रविवार, 6 जनवरी 2008

गुंडों, अपराधियों के देश में 'जेन्टिलमैन गेम' का हश्र

ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गई भारतीय टीम के साथ जो कुछ भी हुआ, उसमें मुझे कुछ आश्चर्च नहीं है। आश्चर्य है कि भारतीय टीम और उसके प्रबंधन को क्या हो गया है। मेजबान सारी मर्यादाएं लांघ कर हमारा अपमान करता जाए, तो अतिथि के लिए मर्यादाओं की कोई बंदिश नहीं बचती। विश्व चैम्पियन के नाम पर इतराने वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम के बारे में ये तो पहले से ही मशहूर है कि वे क्रिकेट का युद्ध मैदान में कम और बाहर ज्यादा लड़ते हैं। विपक्षी टीम के बल्लेबाजों को ओछी टिप्पणियों से चिढ़ाना और उनकी एकाग्रता भंग करना कंगारुओं की खेल रणनीति का ही एक हिस्सा है और ऑस्ट्रेलियाई मीडिया टीम की इस रणनीति में पूरा साथ देती है।

इस बार भी साइमंड्स ने जब काफी देर तक हरभजन सिंह पर फब्तियां कसी, तो चिढ़कर भज्जी ने भी 'कुछ' कह दिया। इस पर भज्जी को नस्लभेदी टिप्पणी का दोषी मानकर तलब कर लिया गया। लेकिन ऑस्ट्रेलियाई अखबारों ने साइमंड्स के अभद्र व्यवहार पर एक भी लाइन लिखना गवारा नहीं समझा। उल्टे वहां के अखबारों ने इस बारे में खूब कहानियां बनाईं कि मैच के बाद ड्रेसिंग रूम में भारतीय खिलाड़ियों ने आपस में क्या बातें कीं। किसी भी एक ऑस्ट्रेलियाई अखबार ने भारतीय टीम के साथ हो रहे अन्याय और पक्षपातपूर्ण अम्पायरिंग पर सवाल उठाने का साहस नहीं किया।

लेकिन जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा कि ये ऑस्ट्रेलियाइयों की संस्कृति है और मुझे इसमें कोई आश्चर्य नहीं हैं। ऑस्ट्रेलियाइयों की इस संस्कृति की जड़ें उनके इतिहास में है। ऑस्ट्रेलिया दरअसल अंग्रेज अपराधियों का उपनिवेश है। 1750 में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति शुरू हुई और शुरू हुआ शहरी किस्म के अपराधों यानी छीनाझपटी, पॉकेटमारी, बटमारी का सिलसिला। उस समय ब्रिटेन में इस तरह के अपराधियों को रखने के लिए जेल जैसी अलग जगह नहीं हुआ करती थी। तो ब्रिटेन ने अपने इन अपराधियों को रखने के लिए अपने उपनिवेश अमेरिका का इस्तेमाल शुरू किया। क़रीब 40,000 ब्रिटिश अपराधी अमेरिका में फेंक दिए गए। लेकिन 1776 में अमेरिकी क्रांति शुरू होने के बाद ब्रिटेन को अपने अपराधियों का निर्यात बंद करना पड़ा। इसके बाद ब्रिटिश ज़मीन को समुद्र से जोड़ने वाली एकमात्र नदी टेम्स में खड़े जहाजों 'हल्क' में रखा जाने लगा। हल्क सड़े हुए युद्धक जहाजों को कहा जाता था, जो लड़ाई के लिए बेकार हो चुके थे। इसी बीच 1770 में कैप्टन जेम्स कुक ने ऑस्ट्रेलिया में Botany Bay पर उतर कर वहां ब्रिटेन का झंडा गाड़ दिया था। सो 1786 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट ने Botany Bay को अपराधियों का उपनिवेश बनाने का फैसला किया।

मई 1787 में कैप्टन आर्थर फिलिप की कमांड में 700 अपराधियों का पहला जत्था 11 जहाजों में भर कर ऑस्ट्रेलिया के लिए रवाना कर दिया गया। इनमें सबसे छोटा अपराधी 9 साल का था और सबसे बूढ़ी अपराधी 82 साल की थी। 252 दिनों की यात्रा कर दस्ता Botany Bay पहुंचा। लेकिन फिर कैप्टन फिलिप को महसूस हुआ कि वह जगह खेती के लिए अनुकूल नहीं थी, इसलिए उसने दस्ते को उत्तर में एक दूसरी जगह चलने को कहा। इस जगह का नाम कैप्टन फिलिप ने प्रधानमंत्री पिट के उपनिवेश मामलों के मंत्री लॉर्ड सिडनी के नाम पर सिडनी रखा। वही सिडनी जहां ऑस्ट्रेलियाइयों ने आज दूसरे टेस्ट मैच में बेईमानी और झूठ के बल पर भारत को हराया और फिर उछल-उछल कर इस जीत का जश्न मनाया।

1815 में नेपोलियोनिक युद्ध के ख़त्म होने के बाद कई और जहाज खाली हो गए और अपराधियों के निर्यात में और तेज़ी आ गई। केवल 1833 में ही 36 जहाजों में भरकर 7,000 अपराधी ऑस्ट्रेलिया भेजे गए और यह सिलसिला 1850 तक जारी रहा। ऑस्ट्रेलिया का तस्मानिया प्रांत पहला बाल अपराधी उपनिवेश बना जहां 9 से 18 साल तक के बाल अपराधियों को रखा जाता था। जब ये सभी ब्रिटिश अपराधी अपनी सज़ा का समय ख़त्म कर लेते थे, उसके बाद ये कहीं भी जाने और बसने के लिए स्वतंत्र थे। साइमंड्स, पोंटिंग, क्लार्क और उनके लिए अभियान चलाने वाले ऑस्ट्रेलियाई अखबार इन्हीं चोरों, बटमारों, झपटमारों और अपराधियों के वंशज हैं, इसीलिए उनसे नैतिकता या आत्मा की आवाज़ सुनने की उम्मीद ही बेकार है।

अब रही बात स्टीव बकनर और मार्क बेंसन के ग़लत फैसलों की। साइमंड्स को तीन बार और रिकी पोन्टिंग को दो बार आउट होने के बावजूद बचाने और वसीम जाफर, राहुल द्रविड़, सौरभ गांगुली को साफ तौर पर आउट नहीं होने के बावजूद आउट देने के इन अंपायरों के फैसलों में कोई मानवीय भूल की गुंजाइश नहीं है। ये साफ तौर पर बदमाशी और बेईमानी का मसला है। बकनर का भारत विरोधी रवैया पिछले 4-5 सालों में एक नहीं, बल्कि कई बार दिखा है। 2003-04 के भारतीय दौरे में सौरभ गांगुली ने बकनर को कैप्टन के रिपोर्ट में शून्य अंक दिया था। इस बार फिर शायद कुंबले कुछ ऐसा ही करें। लेकिन सवाल ये है कि ऐसी कौन सी मज़बूरी है जोकि भारतीय टीम को ऐसे मैचों का बहिष्कार करने से रोक रही है।

1981 में ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर गई भारतीय टीम के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। मेलबोर्न के मैदान पर सुनील गावस्कर को ग़लत एलबीडब्ल्यू क़रार दिया गया था। गावस्कर दूसरे छोर पर खड़े अपने सहयोगी चेतन चौहान को लेकर मैदान से बाहर निकल गए। टीम मैनेजर विंग कमांडर एस के दुर्रानी ने गेट पर ही चौहान को रोककर उन्हें वापस भेजा और भारत आखिरकार 54 रन से जीता। ख़ैर, सवाल हार-जीत का नहीं है, सवाल जवाब देने का है। सहनशीलता तभी तक प्रशंसनीय है, जब तक वो व्यक्तिगत अपमान तक सीमित हो, लेकिन जब राष्ट्रीय स्वाभिमान पर हमला हो, तो मुंहतोड़ जवाब देना ही चाहिए। गावस्कर या गांगुली की तरह के साहसी फैसले के लिए एक ख़ास तरह के व्यक्तित्व की ज़रूरत है। जिस टीम का भाग्य शरद पवार और राजीव शुक्ला जैसे रीढ़विहीन और अवसरवादी लोग निर्धारित कर रहे हों, उसके कप्तान से ऐसे हुंकार की उम्मीद करना भी बेकार ही है। भारतीय टीम वहां क्रिकेट खेलने गई है, षडयंत्र की राजनीति करने नहीं। पिछले टेस्ट के बाद आईसीसी के दरवाजे पर भारत की गुहार के बावजूद दूसरे टेस्ट में किए गए षडयंत्र के बाद तो राष्ट्रीय स्वाभिमान का तकाज़ा यही है कि हमारी टीम को ऐसे मैच और ऐसी श्रृंखला का बहिष्कार कर फौरन वापस लौट आना चाहिए।

4 टिप्‍पणियां:

हर्षवर्धन ने कहा…

ऑस्ट्रेलिया के बारे में ये अद्भुत और नई जानकारी देने के लिए शुक्रिया। इस समय मुझे तो डालमिया की याद आ रही है। ये पवार और शुक्ला तो नेता होते हुए भी इतने कमजोर साबित होंगे अंदाजा न था। डालमिया के समय भारत दुनिया के क्रिकेट के हर फैसले में मजबूत दिखता था। अब तो ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम के पवार के अपमान से लेकर साजिशन भारत के खिलाड़ियों का मनोबल कमजोर करने की कोशिश पर भी पवार कुछ बोल ही नहीं पाए। लगता है icc चेयरमैन की कुर्सी की महत्वाकांक्षा पर पवार देशहित कुर्बान करने की तैयारी कर रहे हैं।

Neeraj Rohilla ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को पढकर बडी निराशा हुयी । मैच में जो हुआ गलत हुआ लेकिन इस गुस्से में आपने तर्क का बिल्कुल ही साथ छोड दिया है जिसकी आपसे उम्मीद नहीं थी । आस्ट्रेलिया के इतिहास के बारे में तो सब जानते हैं लेकिन आपका ये उद्धरण दुर्भाग्यपूर्ण है ।

"साइमंड्स, पोंटिंग, क्लार्क और उनके लिए अभियान चलाने वाले ऑस्ट्रेलियाई अखबार इन्हीं चोरों, बटमारों, झपटमारों और अपराधियों के वंशज हैं, इसीलिए उनसे नैतिकता या आत्मा की आवाज़ सुनने की उम्मीद ही बेकार है।"

आपके अनुसार चोर की सभी पीढियाँ केवल चोर हो सकती हैं । शायद कहीं न कहीं इसमें आपके मन के Prejudice झलक रहे हैं । यदि अपने लिखे लेख को फ़िर से पढेगें तो मेरी बात समझ जायेगें । आपका लेख भी एक प्रकार से नस्लभेदी ही है ।


साथ ही लार्ड मैकाले के भाषण के आपने अपने ब्लाग पर सजा रखा है तो उस विषय पर इस पोस्ट को भी एक बार पढने का कष्ट करें ।

http://antardhwani.blogspot.com/2007/04/blog-post.html

भुवन भास्कर ने कहा…

नीरज बाबू, आपने अपनी टिप्पणी में दो विषय उठाये हैं। पहला, ऑस्ट्रेलियाइयों पर मेरे आक्षेप को लेकर और दूसरा मैकॉले के वक्तव्य से जुड़ा। मैकॉले के वक्तव्य पर लिखा आपके ब्लॉग का आलेख मैंने पढ़ लिया है, और उसपर अपनी टिप्पणी मैं वहीं दूंगा। लेकिन यहां मैं मेरे आलेख पर आपकी टिप्पणी की चर्चा करना चाहूंगा।
मेरे लेख से आपकी निराशा मैं समझ सकता हूं। मेरा ये दावा बिल्कुल नहीं है कि ऑस्ट्रेलियाइयों के मौजूदा व्यवहार को उनके इतिहास से जोड़कर मैंने कोई ज़बर्दस्त तार्किक आधार गढ़ने की कोशिश की है। मैंने केवल अपने आक्रोश को कठोरतम शब्द देने का साहस किया है। इसलिए कि ऑस्ट्रेलियाइयों के कृत्य से मेरे राष्ट्रीय स्वाभिमान को ठेस पहुंची है। सवाल तर्क का नहीं केवल संवेदनशीलता का है। आप कभी प्रयोग करके देखिएगा। निजी तौर पर मुझे किसी भी हद तक अपमानित कर लीजिए, मैं अपनी तार्किकता नहीं खो दूंगा। लेकिन मेरे राष्ट्रीय स्वाभिमान पर अगर कोई प्रहार होगा, तो मैं तर्क की सीमाएं नहीं संभाल सकूंगा।
मैंने ऐसे कई सज्जन देखे हैं, जो अपने घर की एक ईंट के लिए खून बहाने को तैयार होते हैं, लेकिन 'तीन बीघा', अरुणाचल और कश्मीर का मामला आने पर तार्किकता की चोटी पर चढ़ जाते हैं। माफ कीजिए, देश से जुड़ा हर मामला मुझे अपने घर का मामला लगता है और अगर कोई मेरी मां को गाली दे, मेरे बाप को अपमानित करे या मेरी पहचान को लांछित करे, तो मैं अपनी प्रतिक्रिया तर्क की कसौटी पर कस कर नहीं दे सकता। इसीलिए मैंने कहा कि सवाल तर्क का नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का है।

रही बात नस्लभेदी होने की, तो अगर आपने मेरे पहले के लेख पढ़े हों और मेरी मनोसंरचना को थोड़ा भी समझ पाए हों, तो आपको ऐसी शंका होनी ही नहीं चाहिए। मेरी स्मृति में रत्नाकर नाम के डाकू का वाल्मीकि में बदलना और हिरण्यकश्यपु के घर प्रह्लाद का पैदा होना साफ-साफ अंकित हैं। जन्म आधारित जाति व्यवस्था का मैं घोर विरोधी हूं और कुलीनता के सिद्धांत में विश्वास नहीं रखता हूं। लेकिन अगर किसी अपराधी का पुत्र भी अपने आचरण से अपराधी ही हो, तो केवल नस्लवादी होने के आरोप से बचने के लिए उसे महापुरुष और संत की उपाधि से नवाज़ने का कृत्य मैं तो नहीं कर सकता।

Sanjay Sharma ने कहा…

बहुत सुंदर आस्ट्रेलियाई जानकारी के लिए धन्यवाद ! कमीनेपन की मिशाल सिर्फ़ इंडिया के अन्दर ही नही है .हमने शायेद इंपोर्ट किया है . आपका तेवर सही दिशा मे है . सोंच सांसारिक न होकर सांस्कारिक है .
पढ़ना मे मजा आता है . जारी रहे .टिपण्णी भी तार्किक .पोस्ट सारगर्भित बहुत ही कम मिल पाता है .
आपकी कुछ बातों का समर्थन दिव्य दृष्टि पर " ला बुढिया गडास आज खून के नदी बहा देबुउ" पोस्ट करता हुआ
दिखेगा .
मैकाले को कोई कैसे देख रहा है इतिहास की बात है .आज बकनर और सामंड्स क्या है हमे क्या करना चाहिए
का सही विश्लेशन आपने किया . बेटे की करतूत को बाप से जोड़ कर देखा ही जाता है अच्छे और बुरे दोनों कर्मों मे . जरूरत से ज्यादा वजन किसी को न दें . लिखते रहे हम पढ़ते रहेंगे ,पढाते रहेंगे >