कर्नाटक दक्षिण भारत में भाजपा का वाटर लू तो साबित नहीं होने जा रहा। अगर हो जाए, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए और अगर न हो तो, यही मानना चाहिए कि भाजपा को सचमुच राम का सहारा है। कर्नाटक को दक्षिण भारत का गेटवे मानकर खुश होने वाले भाजपाइयों के लिए तीन सालों का वहां का शासन किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रहा है। एक राष्ट्रीय और कैडर आधारित पार्टी के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में कंठ तक डूबा उसका एक मुख्यमंत्री पिछले करीब साल भर से उसे ब्लैकमेल कर रहा है और वह बेबस, लाचार नजर आ रही है।
लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है? भारतीय दर्शन में लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मार्ग की शुचिता को बहुत महत्व दिया गया है। यह सही है कि आधुनिक भारतीय राजनीति में इस शुचिता की भी अपनी एक सीमा है। लेकिन अगर लक्ष्य केवल सत्ता हासिल करना न हो और आप एक विचारधारा के साथ राजनीति करने का दंभ भरते हों, तो उस सीमा तक की शुचिता तो आपको रखनी ही चाहिए। अगर आप नहीं रखेंगे, तो आपका हश्र वही होगा, जो कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी का हुआ है। साल 2008 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले कर्नाटक में सत्ता के मुहाने पर बैठी भाजपा के धैर्य का बांध टूट गया और उसने घोषित तस्करों, रेड्डी बंधुओं को अपनी गोद में बिठा लिया। ये रेड्डी बंधु, जिनका किसी राजनीतिक दल या विचारधारा से किसी तरह का कोई सरोकार नहीं था और जो पूर्ववर्ती सरकारों में मंत्री बन कर राज्य में लूट का तंत्र चला रहे थे, एकाएक भाजपा के प्रिय हो गए। बेल्लारी उनका चारागाह था और सुषमा स्वराज ने वहां से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा था। अब सुषमा जी को रेड्डी बंधुओं की कौन सी सेवाएं मिली थीं, यह तो वही जानें, लेकिन जिन भ्रष्ट स्मगलरों की कारस्तानी कर्नाटक के बच्चे-बच्चे को पता थी, उन्हें सार्वजनिक तौर पर अपना भाई और प्रिय बताकर सुषमा जी ने भाजपा की वैचारिक प्रतिबद्धता की जड़ों में मट्ठा डाल दिया।
यह बहुत ही रोचक घटनाक्रञ्म है। करीब साल भर पहले इन्हीं रेड्डी बंधुओं ने येद्दयुरप्पा को खून के आंसू रुलाए। येद्दयुरप्पा ने रेड्डी बंधुओं की लूट पर अंकुश लगाई और उन तीनों भाइयों ने अकूत संपत्ति के बल पर खरीदे विधायकों के बूते मुख्यमंत्री को इस्तीफे के लिएम जबूर कर दिया। पार्टी हाईकमान आंखों पर पट्टी डाल कर सोया रहा। सुषमा जी ने अपने मुख्यमंत्री की जगह स्मगलर भाइयों को गले लगाया। फिर येद्दयुरप्पा भागे-भागे दिल्ली आए। दिल्ली में बैठे भाजपा नेताओं ने साफ कर दिया कि रेड्डी बंधु नाम के कैंसर से छुटकारा पाने का उनका कोई इरादा नहीं है। अत्यंत अपमानजनक परिस्थितियों में येद्दयुरप्पा को रेड्डी बंधुओं से समझौता करना पड़ा।
उनके लोगों को, जिन्हें मंत्रिमंडल से निकाला गया था, फिर से शामिल करना पड़ा। क्या उसी समय भाजपा को रेड्डी बंधुओं को पार्टी से चिपकाने की अपनी गलती का सुधार नहीं करना चाहिए था? सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लंबी अवधि की राजनीति करने वाली एक राष्ट्रीय पार्टी एक सरकार के लिए अपनी मूलभूत जमीन कमजोर करने का जोखिम कैसे ले सकती है? लेकिन भाजपा ने यह जोखिम लिया। येद्दयुरप्पा को राजनीति का समीकरण समझ में आ गया। उसके बाद साल भर में उन्होंने अपने विधायकों को क्या घुट्टी पिलाई, किस तरह के फायदे दिए, किस तरह की छूट दी कि पूरा मामला पलट गया। आज कर्नाटक के 60 विधायक उनके साथ आंसू बहाने को तैयार हैं। यह ठीक है कि ये सभी उनके लिंगायत समुदाय से ही हैं। लेकिन ये लोग साल भर पहले भी तो लिंगायत ही थे।
अब एक नजर येद्दयुरप्पा के इतिहास पर भी डालिए। साल 2004 विधानसभा चुनाव में भाजपा को 79 सीटें मिलीं और वह विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी। लेकिन कांग्रेस ने जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बनाया। मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे येद्दयुरप्पा इतने मायूस और हतोत्साहित हुए कि उन्होंने भाजपा छोड़ने का फैसला कर डाला। जेडीएस के एच डी देवेगौड़ा और उनके बेटे कुमारस्वामी के आगे मत्था टेकने पहुंच गए। हालांकि बाद में भाजपा ने उन्हें रोकने में सफलता पा ली, लेकिन 2008 के चुनावों में ऐसे नेता को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करना क्या वैचारिक दिवालियापन नहीं था। जब येद्दयुरप्पा का असली चरित्र सामने आ चुका था, तो क्यों नहीं पार्टी ने अगले चार साल में एक नया नेता तैयार किया जिसकी अगुवाई में चुनाव लड़ा जा सके?
ये वो सवाल हैं, जिन पर भाजपा को विचार करना होगा और इनके जवाब खोजने होंगे। कर्नाटक की घटनाओं का राज्य और देश में भाजपा की राजनीति पर चाहे जो असर हो, लेकिन देश के लोगों के मन में इन घटनाओं को जो असर हो चुका है, उसे धुलने में वर्षों लग जाएंगे। यह कीमत निश्चित तौर पर पांच साल तक कर्नाटक की सरकार चलाने के फायदों के मुकाबले बहुत ज्यादा है।
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मंगलवार, 2 अगस्त 2011
रविवार, 25 मई 2008
राजदीप के सवाल पर जयंती का 'वफादार' जवाब
राजदीप सरदेसाई का एक सवाल है, जो उन्होंने कांग्रेस नेता जयंती नटराजन से पूछा। जयंती कुछ भी जवाब दें, राजदीप के सवाल से उठने वाले सवाल वाकई मजेदार हैं। राजदीप जानना चाहते हैं कि जिस एस एम कृष्णा को कर्नाटक की सक्रिय राजनीति में उतारने के लिए महाराष्ट्र के राज्यपाल पद से इस्तीफा दिलाया गया, उन्हें पूरे प्रचार अभियान के दौरान कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी क्यों नहीं दी गई। यहां तक तो ठीक है। लेकिन इसके बाद राजदीप ने जो सवाल पूछा और जयंती ने जो जवाब दिया, वह बहुत मजेदार है।
राजदीप ने पूछा कि कृष्णा के साथ इस तरह की रणनीति के लिए जिम्मेदार कौन है, इसके लिए जवाबदेही किसकी होगी। जयंती को चाहिए था कि वे अपने पुराने नेता और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव की शैली में मुस्करा कर शांत रह जातीं। क्योंकि देश की राजनीति का ककहरा जानने वाला आदमी भी जानता है कि कृष्णा को राज्यपाल पद से इस्तीफा दिलाना सोनिया-राहुल के अलावा किसी और के वश की बात नहीं थी। कृष्णा को कर्नाटक की जिम्मेदारी देने या न देने का फैसला करने की औकात कांग्रेस में सोनिया-राहुल के अलावा किसमें है? फिर अगर कृष्णा को अगर राज्यपाल से केवल इस एक चुनाव के लिए इस्तीफा दिलाया गया, तो साफ था कि उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया जाना चाहिए था। क्या जयंती बता सकती हैं कि यह अधिकार कांग्रेस में किसके पास है?
लेकिन जिस पार्टी की पूरी राजनीति एक परिवार के प्रति वफादारी के एलान पर टिकी हुई हो, उसके किसी नेता से चुप रहने की राजनीतिक ईमानदारी की अपेक्षा भी मुश्किल है। इसलिए जयंती ने कहा, हम जरूर इसकी समीक्षा करेंगे। मतलब सोनिया की असफलता के लिए एक बार फिर कुछ और गर्दन कटेंगे। खैर, राजशाही में होता भी तो यही है।
राजदीप ने पूछा कि कृष्णा के साथ इस तरह की रणनीति के लिए जिम्मेदार कौन है, इसके लिए जवाबदेही किसकी होगी। जयंती को चाहिए था कि वे अपने पुराने नेता और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव की शैली में मुस्करा कर शांत रह जातीं। क्योंकि देश की राजनीति का ककहरा जानने वाला आदमी भी जानता है कि कृष्णा को राज्यपाल पद से इस्तीफा दिलाना सोनिया-राहुल के अलावा किसी और के वश की बात नहीं थी। कृष्णा को कर्नाटक की जिम्मेदारी देने या न देने का फैसला करने की औकात कांग्रेस में सोनिया-राहुल के अलावा किसमें है? फिर अगर कृष्णा को अगर राज्यपाल से केवल इस एक चुनाव के लिए इस्तीफा दिलाया गया, तो साफ था कि उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया जाना चाहिए था। क्या जयंती बता सकती हैं कि यह अधिकार कांग्रेस में किसके पास है?
लेकिन जिस पार्टी की पूरी राजनीति एक परिवार के प्रति वफादारी के एलान पर टिकी हुई हो, उसके किसी नेता से चुप रहने की राजनीतिक ईमानदारी की अपेक्षा भी मुश्किल है। इसलिए जयंती ने कहा, हम जरूर इसकी समीक्षा करेंगे। मतलब सोनिया की असफलता के लिए एक बार फिर कुछ और गर्दन कटेंगे। खैर, राजशाही में होता भी तो यही है।
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