक्षता का विरोधी है, वह साम्प्रदायिक है। बंगलुरु की चुनावी सभा में दरअसल सोनिया जी इन्हीं साम्प्रदायिकों का विरोध करने के लिए कह रही हैं।
पिछले साल संसद के एक सत्र में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सरकार से सवाल पूछा था कि हैदराबाद बम विस्फोट के सिलसिले में किसी मस्जिद के एक मौलवी को गिरफ्तार किया गया था, फिर उसे बिना किसी कागजी कार्यवाही और पूछताछ के छोड़ दिया गया, क्यों? सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया, ठीक वैसे ही जैसे फांसी की सजा मिलने के साल भर से ज्यादा होने के बाद भी आज देश को पता नहीं है कि संसद हमले का आरोपी अफजल आखिर जिंदा क्यों है? आखिर कौन लोग हैं, जो सरकार के शीर्ष स्तर से यह धर्मनिरपेक्षता निभा रहे हैं। जो भी हों, इससे इतना तो तय है कि सोनिया जी की धर्मनिरपेक्षता और जयपुर के विस्फोटों में संबंध तो है।
ठीक भी है, किसी समाज और देश के अंतर्मन में सर्वधर्म समभाव का उसकी उन्नति और शांति में क्या भूमिका है, इससे किसी को इंकार नहीं। लेकिन जयपुर के धमाके और सोनिया गांधी की धर्मनिरपेक्षता में कुछ संबंध तो है। साल 2000 के बाद से देश में जो भयंकर आतंकवादी हमले हुए हैं, उनकी फेहिरस्त देखिए। लाल किला हमला, संसद हमला, समझौता एक्सप्रेस विस्फोट, मुंबई बम विस्फोट, दिल्ली में लाजपत नगर विस्फोट, वारणसी में संकटमोचन हनुमान मंदिर विस्फोट, हैदराबाद में हुए विस्फोट, मालेगांव में हुए विस्फोट और अब जयपुर में हुए ताजा विस्फोट। इनमें लाल किला और संसद पर हुए हमलों को छोड़कर बाकी सभी सोनिया गांधी जी की सरकार में हुए। लाल किला और संसद हमलों की जांच पूरी हो चुकी है। अदालतों के फैसले आ चुके हैं। क्या किसी को भी पता है कि इनके अलावा बाकी विस्फोटों की जांच कहां तक पहुंची है?
यह सही है कि सरकार हर जगह हर हमला नहीं रोक सकती। लेकिन प्रशासन का ककहरा समझने वाला भी जानता है कि रथ में जुते सात घोड़ों के नियंत्रण के लिए सातों के पीठ पर सवार होना जरूरी नहीं। सारथी के लगाम पकड़ने का तरीका ही घोड़े को बता देता है कि उसे नियंत्रण में चलना है। सोनिया जी ने सरकार के रथ का लगाम पकड़ते हुए घोड़ों को जो संदेश दिया, वह था कि इस देश का हर आतंकवादी एक मुसलमान है और क्योंकि मुसलमान से हमारी सत्ता है इसलिए किसी भी आतंकवादी को परेशान न किया जाए। सुनने में बहुत ही कठोर और सनकी सा बयान लगता है ये, लेकिन जिस सरकार की पहली प्राथमिकता आतंकवाद का मुकाबला करने को खास तौर पर तैयार किया गया कानून पोटा हटाना हो, उसके अधिकारियों को क्या संकेत मिलेगा, आप ही बता दीजिए।
पोटा पर आरोप था कि इसमें केवल मुसलमानों को ही पकड़ा जा रहा है। इस आरोप का जवाब आप सबको पता है। लेकिन मैं यह कहता हूं कि अगर किसी कानून में खामी होने का मतलब ही उसे खत्म करना है, तो सबसे पहले इस देश से पुलिस व्यवस्था को खत्म करना चाहिए। क्योंकि जितना दुरुपयोग इस व्यवस्था का हो रहा है, गरीबों पर जितना अत्याचार इस संस्था ने किया है, उतना पूरी ज़मींदारी व्यवस्था ने मिलकर भी नहीं किया होगा। हां, लेकिन यहां गरीबों की बात है, मुसलमानों की नहीं, इसलिए पुलिस व्यवस्था का अत्याचार, भ्रष्टाचार सब सहनीय है।
तो इसीलिए मैंने कहा कि सोनिया गांधी की धर्मनिरपेक्षता और जयपुर के विस्फोट में कुछ संबंध तो है। सोनिया गांधी या वामपंथियों के लिए धर्मनिरपेक्षता के दुश्मन का मतलब क्या है, यह जानने के लिए किसी खास खुफिया रिपोर्ट की जरूरत नहीं है। उनके लिए साम्प्रदायिक का मतलब हर वह हिन्दू है, जो गला फाड़ कर यह कह सकता है कि हां मैं हिन्दू हूं। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब प्रधानमंत्री का यह बयान है कि देश के संसाधनों पर पहला हक देश के अल्पसंख्यकों (मतलब मुसलमानों) का है। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब न्यायालय में हलफनामा देना है कि राम एक काल्पनिक चरित्र हैं। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब कुतुब मीनार के लिए मेट्रो का रास्ता तबदील करना और समुद्री जहाज चलाने के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा फायदेमंद विकल्पों को छोड़ कर राम सेतु तुड़वाना है। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब एक छोटे से गुट के चलते तसलीमा नसरीन को नजरबंद कर मानसिक तौर पर इस हद तक प्रताड़ित करना है कि वह देश छोड़कर चली जाएं। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब कोयम्बटूर बम विस्फोट के आरोपी केरल के मदनी का जेल से छूटने पर जोरदार स्वागत करना है। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब बंगलादेशी घुसपैठियों को बसाने में सहयोग करना है। उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब मुस्लिम बहुल जिलों की पहचान कर उन्हीं पर विकास की वर्षा करना है। और जो कोई भी उनकी इस धर्मनिरपेक्षता का विरोधी है, वह साम्प्रदायिक है। बंगलुरु की चुनावी सभा में दरअसल सोनिया जी इन्हीं साम्प्रदायिकों का विरोध करने के लिए कह रही हैं।
पिछले साल संसद के एक सत्र में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सरकार से सवाल पूछा था कि हैदराबाद बम विस्फोट के सिलसिले में किसी मस्जिद के एक मौलवी को गिरफ्तार किया गया था, फिर उसे बिना किसी कागजी कार्यवाही और पूछताछ के छोड़ दिया गया, क्यों? सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया, ठीक वैसे ही जैसे फांसी की सजा मिलने के साल भर से ज्यादा होने के बाद भी आज देश को पता नहीं है कि संसद हमले का आरोपी अफजल आखिर जिंदा क्यों है? आखिर कौन लोग हैं, जो सरकार के शीर्ष स्तर से यह धर्मनिरपेक्षता निभा रहे हैं। जो भी हों, इससे इतना तो तय है कि सोनिया जी की धर्मनिरपेक्षता और जयपुर के विस्फोटों में संबंध तो है।
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