शनिवार, 8 दिसंबर 2007

प्लीज, मुझे भी तो सेकुलर बनने दो

आप बहुत अच्छे आदमी हैं। बड़े दयालु, बड़े विनम्र, बड़े सज्जन। लेकिन बस मैं कभी-कभी आपके पिताजी को दो-चार गालियां दे देता हूं, आपकी मां पर कुछ फिकरे कस देता हूं और आपकी बहन पर कुछ जुमले उछाल देता हूं। लेकिन उससे क्या? आपको फिर भी मेरे साथ खड़ा होना चाहिए, नहीं तो मैं आपको उद्दंड और संकीर्ण क़रार दूंगा। आप क्या कहेंगे? मेरे ख्याल में आप कहेंगे कि भांड़ में जाओ, तुम मुझे उद्दंड कहो या संकीर्ण या कुछ और, मेरी मां, मेरी बहन, मेरे पिता का अपमान किया तो तुम्हारी गर्दन मरोड़ दूंगा। अगर आप ऐसा कहेंगे और करेंगे, तो ही आप समाज में इज़्जत के हक़दार हैं। नहीं तो आप गंदे कीड़े के समान हैं, जिसे कोई भी अपने पैर के नीचे कुचल कर चला जाता है।

वाल्मीकि ने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम माना है और तुलसीदास ने उन्हें भगवान माना। आप उन्हें जो मानना है मानें। उनके चरित्र की विवेचना करें, उनके जीवन की समीक्षा करें। लेकिन याद रखें कि मैं उन्हें अपना पूर्वज मानता हूं। मेरी धमनियों में उन्हीं के रक्त का हिस्सा बह रहा है। इसलिए अगर कोई करुणानिधि या कोई बुद्धदेव उन्हें कुछ नहीं मानता और उनके जीवन के बारे में अनर्गल बकवास करता है, तो मुझे क्यों नहीं उसका गर्दन मरोड़ देना चाहिए। लेकिन क्योंकि करुणानिधि या बुद्धदेव सत्ता के पहाड़ पर खड़े हैं और मैं उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता, तो मेरे पास एक ही उपाय बचता है कि मैं लोकतांत्रिक पद्धति से इन ग़ैर भारतीयों को भारतवर्ष की सत्ता से च्युत करने के लिए हर संभव प्रयास करुं। लेकिन अगर मैं ऐसा करता हूं, तो मुझे साम्प्रदायिक क़रार दिया जाएगा। तो मुझे क्या करना चाहिए। क्या मुझे ये नहीं कहना चाहिए कि भांड़ में जाओ, मुझे तुम्हारे प्रमाणपत्र की कोई ज़रूरत नहीं है। अगर अपने श्रद्धा पुरुषों और पूर्वजों के सम्मान को बचाने के बदले मुझे साम्प्रदायिक कहलाना पड़े तो सौ बार कहलाना पसंद करुंगा।

लेकिन मैं अक्सर सोचता हूं कि राम को सरेआम गालियां देने वालों, राम के अस्तित्व को नकारने वालों, वेदों को जलाने की बात कहने वालों, भारतीय संस्कृति को गलियाने वालों को कैसे इस देश के करोड़ों आस्थावान लोगों का समर्थन मिल जाता है। है न आश्चर्य की बात, बाप की गाली सुनकर जिगरी दोस्त का कॉलर पकड़ लेने वाला आदमी क्यों राम का अपमान सुनकर उदार बन जाता है। मां की गाली सुनकर उबल पड़ने वाला आदमी क्यों भारत माता का अपमान सुनकर दार्शनिक बन जाता है। इसलिए कि वो आदमी राम के आगे घंटी तो ज़रूर टनटनाता है, लेकिन कभी उसने राम को अपना माना ही नहीं। 'भारत माता' की जय ज़रूर बोलता है, लेकिन इस मिट्टी की ममता को कभी महसूस ही नहीं किया। इसीलिये अपने घर की चहारदिवारी की एक ईंट निकालने वाले की तो खाल खींचने के लिए तैयार रहता है, लेकिन कश्मीर और अरुणाचल पर विदेशियों के दावे पर उसका खून नहीं खौलता। 1950 के दशक में
जब चीनी सेना लद्दाख के इलाकों पर कब्ज़ा कर रही थी, तब नेहरू पूरे देश को धोखा देकर 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' का मीठा ज़हर पिला रहे थे, लेकिन जब आखिरकार चीन ने लद्दाख में सड़क बनाने की घोषणा कर दी, तब उन्होंने चीनी कब्ज़े को नज़रअंदाज करने का कुतर्क देते हुए बेशर्मी से संसद में कहा कि चीन ने जिस ज़मीन पर कब्ज़ा किया है, वहां तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता। ये है इस तरह के लोगों की मानस रचना।

मैं अक्सर सोचता हूं कि मैं भी सेकुलर बनूं। जिस देश की सर्वोच्च सत्ता एक विदेशी महिला की इच्छा से चलती हो, वहां सेकुलर होना ही सर्वोत्तम नीति है। इस देश में आगे बढ़ना है तो धर्मनिरपेक्ष बनिए, देशनिरपेक्ष बनिए, संस्कृतिनिरपेक्ष बनिए, पितानिरपेक्ष, मातानिरपेक्ष और आत्मसम्मान निरपेक्ष बनिए। मैं भी यही सब बनना चाहता हूं। लेकिन फिर मैं सुनता हूं कि मेरे प्रधानमंत्री कहते हैं कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यकों का है यानी राम, कृष्ण में आस्था रखने वाले यहां दूसरे दर्ज़े के नागरिक हैं। रिज़र्व बैंक कहता है कि सभी बैंक 15% लोन केवल मुसलमानों को दें। शहीदों के परिवारों को 150-200 रुपये पेंशन देने वाली मेरी सरकार केवल मुसलमान छात्रों की छात्रवृत्ति के लिए 1,500 करोड़ रुपये देती है। मेरे देश की सरकार (और उत्तर प्रदेश सरकार भी) एक सर्वेक्षण के द्वारा मुस्लिम बहुल ज़िलों की पहचान कर उन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में प्राथमिकता देने की नीति बना रही हैं।

कुछ सौ हुड़दंगी कट्टरपंथियों के दंगे से डरकर तसलीमा नसरीन को राज्य से बाहर निकाल देने वाले बुद्धदेव सीना तान कर राम को कवि की कल्पना बताते हैं। हत्या के आरोप में एक शंकराचार्य को गिरफ्तार करने वाली मेरे देश की पुलिस जब बम विस्फोट की जांच के लिए जामा मस्जिद के अंदर जाती है तो वहां के इमाम के गुंडे उसे खदेड़ देते हैं और फिर मेरा राजनीतिक नेतृत्व इमाम के आगे घुटने टेक कर माफी की गुहार करने लगता है। कोयम्बटूर बम विस्फोट के आरोप में तमिलनाडु की जेल में बंद अब्दुल नासिर मदनी (अब बरी) को जेल में केरल की आयुर्वेदिक मालिश उपलब्ध कराने वाले करुणानिधि राम का अपमान करने में तनिक संकोच नहीं करते। बाबरी ढांचा के गिरने पर 15 साल से मातम कर रही मेरे देश की राजनीतिक पार्टियां रामसेतु को तोड़ने के षडयंत्र पर चूं नहीं करते। उच्चतम न्यायालय के बार-बार अवैध ठहराने के बावजूद आंध्र प्रदेश की सरकार मुसलमानों को 5% आरक्षण देने का प्रपंच करने से बाज नहीं आती। असम में बंगलादेशी घुसपैठियों को बसाने के लिए वहां की सरकार नया कानून लाती है (उच्चतम न्यायालय ने उसे अवैध क़रार दिया)। मैं देखता हूं कि हर दिन मेरे देश की सत्ता मेरे धर्म को, मेरे पूर्वजों को, मेरी संस्कृति को, मेरे देश को अपमानित कर रही है। फिर भी मैं चाहता हूं कि मैं सेकुलर बनूं। लेकिन क्या करूं। जब भी इन बुद्धदेवों और करुणानिधियों की गति देखता हूं तो मन विद्रोह कर कहता है, भांड़ में जाओ। नहीं बनना सेकुलर। अगर मेरे देश के आत्मसम्मान की कीमत मुझे साम्प्रदायिक और फासिस्ट कहलाकर चुकानी है, तो मैं चुकाउंगा। ओह! हे बुद्धदेवों, हे करुणानिधिओं, तुम सुधर क्यों नहीं जाते। प्लीज़, मुझे भी तो सेकुलर बनने दो।

3 टिप्‍पणियां:

rajivtaneja ने कहा…

मानस पटल को झकझकोरने वाला करारा व्यंग्य...
सब वोटों की माया है....सबको गद्दी प्यारी है...
सभी इन्हे बहलाने-फुसलाने में लगे हैं

Manish ने कहा…

Any Bharatiya will agree with you sir. But the problem lies with the india. It is "India" which will have problem with whatever you are writing. India for which Mr. Javed Akhtar is going to choose "LEAD INDIA" winner. Certainly his criterial would be to bash Modi for his remark on Sohrabuddin, for which he is filing a case in Supreme court. Why don't he puts case for freedom of speech for Taslima Nasreen?
Keep your good work up. Coming to your blog is an energetic experience.
Manish

मिहिरभोज ने कहा…

बहुत खूब