गुरुवार, 19 जुलाई 2012

नई मस्जिद, पुरानी कहानी


कुछ दिन पहले मेरे एक मुसलमान पत्रकार परिचित (मित्र इसलिए नहीं लिख रहा क्योंकि अभी कुछ दिनों पहले मैंने फेसबुक पर उनको अनफ्रेंड कर ब्लॉक कर दिया है) ने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखा था, जिसकी पहली लाइन थी कि भारत का मुसलमान मंदिर के घंटे की तरह है, जिसे जो चाहे, जब चाहे बजा जाता है। उस पर चली बहस तीन दिन तक खिंची और अंत में इतनी गंदी और अमर्यादित हो गई कि उन सज्जन को अपनी पूरी पोस्ट ही डिलीट करनी पड़ी।

ख़ैर, मैंने उनके पोस्ट पर अपना जो प्रतिवेदन दिया था, उसका लब्बोलुआब यही था कि भारत के मुसलमानों को हर उस राजनेता को अपना असल दुश्मन मानना चाहिए जो उनकी गलत मांगों को प्रश्रय देकर उन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करता है। उन्हें मेरी बात नहीं समझ में आई, जैसा कि मेरा अनुमान था। अब फिर मैं अपनी बात वहीं से शुरू कर रहा हूं। दिल्ली में 200 करोड़ रुपए की लागत से पूरी तरह तैयार मेट्रो स्टेशन की खुदाई में एक मस्जिद के अवशेष मिले। दावा है कि यह मस्जिद औरंगजेब ने बनवाई थी।

तुरंत उस इलाके का मुस्लिम विधायक और वहां के इमाम, मुल्ले दिल्ली की मुख्यमंत्री के पास पहुंचे। अब इस देश की राजनीति में कहां इतनी हिम्मत कि वह मुसलमानों की किसी मांग पर उनसे उसका स्पष्टीकरण पूछने का साहस कर सके। तो तुरंत शीला दीक्षित ने उनको मस्जिद की पूरी सुरक्षा का भरोसा देते हुए डीएमआरसी को निर्देश दिया कि 200 करोड़ रुपए से तैयार मेट्रो स्टेशन को कहीं और शिफ्ट किया जाए। जैसे ये 200 करोड़ रुपए शीला जी के पिताजी ने उन्हें विरासत में दिए थे।

खैर, यह तो एक अध्याय था। दूसरा अध्याय। भारतीय पुरातात्विक विभाग ने उस इलाके को किसी भी निर्माण के लिए प्रतिबंधित कर दिया और एमसीडी (भाजपा प्रशासित) ने घोषणा की कि वह अपनी ज़मीन नहीं देगा। लेकिन इस देश का मुसलमान यहां के कानून से हमेशा ऊपर रहा है (अगर आपको याद हो तो वहीं जामा मस्जिद के इमाम ने अपने खिलाफ़ वारंट जारी करने वाले सुप्रीम कोर्ट को पागल क़रार दिया था और उसका बाल भी बांका नहीं हुआ)। इस देश की राजनीति मुसलमानों के पैरों पर लोटने वाली दासी रही है (तभी दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों के घर जाकर अपनी नाक रगड़ी थी)। सो, तमाम प्रशासन और कानून को धता बताते हुए मस्जिद के खंडहर का पुनर्निर्माण शुरू हो गया है। स्टील के ढांचे, क्रंक्रीट और सीमेंट से दीवारें खड़ी की जा रही हैं और पूरा प्रशासन नपुंसक हो गया है।

एक और मज़ेदार बात देखिए। कल ही एनडीटीवी ने घंटे भर का प्रोग्राम किया और महान पत्रकार बरखा दत्त ने अपने पेट पैनल के जरिए देश को यह बताने की कोशिश की कि इस देश में अल्पसंख्यक (मुसलमान पढ़ें) पूर्वग्रह और भेदभाव का सामना कर रहा है। उन्होंने एक मुस्लिम को केस हिस्ट्री बनाया था, जिसे स्पाइसजेट के विमान से उतार दिया गया था। सैनिक अधिकारी बताए जाने वाले उस मुस्लिम ने स्पाइसजेट पर उन्हें मुसलमान होने के कारण उतारने का आरोप लगाया। स्पाइसजेट का कहना है कि वह प्रतिबंधित इलाकों की तस्वीर उतार रहे थे और इसलिए उनका कैमरा लेकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि उन्होंने तस्वीर डिलीट कर दी है। उन्होंने क्रू के साथ बदतमीजी की और सहयोग करने से इंकार किया।

सच-झूठ का फैसला इंक्वायरी के बाद होगा, लेकिन सेकुलरिज़्म (मतलब हिंदू विरोध) के प्रति निष्ठावान एनडीटीवी ने यह घोषित कर दिया कि इस देश में मुस्लिम पीड़ित है। यह एक ख़तरनाक स्थिति है, जिससे देश के हर नागरिक को डरना चाहिए। उपर जिन मुस्लिम पत्रकार का मैंने ज़िक्र किया, उन्हें तकलीफ़ थी कि यहां मुसलमानों को किराए का मकान नहीं मिलता और कि आपस में लड़ने वाले हिंदू, मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक हो जाते हैं। मैं भी यह मानता हूं। बीमारी की पहचान आपने ठीक कर ली है, लेकिन सही इलाज से आप डरते हैं। भले ही कोई हिंदू लालू, मुलायम, सोनिया, दिग्विजय या शीला दीक्षित का वोटर हो, लेकिन यह खेल उसे भी अखर रहा है। देश की पूरी राजनीति को मुसलमानों के पैरों पर लोटते देख कर उनके अंदर पर भी प्रतिक्रिया हो रही है। और इसी कारण हर दिन इस देश के हिंदू के अंदर मुसलमानों के प्रति थोड़ी-थोड़ी घृणा और थोड़ा-थोड़ा गुस्सा भर रहा है।

इस स्थिति से केवल मुसलमानों को ही नहीं, हर हिंदू को भी डरना चाहिए। क्योंकि घृणा और हिंसा हिंदू समाज का मूल संस्कार नहीं है। लेकिन इतिहास गवाह है कि समाज का गठन तर्क पर नहीं, इतिहास की नींव पर होता है। अगर देश की 100 करोड़ जनता मुसलमानों से घृणा करने लगेगी, तो उस स्थिति की कल्पना कोई भी कर सकता है। लालू, मुलायम, सोनिया और शीला को उस स्थिति से डर नहीं, क्योंकि उन्हें तो बस 5-10-15 या 20 साल की गद्दी चाहिए। मुसलमानों की क़ौमी गुंडागर्दी बंद होनी चाहिए, नहीं तो इस देश के लिए एक भीषण त्रासदी की भूमिका तैयार होती रहेगी।

2 टिप्‍पणियां:

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

अल्पसंख्यकवाद, वास्तव में मुसलामानावाद, को अपने देश की राजनीति का एक अंग बना दिया गया है. और ऐसा ही चलता रहा तो अगले २५-३० वर्षों में हिन्दुओं का भारत में ही सम्मान से जीना दूभर होने वाला है. वैसे हिन्दू जितना भी मुसलमान से घृणा करे वोट वो मुसलामानापरस्त पार्टियों को ही देता है

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

जबरदस्त विवेचना|