शुक्रवार, 21 दिसंबर 2007

"देश के संसाधनों पर पहला हक़ किसका हो?"

हर्षवर्धन ने कुछ दिनों पहले अपने ब्लॉग में पूछा था कि विनोद दुआ की समस्या क्या है। दरअसल वो कोई सवाल नहीं था, बल्कि अपने आप एक जवाब था। विनोद दुआ की समस्या किसी विचार की नहीं, बल्कि वैचारिक प्रतिबद्धता की समस्या है। ये समस्या किसी व्यक्ति की भी हो सकती है, संस्था की भी हो सकती है, समाज की या फिर किसी देश की भी हो सकती है। गुजरात चुनावों के दौरान विनोद दुआ जी लोगों से पूछते फिर रहे थे कि आप किसी अच्छे व्यक्ति को वोट देंगे या नरेंद्र मोदी को। विनोद दुआ वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण उपजी एक व्यक्ति की समस्या का प्रकट कर रहे थे। यही समस्या जब एक संस्था को त्रस्त करती है, तो उसका नाम एनडीटीवी हो जाता है जिसका लोगो लगा माइक लेकर दुआ जी घूम रहे थे।

एनडीसी की बैठक में जब प्रधानमंत्री ने पहली बार एक ऐसी पंचवर्षीय योजना का खाका पेश किया जिसका आधार विकास नहीं, बल्कि अल्पसंख्यकवाद था तो नरेन्द्र मोदी की अगुआई में बीजेपी शासित राज्यों ने उसका विरोध किया। एक पत्रकार के तौर पर अगर इस मुद्दे की रिपोर्टिंग करनी हो, तो मेरा साफ मानना है कि आपको किसी तरह का ढुलमुल रवैया नहीं अपनाना चाहिए। यह एक राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा है और इसके पक्ष या विपक्ष में धारदार तरीके से जिरह की जानी चाहिए। लेकिन अगर आपमें इस फैसले के परिणामों को स्वीकार कर पाने की हिम्मत नहीं है और फिर भी आप पत्रकार के तौर पर मिले मंच पर अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की दुर्गंध फैलाना चाहते हैं, तो फिर आपके लिए एनडीटीवी जैसे मंच ही मुफीद हैं। एनडीसी की बैठक के दिन एनडीटीवी ने देश की जनता से एक सवाल पूछा। सवाल कुछ इस प्रकार था- देश के संसाधनों पर किसका पहला अधिकार होना चाहिए? विकल्प थे, (क) बहुसंख्यकों का, (ख) अल्पसंख्यकों का और (ग) जिसकी लाठी उसकी भैंस। ये है वैचारिक प्रतिबद्धता से त्रस्त एक संस्था की समस्या। अगर आपको ठीक याद हो तो कुछ ही दिनों पहले प्रधानमंत्री ने बयान दिया था कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है। और अब एनडीटीवी के ये तीन विकल्प। देश के सभी नागरिकों के बीच उनकी ज़रूरतों के मुताबिक राष्ट्रीय संसाधनों के बंटवारे का विकल्प न तो प्रधानमंत्री की वैचारिक प्रबद्धता में है और न ही एनडीटीवी के।

मेरा हमेशा से मानना रहा है कि पत्रकारिता में तटस्थता की अवधारणा एक छलावा है। लेकिन साथ ही मैं ये भी मानता हूं कि ख़बर का एंगल तय करते समय तथ्यों को छुपाना या तोड़ना-मरोड़ना एक आपराधिक कृत्य है। लेकिन आप हर ज़रूरी तथ्य को उजागर करते हुए भी ख़बर अपने एंगल से दें, इसके लिए आपमें हिम्मत होनी चाहिए। ख़ुद को ग़लत कहने की हिम्मत। एनडीटीवी या विनोद दुआ की दिक्कत ये है कि उनकी प्रतिबद्धता तथ्यों के उजागर होने के पहले से ही तय है। ऐसे में अपना एंगल तय करते समय प्रतिकूल तथ्यों को छुपाना उनकी मज़बूरी है। इसीलिए जब एनडीटीवी ये सवाल करता है कि देश के संसाधनों पर किसका हक़ होना चाहिए तो उसके जवाबों में 'सबका' का विकल्प नदारद होता है।

3 टिप्‍पणियां:

Sanjeet Tripathi ने कहा…

सहमत!!

जब भी एन डी टी वी देखने बैठता हूं तो बार-बार यही लगता है कि कोई समाचार चैनल देख रहा हूं या "किसी राजनैतिक विचारधारा" का वाहक एक चैनल।

Sanjay Sharma ने कहा…

बहुत सही लिखा है . मैं भी एन.डी.टी.वी के प्रति ये ख्याल पाल कर बैठे रहते है की इसका जो भी कार्यकर्म
होगा वो ८० % के गले पर छुरी चलाने वाला होगा . और होता भी है . विनोद को तो न जाने कौन सा दुआ चला रहा है . पंकज पचौरी क्या कम है . मेरी समझ मे आता नही एन.डी.टी.वी को लोग सबसे अलग क्यों और कैसे
समझ लेता है जबकि इसके बहस मे हमेशा गिरिजा व्यास अपने सड़े- गले विचार के साथ होती ही होती है .
बीजेपी से एक मरिअल को रखता है धो-धा कर बेचारे का हाल बुरा कर देता है .
वैसे मैं न तो बीजेपी हूँ न कांग्रेस ,न कमुनिस्ट न सपा न आरजेडी . अपने आपको सामाजिक जरूर मानता हूँ
सामाजिक कोण से ये लोग ज़हर फैला रहे हैं .हमने इनको देखना बंद कर दिया है केवल डीडी न्यूज़ ही देख लेता
हूं . दिव्य दृष्टि है खबरों की ख़बर तक पहुचना मुश्किल नही होता .

हर्षवर्धन ने कहा…

सबका विकल्प न होना मुझे भी अखरा था। आपने ये विषय लोगों के ध्यान में फिर लाया। अच्छा किया।