Sri Lanka लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Sri Lanka लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

फिर तैयार हो रही है एक असफल विदेश नीति की भूमिका

मेरे एक तमिल मित्र से जब मैंने यह पूछा कि श्रीलंका में चल रहे संघर्ष पर तमिलनाडु की आम जनता क्या सोचती है, तो मैंने यह सोचा था कि जवाब एक बड़े सैद्धांतिक आवरण के साथ डिप्लोमैटिक किस्म का होगा। लेकिन मेरे मित्र ने बहुत साफ कहा कि भले ही प्रभाकरन आतंकवादी हो या चाहे जो कुछ हो, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि वह तमिल हितों के लिए लड़ रहा है। इसके बाद उसने जिस रूप में अपनी बात का विस्तार किया, वह काफी गंभीर था और उससे एक ओर तो श्रीलंका को लेकर भारतीय विदेशी नीति की द्वंद्वात्मक स्थिति समझ में आ जाती है, वहीं दूसरी ओर एक राष्ट्र के रूप में भारतीयता के सूत्र की स्थापना पर भी कुछ असहज सवाल उठते हैं।

मेरे तमिल मित्र ने कहा कि आखिर इंदिरा गांधी के समय भारत ने भी तो प्रभाकरण की मदद की ही थी, फिर बाद में उसके बारे में भारतीय नीति क्यों बदली। इस सवाल का जवाब खुद ही देते हुए उसने कहा कि कश्मीर में आतंकवाद के बढ़ने से भारत ने मजबूरन तमिल हितों के लिए अपने समर्थन को तिलांजलि दे दी। कश्मीर तो वैसे भी अपने पास है नहीं, थोड़ा सा हिस्सा बचा है, उसके लिए तमिल हितों के प्रति भारत अपनी जिम्मेदारी से कैसे पीछे हट सकता है। इस दलील में जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा झकझोरा, वह था एक ऐसा स्वर, जो कहीं न कहीं कश्मीर को भारत से जोड़े रखने की अहमियत के लिए केवल इसलिए पूरी तरह उदासीन था, क्योंकि उसे लगता है कि यह उसके अपने जातीय भाइयों के हितों के आड़े आ रहा है।

तुलसीदास ने लिखा है, "बहुत कठिन जाति अपमाना।'' करुणानिधि जब प्रभाकरण को अपना दोस्त बताते हैं और वाइको जब प्रभाकरण के समर्थन के लिए जेल जाने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो जातीय अपमान के प्रति इसी असहनीयता का बोध होता है। तमिलनाडु की जनता के प्रभाकरण और लिट्टे से इसी भावनात्मक जुड़ाव ने श्रीलंका जैसे रणनीतिक तौर पर भारी महत्वपूर्ण देश के प्रति भारतीय विदेश नीति को अपंग बना दिया है। भारत के प्रति घोर शत्रुता का भाव रखने वाले दोनों पड़ोसी देश, पाकिस्तान और चीन इसका भरपूर फायदा उठा रहे हैं। पाकिस्तान से पिछले कुछ वर्षों में श्रीलंका के सामरिक संबंध काफी बढ़े हैं और पाकिस्तानी सेना लिट्टे से लड़ने के लिए श्रीलंका को हथियारों की सीधी आपूर्ति करने लगी है। इधर चीन ने भी सीधे तौर पर लिट्टे के खिलाफ कार्रवाई में राजपक्षे सरकार का पूरा समर्थन कर दिया है।

पाकिस्तान और चीन के इरादे किसी से छिपे नहीं हैं। नेपाल और बंगलादेश में अपना आधार बनाने के बाद आईएसआई को श्रीलंका में भी अपनी उपस्थिति मजबूत करनी है ताकि भारत को घेरा जा सके। दूसरी ओर चीन ने हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति मजबूत करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है और इस समुद्री सीमा के दूसरे महत्वपूर्ण देशों, जैसे मॉरीशस और सिशली से पहले ही पींगे बढ़ा रहा है। ऐसे में लिट्ट के खिलाफ चल रही कार्रवाई पर भारत की 'दो कदम आगे, एक कदम पीछे' नीति भले ही मानवीय आधार और तमिल जनता की भावनाओं के लिहाज से व्यावहारिक हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से यह खतरनाक साबित हो सकती है।

सवाल यह है कि भारत के पास विकल्प क्या हैं? भारत दो तरह की रणनीति पर विचार कर सकता है। पहला, राष्ट्रीय स्तर पर एक ताकतवर अभियान चला कर देश की जनता, खास तौर पर पर तमिलनाडु की जनता के दिलोदिमाग में यह बैठाना जरूरी है कि सभी श्रीलंकाई तमिल लिट्टे के सदस्य नहीं हैं और क्योंकि श्रीलंका में एक स्वतंत्र तमिल राष्ट्र की स्थापना व्यावहारिक नहीं है, इसलिए हिंसात्मक अभियान तमिल समाज को न केवल कमजोर करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रगति और विकास के रास्ते बंद करेगा। दूसरा, राजपक्षे सरकार पर दबाव डाल कर भारत अपनी मशीनरी के बूते श्रीलंका के भीतर बड़े पैमाने पर राहत कार्य चला सकता है और गृह युद्ध में तबाह हुए तमिलों के पुनर्वास की पूरी व्यवस्था अपने कंधों पर ले सकता है। अगर भारत ऐसा कर सका, तो हम तमिल जनभावना का सम्मान करते हुए लिट्टे के खिलाफ सरकारी लड़ाई में पूरी तरह मददगार बन सकते हैं।

श्रीलंका सरकार अभी अपने राष्ट्रीय जीवन की सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ रही है और इस समय उसका बिना शर्त समर्थन कर पाकिस्तान और चीन उसके लिए वही महत्व प्राप्त कर सकते हैं, जो कभी दुर्योधन का कर्ण के जीवन में हो गया था। कर्ण के जीवन में आए ऐसे ही संकट के समय उसका समर्थन कर दुर्योधन ने उसके जीवन में वह स्थान प्राप्त कर लिया, जहां कर्ण ने न्याय-अन्याय, उचित-अनुचित की सारी सीमाएं छोड़ कर दुर्योधन के समर्थन को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। इसलिए ऐसे मौके पर श्रीलंका को ऐसा संकेत देना, कि हम उसके राष्ट्रीय संकट में उससे मोलभाव कर रहे हैं, हमारी विदेश नीति के लिए घातक साबित हो सकता है।

शनिवार, 31 जनवरी 2009

श्रीलंका ने दिखाई है राह, चलना तो हमें ही होगा

आज से दो साल पहले यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि श्रीलंका को कभी तमिल चीतों से मुक्ति मिल सकती है। अंतरराष्ट्रीय मान्यता के तौर पर भले ही श्रीलंका एक देश था, लेकिन सार्वभौम सत्ता की परिभाषा के आधार पर श्रीलंकाई सीमा क्षेत्र में दो देश चल रहे थे। एक संयुक्त राष्ट्र से मान्यताप्राप्त श्रीलंका और दूसरा एलटीटीई के प्रशासन वाला श्रीलंका। दूसरे श्रीलंका में पूरी तरह एलटीटीई का शासन था। कर व्यवस्था, कानून व्यवस्था, सड़कों और अस्पतालों आदि के निर्माण की लोककल्याणकारी योजनाएं, सब की जिम्मेदारी पूरी तरह लिट्टे के चीतों की थी। ऐसे में श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे और वहां की सेना ने पिछले दो वर्षों में जिस तरह की इच्छाशक्ति और ताकत दिखाते हुए एलटीटीई का सफाया किया है, वह लाजवाब है।

यह इसलिए भी लाजवाब है कि भारत भी अपने दसियों जिलों में कमोबेस ऐसी ही स्थिति झेल रहा है। पूर्वोत्तर के कई इलाके भारतीय सैनिकों के लिए वर्जित हैं। वे कहने के लिए भारतीय इलाके हैं, लेकिन भारत सरकार का कोई अधिकारी या कोई नागरिक भी बिना आतंकवादियों या उग्रवादियों की मर्जी के उन इलाकों में नहीं जा सकता। यहां तक कि देश के हृदयस्थल में बसे छत्तीसगढ़ के करीब 40 फीसदी जिलों में माओवादियों की समानान्तर सरकार चलती हैं। इन सभी इलाकों में लोग इन आतंकवादियों को टैक्स देते हैं, इनकी अपनी न्याय व्यवस्था है, अपना साम्राज्य है। लेकिन भारत सरकार ने इन उग्रवादियों और इनकी प्रभुसत्ता के आगे घुटने टेक रखे हैं। चाहे पूरे भारत में 60-70 श्रीलंका समा जाएं, चाहे भारतीय सेना श्रीलंकाई सैनिकों की तुलना में दस गुने से भी ज्यादा हों, लेकिन भारतीय प्रशासकों में श्रीलंकाई राजनीतिक इच्छाशक्ति का लेशमात्र भी नहीं है। जिस माओवाद की समस्या को स्वयं देश का प्रधानमंत्री सबसे बड़ी समस्या बता चुका हो, उससे निपटने की कोई समग्र रणनीति तक नहीं होना, इसी अभाव का प्रमाण है।

श्रीलंका की सरकार ने भारत को एक रास्ता दिखाया है। कोई भी समस्या कभी इतनी बड़ी नहीं होती कि राष्ट्र शक्ति को चुनौती दे सके बशर्ते इस शक्ति की कमान संभालने वाली भुजाओं में ताकत हो और हृदय में आग हो। दिक्कत यह है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था का ढांचा ही कुछ इस तरह है कि इसमें आगे बढ़ने के लिए हर कदम पर, हर दिन समझौते करने होते हैं। और शीर्ष तक पहुंचते-पहुंचते हम इतने समझौते कर चुके होते हैं, कि न तो हमारी भुजाओं में ताकत बचती है और न ही हृदय में आग।