बुधवार, 12 दिसंबर 2007

गुड़गांव का जवाब ही तय करेगा हमारे भविष्य की राह

दिल्ली के नज़दीक गुड़गांव के एक स्कूल में आठवीं क्लास के एक लड़के का अपने दोस्त की गोली मारकर हत्या करना रोज़ हो रहे अपराधों की श्रृंखला में केवल एक कड़ी भर नहीं है। ये घटना 9% की दर से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था के बीच ढीले पड़ रहे सामाजिक मूल्यों की एक झांकी है। अब तक स्कूली छात्रों के अपने स्कूल में गोलियां चलाने और अपने दोस्तों की हत्याएं करने की ख़बरें केवल कनाडा और अमेरिका जैसे देशों से ही आती थीं और हम संतोष से कहते थे कि ये तो पश्चिमी समाज की बीमारी है जिससे हम बिल्कुल अछूते हैं। लेकिन गुड़गांव की घटना ने हमें एक करारे तमाचे के साथ ये बता दिया है कि हम भी अछूते नहीं है। ऐसा नहीं है कि ये बीमारी की शुरुआत है। ये तो बीमारी का लक्षण है। यानी समाज पहले ही बीमार हो चुका है और उसके लक्षण अब प्रकट होने लगे हैं। यह लक्षण है उपभोग केन्द्रित विकास का। यह लक्षण है नवधनाढ्यता से पैदा मनोविकारों का। स्कूलों में बच्चों की आपसी लड़ाई कोई नई बात नहीं है। अपने स्कूली दिनों में आपने और हमने सबने ऐसी लड़ाइयां की हैं, लेकिन शाम होते ही जब हम खेल के मैदान में पहुंचते थे, तो दिन की लड़ाई हवा हो जाती थी। हम एक बार फिर साथ दौड़ते थे, साथ खेलते थे और साथ लड़ते थे, फिर साथ खेलने के लिए।

गुड़गांव की घटना बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से एक भयानक घटना है। गोली चलाने वाले 13 साल के बच्चे ने लगभग 24 घंटे पहले इस हत्या की योजना बनाई, अपने घर से रिवॉल्वर चोरी की, स्कूल के टॉयलेट में उसे छुपाया और फिर मौका देखकर अपने सहपाठी के सर में गोली मार दी। यानी पिछले 24 घंटे में उसने इस हत्या के अलावा कुछ और नहीं सोचा। और ताज्जुब ये है कि पिछले 24 घंटे में उसके मन में एक बार भी इस हत्या के परिणामों का ख्याल नहीं आया। क्योंकि अगर उसने इस हत्या के बाद अपना, अपने परिवार का, अपने दोस्त का या दोस्त के परिवार का एक बार भी विचार किया होता, तो इस भयानक योजना को कभी क्रियान्वित नहीं करता।

ये असफलता उस बच्चे की नहीं, उसके पिता, उसकी माता और उसके परिवार की है। और क्योंकि वो परिवार इस समाज का हिस्सा है, तो ये असफलता इस समाज की है। हम अपने बच्चों को ये तो बताते हैं कि पढ़-लिख कर समाज के शक्तिशाली, सत्तारूढ़ वर्ग का हिस्सा बनना है, लेकिन ये नहीं बताते कि उसके बाद क्या करना है। हम अपने बच्चों को ये तो सिखाते हैं कि रुपये में बहुत ताक़त है और समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए ढेर सारे रुपये जोड़ने हैं, लेकिन ये नहीं बताते कि रुपये की ताक़त का इस्तेमाल किस तरह करना है। नतीजा ये होता है कि सत्ताबल और धनबल के शिखर पर पहुंचने के बाद इंसान को लगता है कि खुद के लिए इसका ज़्यादा से ज़्यादा उपभोग कर लेना ही जीवन का उद्देश्य है।

विकास के मॉडल पर बहस होते अब छह दशक बीत चुके हैं। हमने ये स्वीकार कर लिया है कि विकास का एकमात्र रास्ता अमेरिकी डॉलर से होकर ही गुजरता है। लेकिन इस विकास के दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच बढ़ती आर्थिक खाई से भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और आपसी गलाकाट प्रतियोगिता से एक-दूसरे के प्रति अविश्वास भी बढ़ रहा है। ऐसे में गुड़गांव के स्कूल की ये घटना अपने आप में बहुत सारे सवाल तो उठाती ही है, बहुत सारे जवाब भी दे जाती है। अरबों डॉलर के कारोबार वाली अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंपनियों ने जिस तरह पिछले एक दशक में गुड़गांव को मैनहट्टन के फ्रेम में उतारने की कोशिश की है, उसके माथे कई परिवारों को करोड़पति बनाने का श्रेय है, लेकिन सवाल तो ये है कि घर के तेरह साल के बच्चे के जीवन पर हत्यारे की मुहर लगाने का कलंक किसके माथे होना चाहिए। इस सवाल के जवाब को स्वीकार करने की हमारी हिम्मत ही हमारे बच्चों का भविष्य तय करेगी।

3 टिप्‍पणियां:

rajivtaneja ने कहा…

ये गुडगांव की घटना तो अभी शुरुआत मात्र ही है...आगे देखो क्या होता है...

कितने ऐब..कितनी बिमारियाँ लेकर आएगी ये सबको किसी भी कीमत पर पीछे छोड अन्धाधुन्ध आगे बढने की चाह... कुछ नहीं पता...

Sanjay Sharma ने कहा…

maa baap ke paas Time ka aabhav,aadhunikta ko salam ! aur vastvikta ko laat marti maansikta, shiksha me bazarwad. schooli shiksha ka girta astar, sudharwad se media ka muh modana. ekal pariwar kiwakalat karti flatnuma ghar maa baap ke dushit sanskaar se ru baru hona. anek samayaon ko janm deta rahega.

Jaroori hai khaas kar media wale is news ko dono-teeno bachche ke avibhavak ke saath us school ko bhi kam se kam ek maah tak khabar lete rahe.kalh ek tv chanel par school prashashan ka bachav karte huye paya.jo kahin se nyayochit nahi hai. school me ya schooli vatavaran me bachcha adhik se adhik bitata hai atah school ka TRP ki chinta na karke kabaren jaari rahe.
school ya school prashashan ki bhi utani hi galti hai jitani ki teeno ke avibhavak ki. avibhavak to dandint ho gaye. ab school ko saj ke rakh dene ki jaroorat hai. tab hi sudhar ki aasha hai.

bahut hi jordar tarike se jwalant samsya par lekh dene ke liye sadhuwad !

Sanjeeva Tiwari ने कहा…

प्रत्‍येक व्‍यक्ति यदि ऐसी ही सोंच रखेगा तो ही समाज में बदलाव आ पायेगा पर इसके आसरे पे बैठे रहना भी उचित नहीं हैं । हमें स्‍वयं इस पर चिंतन करना है एवं पैसे को सर्वपरि बनाने की प्रवृत्ति को कम से कम बच्‍चों में नहीं आने देना है ।