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गुरुवार, 13 मई 2010

जब ग़रीबी और पिछड़ापन स्टेटस सिंबल बन जाए...

कल्पना कीजिए, निठारी की दर्दनाक हत्याओं के एक आरोपी कोली की मौत की सज़ा पर सबसे सर्द और मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया क्या हो सकती है? मेरे ऑफिस के एक सहयोगी की प्रतिक्रिया से मुझे इस सवाल का जवाब मिला। उन्होंने कहा, 'ग़रीब था, इसलिए मौत की सज़ा मिल गई।' उनकी इस प्रतिक्रिया की पृष्ठभूमि में पंढेर को यही सज़ा न मिलना था।

पंढेर को सज़ा न मिलना, इस देश की उसी भ्रष्ट और नाकार न्याय प्रक्रिया का नतीजा तो हो सकता है, जिस पर हमने सैकड़ों फिल्में भी बनाई हैं और हजारों लेख भी लिखे हैं, लेकिन कोली की सज़ा को 'एक ग़रीब की सज़ा' कहने की मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया इस तथ्य को पूरी तरह नज़रअंदाज करती है कि जिन मासूम लड़कियों का क़त्ल किया गया (और कोली ने तो उन मृत नाबालिग शरीरों का मांस तक खाया), वे किसी करोड़पति की बेटियां नहीं थीं। वैसे यह घटिया तर्क भी मैं उस मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया के जवाब में ही दे रहा हूं, क्योंकि अगर वे करोड़पति की बेटियां होतीं, तो क्या कोली और पंढेर के वे कुकर्म उचित ठहराए जा सकते थे?

ख़ैर, कोली की सज़ा-ए-मौत पर आने वाली यह तो एक प्रतिक्रिया है, लेकिन दरअसल देखा जाए तो यह प्रतिक्रिया इस देश में पिछले दो दशकों से चल रही राजनीति के कारण तैयार हुए हमारे मानस की स्वाभाविक आवाज़ है। इस देश की राजनीति ने हमें हर उस बात से प्रेम करना सिखा दिया है, जिसे घोर सामाजिक-आर्थिक विकृति मानते हुए हमें घृणा करना चाहिए। लालू ने ख़ुद को चपरासी का बेटा बताया और पूरे बिहार के चपरासियों को उनमें अपना बेटा नज़र आने लगा। यह अलग बात है कि लालू अपने रोते हुए बेटे को चुप कराने के लिए सरकारी हेलीकॉप्टर में बनारस तक की सैर कराते रहे और राज्य भर के चपरासी अपने साहबों को पानी ही पिलाते रहे।

मुलायम ने अपने को ग़रीब का बेटा बताया। देश का रक्षा मंत्री बनने के बाद उन्होंने गर्व से घोषणा की कि उनके पूरे खानदान में कोई हवलदार तक नहीं बन सका और वह देश की रक्षा सेनाओं के मुखिया बन गए। यह अलग बात है कि उत्तर प्रदेश के तमाम ग़रीब अब भी हवलदारों के डंडे और गालियां खाने को मज़बूर हैं और मुलायम के विदेश शिक्षित बेटे अपने ग़रीब पिता की विरासत संभालने के लिए तैयार हैं। मायावती सत्ता में आईं तो उन्होंने ख़ुद को दलित की बेटी बताया। यह अलग बात है कि अपनी मूर्तियां लगाने में 250 करोड़ रुपए खर्च करने वाली इस दलित की बेटी के पास दंतेवाड़ा में मारे गए सीआरपीएफ के जवानों को देने के लिए पैसे नहीं थे।

करोड़ों लोगों का दीवानगी के हद तक समर्थन पाने वाले इन नेताओं ने भारतीय जनमानस के मनोविज्ञान में एक मौलिक बदलाव किया है। ग़रीब होना, पिछड़ा होना, अछूत होना, अनपढ़ होना अब किसी के मन में आक्रोश पैदा नहीं करता। ये दरअसल सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के अलग-अलग रास्ते बन गए हैं। अछूत समाज से आने वाला युवक अब अंबेडकर की तरह इस सामाजिक कुरीति को उखाड़ फेंकने के लिए लड़ाई नहीं करता। अब तो वह रिक्शे पर लाउडस्पीकर से यह घोषणा करने में ज्यादा फायदा देखता है कि वह अछूत है।

ग़रीब के घर पैदा होना किस तरह किसी की महानता का हिस्सा हो सकता है, मुझे समझ नहीं आता। ग़रीबी भी दो तरह की होती है- एक, अकर्मण्यता से पैदा होती है और दूसरी, वैराग्य से पैदा होती है। गांधी की ग़रीबी वैराग्य से पैदा हुई थी, लेकिन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास चरस के एक कश के लिए 2-2 रुपए के कबाड़ की चोरी करने वाले की ग़रीबी अकर्मण्यता से पैदा हुई है। लेकिन लालू और मायावती छाप राजनीति ने हमारी मानसिकता ऐसी बना दी है कि हम ग़रीब चरसी की ग़ुरबत को भी उसका गुण ही मानने लगे हैं।

मेरे एक बहुत ही समझदार और अध्ययनशील मित्र हैं। उनसे एक दिन किसी ने मज़ाक में पूछा कि सीआरपीएफ के दो जवानों ने दो माओवादियों को रक्तदान किया है। आपकी प्रतिक्रिया? उन्होंने कहा, 'एक ग़रीब ने दूसरे ग़रीब को खून दिया है।' आश्चर्य है कि जिस दिन खून लेने वाले ग़रीबों ने खून देने वाले ग़रीबों को दंतेवाड़ा में गोलियों से छलनी किया था, उस दिन उनकी प्रतिक्रिया थी कि मारने वाले कोई खाना बांटने तो जा नहीं रहे थे।

जानमाने पत्रकार पी साईंनाथ ने एक किताब लिखी है- 'हू लव्स ड्राउट'। यह किताब देश के प्रशासन और अधिकारी तंत्र पर केंद्रित है। यह बात समझ में भी आती है, क्योंकि हर बाढ़, हर सूखे, हर भूकंप और हर आपदा में कई विधायक, मंत्री, अफसरशाह और बाबू करोड़पति बन जाते हैं। तो स्वाभाविक है कि उन्हें इन आपदाओं से प्यार भी होगा, इनका इंतजार भी होगा। लेकिन जो बात समझ में नहीं आती है, वह ये है कि 'हाउ कैन ए पर्सन लव द ट्रैजेडी, व्हिच लव्स हिम ऐज इट्स फॉडर'। ये आश्चर्यजनक नहीं तो क्या है। ग़रीबी, जातिवाद, अशिक्षा जिन लोगों को अपना चारा बना रही है, वही इनसे प्यार करने लगे हैं।

यह भारतीय राजनीति का चमत्कार है। और यह उन समझदार लोगों की उस उदासीनता का भी जवाब है जिसमें वे कंधे उचका कर कहते हैं, 'कोउ नृप होए, हमें का हानी'। राजनीति की दिशा एक पूरे राष्ट्र को नपुंसक बना सकती है, यथास्थितिवादी बना सकती है या फिर पौरुष और तेज से भर सकती है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि राजनीति का संबंध राष्ट्र से हो। जब तक राजनीति का संबंध सत्ता से बना रहेगा, हम अपने समाज के मनोविज्ञान में ऐसा ही ज़हर घोलते रहेंगे। यह सुनने में कुछ-कुछ यूटोपिया सा लगता है, लेकिन कुछ बनाने के लिए पहले उसकी कल्पना तो करनी ही होती है।

बुधवार, 22 जुलाई 2009

3 रुपए किलो चावल और 'अमेरिकी उपनिवेशवाद' का बौद्धिक जुमला

इन दोनों में किसमें ज्यादा वोट खींचने की ताकत है? इस सवाल का जवाब जितना आसान है, उतना ही आसान कांग्रेस की अगुवाई वाली मौजूदा सरकार की हाल की 'विदेश नीति के मोर्चे पर की गईं भयानक गलतियां' के पीछे के कारणों का जवाब ढूंढना है।

पहले पाकिस्तान के साथ बातचीत के लिए आतंकवाद पर उसका समर्थन बंद होने की शर्त को माचिस दिखाना, 60 साल में पहली बार किसी द्विपक्षीय वार्ता में बलूचिस्तान का जिक्र ले आना, फिर जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर दशकों की भारतीय नीति पर मिट्टी डाल कर अमेरिका से गलबहियां करना और अब अमेरिकी प्रशासन को देश के अतिसंवेदनशील रक्षा प्रतिष्ठानों में चहलकदमी करने का लाइसेंस देना- ये सब ऐसे कदम हैं, जिनकी व्याख्या के लिए यही एक पंक्ति कही जा सकती है कि हमने अपनी वैदेशिक सम्प्रभुता अमेरिका के हाथों गिरवी रख दी है। लेकिन जैसे ही मेरे जेहन में भारी-भरकम बौद्धिक जुमलों से भरी यह पंक्ति आती है, मेरा मन डर से भर जाता है। यह अकेली पंक्ति यह साबित करने के लिए काफी है कि भारतीय राष्ट्र की संप्रभुता कितनी वलनरेबल (कमजोर) है।

ऐसा इसलिए कि मैं जब भी सोचता हूं कि क्यों नहीं पूरा देश इस सरकार के इन राष्ट्रविरोधी फैसलों के खिलाफ उठ खड़ा होता है, तो मेरे सामने दिल्ली की झुग्गियों में खुली नालियों के किनारे खेलते बच्चे, विदर्भ के किसानों का जीवन से हारा चेहरा, डिस्कोथेक में शराब के पैग के साथ झूमते अति संपन्न युवाओं का बेतकल्लुफ अंदाज, अपने करियर को बुलंदियों तक पहुंचाने के जुनून में 16-18 घंटे की पढ़ाई करने वाले होनहार छात्र, सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक अपने बॉस और अपनी नौकरी की दुनिया में गिरे-पड़े रहने वाला मध्य वर्ग और कुछ बोतल देसी शराब तथा मुर्गे की टांग के लिए किसी भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं का सर फोड़ देने को हमेशा तैयार गरीब बेरोजगारों का छुट्टा समूह आ खड़ा होता है।

फिर मैं कल्पना करता हूं कि मैं पूरे देश के सामने खड़ा होकर सरकार के ऐसे भयानक फैसले के खिलाफ कोई ओजपूर्ण उद्भोधन दे रहा हूं, और फिर अपनी कल्पनाओं में ही मैं देखता हूं कि धीरे-धीरे भीड़ का चेहरा उदासीनता और उपेक्षा से भरने लगा है। फिर कुछ खुसफुसाहट। तभी भीड़ में से कोई एक आवाज आती है- अरे, ये भाषण क्या दे रहे हो, कौन है ये अमेरिका और ये बलूचिस्तान किस मोहल्ले में है। आतंकवाद! कौन सा उसके बिना इस देश में लोग मरते नहीं है और फिर, कि ये पागल कार्बन उत्सर्जन जैसी अंग्रेजी बोलकर हमें बरगलाने की कोशिश कर रहा है। भीड़ कहती है- अरे ये तो विपक्ष का आदमी है, जो हमारे पेट पर लात मारने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका और बलूचिस्तान के चक्कर में पड़े रहेंगे तो हमें 3 रुपए किलो चावल कैसे मिलेगा?

सच भी तो है। भूखे पेट सोने वालों को आप एंड यूजर टेक्नोलॉजी निगरानी के मुद्दे पर आंदोलित कैसे करेंगे? रोज आयरन की अधिकता वाला गंदा पानी पीने वालों को जलवायु परिवर्तन की अंतरराष्ट्रीय राजनीति आप कैसे समझाएंगे? रोज डीटीसी बसों से कुचल कर और लोकल ट्रेनों से गिर कर मरने वालों को आप आतंकवाद की कूटनीति कैसे बताएंगे? तो क्या 3 रुपए किलो चावल के बदले हमें एक बार फिर हमारे राजनीतिक नेतृत्व की रीढ़हीनता का खामियाजा भुगतना पड़ेगा? भारत को 'आध्यात्मिक विश्वगुरू' और 'सामरिक एवं आर्थिक महाशक्ति' बनाने के हमारे सपने की आयु क्या इतनी ही थी?

कोई आशाजनक जवाब तो मुझे मिल नहीं रहा। घोर निराशा के अंधेरे में बस एक मद्धिम चिराग है, जो एक अपरिभाषित उम्मीद के तेल से टिमटिमा रहा है, देखें कब तक?