बुधवार, 28 नवंबर 2007

न्यायपालिका को जवाबदेह बनाना ज़रूरी तो है, लेकिन....


भारतीय लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में हल्ला-गुल्ला, जूतमपैजार, गाली-गलौच करते जनप्रतिनिधि अब किसी को चौंकाते नहीं। लेकिन यदि अगर किसी एक मुद्दे पर सभी दलों के सांसद एक सुर में बोलना शुरू कर दें, तो मन में किसी अनिष्ट की आशंका घर करने लगती है। क्या विडंबना है न! पता नहीं आप मेरी राय से सहमत होंगे या नहीं, लेकिन जैसे ही किसी एक मुद्दे पर सब में आम सहमति बन जाती है, मुझे लगता है जैसे ज़रूर देश का आम आदमी कुछ और असुरक्षित, कुछ और ग़रीब होने जा रहा है। नया मुद्दा है जजों की ईमानदारी सुनिश्चित करने का। शरद यादव ने सदन में सवाल उठाया है कि अगर राजनेताओं और सरकारी नौकरों पर किसी भी आरोप में तुरंत जांच हो सकती है, तो फिर न्यायाधीशों की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए।

मामला पूर्व मुख्य न्यायाधीश वाई के सब्बरवाल को लेकर उठा है। दिल्ली में अवैध निर्माण के खिलाफ छेड़े गए जस्टिस सब्बरवाल के अभियान को कई लोग दबी जुबान में ही सही, लेकिन अपने बिल्डर बेटे को फायदा पहुंचाने की कोशिशों का हिस्सा देखते हैं। हम भूले नहीं हैं कि जस्टिस सब्बरवाल पर इसी तरह के आरोप लगाने वाले मिड-डे के तीन पत्रकारों को अदालत की अवमानना के आरोप में तीन-तीन महीने जेल की सज़ा हुई थी। कहा जा रहा है कि सब्बरवाल के बेटे की संपत्ति कोई 200 करोड़ रुपये है। शरद यादव ने शून्य काल में मुद्दा उठाया और राज्य सभा के उपसभापति ने उन्हे ऐसा करने से रोकने की कोशिश भी की, लेकिन सभी सांसदों ने पार्टी लाइन से हटकर उनका ज़बर्दस्त समर्थन किया। न्यायाधीशों पर लगे आरोपों की जांच के लिए प्रस्तावित जज इंक्वायरी कमेटी के जल्दी गठन की भी मांग की गई।

देश के मुख्य न्यायाधीश पर लगे बेईमानी के आरोप वास्तव में गंभीर हैं। ये तर्क भी सही है कि लोकतंत्र में न्यायाधीश जैसी महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठे व्यक्ति पर कोई अंकुश क्यों नहीं होना चाहिए। शंका होती है तो सिर्फ ये कि शरद यादव या उनके जैसे माननीय सांसद कब से भ्रष्टाचार से आहत होने लगे। कहीं ये न्यायपालिका को नियंत्रित करने की कोई नई कोशिश तो नहीं? हो सकता है, लेकिन फिर भी न्यायपालिका को जवाबदेह बनाने की ज़रूरत अपनी जगह सही है। चुनौती होगी उस जवाबदेही को ईमानदार रखने की। आज की तारीख में देश की हर संस्था आस्था के संकट से गुज़र रही है। चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्था को वर्तमान यूपीए सरकार ने किस तरह अपना पालतू बनाने की कोशिश की है, ये पूरा देश देख चुका है। स्वास्थ्य मंत्री रामादौस ने अपने अहंकार की लड़ाई में एम्स जैसी संस्था का जो कबाड़ा किया है, ये भी पूरा देश देख रहा है और किरण बेदी जैसी ईमानदार पुलिस अधिकारी को किस तरह सेवा छोड़ने के लिए मज़बूर कर दिया गया, ये भी पूरा देश देख रहा है। इसलिए ये फैसला वास्तव में कठिन है कि न्यायपालिका को जवाबदेह बनाने की संसद की मंशा का समर्थन किया जाए या विरोध। क्योंकि ये जवाबदेही ज़रूरी तो है, लेकिन क्या जवाबदेही तय करने वाले खुद जनता के प्रति अपनी जवाबदेही पर खरा उतर पाए हैं?

3 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

जनतन्त्र की सभी संस्थाऐं जवाबदेह होनी चाहिए, न्याय प्रणाली उससे अछूती क्यों रहे।

Sanjeeva Tiwari ने कहा…

अग्रज द्विवेदी जी के कथन से हम भी सहमत हैं ।

आरंभ
जूनियर कांउसिल

Sanjay Sharma ने कहा…

जजों पर लगाम जज की एक टोली ही लगाये तो कुछ हद तक सही हो ! सारे प्रणाली को प्रजातांत्रिक करने से किसी प्रकार का ख़ास लाभ होता दिखाई नही दे रहा . फैसला जब भी दिया जाता है आह़त एक पक्ष होता ही है .इसका मतलब ये नही होता की आह़त पक्ष अपने अनुसार फैसला बदलने की तैयारी कर ले . आप सब जो कहे
पर मुझे लगता है यह अपने कलम से अपने पक्ष मे फैसला लिख मारने की तैयारी भर है . पुरा देश दिल्ली नही है . देश की जनता का विश्वास अदालत मे और गहरा हाल के त्वरित फैसले से ही हुआ है . और हमे शरद यादव या कोई अन्य सांसद का बयान उस समय आया है जब आम जनता फैसले से झूमा है . अदालत को
दिल से सराहा है . अटूट विश्वास किया है . अगर विशवास को तोड़ना ही है तो ये सरासर ग़लत फैसला है .
फैसले की समीक्षा करने के लिए ही लोअर कोर्ट , हाई कोर्ट , सुप्रीम कोर्ट, अंत मे महामहिम कोर्ट फ़िर ये कोशिश क्यों ? कहीं भाजपा कोर्ट ,कांग्रेस कोर्ट , समाजवादी कोर्ट , कम्युनिस्ट कोर्ट, शरद कोर्ट , पासवान कोर्ट , लालू कोर्ट बनाने की तैयारी तो नही .
आप समर्थन करिये हम विरोध करते है हम लोकतंत्र मे आस्था रखते हुए न्याय व्यवस्था के तानाशाह रुख के
प्रबल समर्थन करते हैं.
मैं माँ का लोकतंत्र और पिता के तानाशाह रुख का कायल हूँ . डराने का काम केवल भगवन को न दे .