मंगलवार, 22 जून 2010

हर दिन लग रहा है कांग्रेस का आपातकाल

आडवाणी का कहना है कि एंडरसन को भारत से भगाना आपातकाल जैसी घटना थी। उन्होंने इस सूची में एक तीसरी घटना को भी शामिल किया है- इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुआ सिक्खों का सामूहिक नरसंहार। सूची पूरी हो गई। लेकिन क्या सचमुच पूरी हो गई? आपातकाल में बुराई क्या थी? मेरी जैसी जिस पीढ़ी ने उन ढाई सालों को महसूस नहीं किया है, झेला नहीं है, उसके लिए यह समझना बहुत मुश्किल है। इसलिए कि हम कहीं आपातकाल का इतिहास नहीं पढ़ते। आज़ादी के दौरान हुए अत्याचारों को तो हम फिर भी जानते हैं, लेकिन आपातकाल के दौरान क्या हुआ, हमें नहीं पता। अगर ग़ैर कांग्रेसी नेताओं के भाषणों और कुलदीप नैयर जैसे कुछ पत्रकारों को छोड़ दें, तो कभी कोई आपातकाल की विभीषिका के बारे में नहीं बताता। लगता है जैसे, देश को आपातकाल से कोई परेशानी नहीं थी, कोई नुकसान नहीं था। क्या यही सच है? उलटे हमारी पीढ़ी के लोगों को तो बहुत बार यही बताया जाता है कि उस समय ट्रेनें बिलकुल समय पर चलती थीं और भ्रष्टाचार लगभग ख़त्म हो चुका था। तो क्या सचमुच आपातकाल देश का एक ऐसा स्वर्णकाल था, जिसमें नेताओं और पत्रकारों को छोड़ कर किसी को कोई तकलीफ नहीं थी।

मुझे लगता है इसका जवाब 'हां' में होना चाहिए। भारत में आम जनता बिलकुल ही आम है। उसका सिद्धांत वाक्य है- कोउ नृप होए हमें का हानि। डॉक्टर को अपनी क्लिनिक चलने से मतलब है, इंजीनियर को अच्छी सैलेरी वाली नौकरी से मतलब है, दुकानदार को अपनी दुकान चलने से मतलब है और अब तो पत्रकार को भी खूब चमक-दमक वाले और ऊंचे वेतन के करियर से ही मतलब रह गया है। यही कारण है कि समाज का आम इंसान आपातकाल को किसी डरावने सपने की तरह याद नहीं करता। लेकिन मेरी व्यक्तिगत समझदारी यह है कि आपातकाल ने आम लोगों को जितना नुकसान पहुंचाया, उतना किसी को नहीं। आपातकाल ने इस पूरे देश की नसों में एचआईवी के ऐसे कीटाणु छोड़े, जो सालों निष्क्रिय रहने के बाद अपना असर दिखा रहे हैं। आपातकाल भले ही ढाई साल में खत्म हो गया हो, लेकिन आपातकाल के संस्कार देश अब तक झेल रहा है। यह संस्कार दरअसल कांग्रेस के खून में है और क्योंकि कांग्रेस इस देश की सबसे स्वाभाविक शासक है और इसलिए आपातकालीन एचआईवी भी पूरे देश के खून में समा चुका है।

आपातकाल क्यों बुरा था? दरअसल देश में राजनेताओं का अहंकार और उनकी महत्वाकांक्षा आजादी के तुरंत बाद से ही अपना रंग दिखाने लगी थी। इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू का राजनीतिक कद इतना बड़ा था कि तमाम संस्थाएं उनके सामने बौनी नज़र आती थीं। इस कारण सत्ता के कर्णधारों और शासन की संस्थाओं के बीच कभी टकराव नहीं हुआ। नेहरू के बाद शास्त्री जी आए, जो नेता के लिबास में संत के समान थे। और इसलिए उनके छोटे से शासनकाल में भी देश की संस्थाओं की निष्ठा और पवित्रता बहुत हद तक अक्षुण्ण रही। लेकिन इंदिरा गांधी के समय से चीजें बदलने लगीं। इंदिरा गांधी को सिंडिकेट ने गूंगी गुड़िया क़रार दिया था और कोई यह मानने को तैयार नहीं था कि उनकी सत्ता को चुनौती नहीं दी जा सकती। क्योंकि देश की संस्थाएं देश के संविधान के प्रति जवाबदेह होती हैं, इसलिए अगर सत्ता और संस्था में से कोई भी एक भ्रष्ट हो जाए, तो दोनों में टकराव निश्चित है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का निर्वाचन अवैध ठहराया और आपातकाल लागू हो गया। इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस को यह समझ में आ गया देश पर लंबे समय तक निर्बाध शासन करने के लिए यहां की संस्थाओं को भ्रष्ट करना आवश्यक है। आपातकाल से यह काम शुरू हो गया। कांग्रेस ने देश की संवैधानिक जड़ों में मट्ठा डालना शुरू किया। संविधान की शपथ लेने वाले आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की सेवानिवृत्ति के बाद राजदूत, राज्यपाल और ऐसे पदों पर नियुक्ति शुरू हो गई ताकि सारे वरिष्ठतम अधिकारी यह समझ लें कि सरकार का साथ देने में क्या फायदे हैं। उच्च और उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को मानवाधिकार आयोग जैसे शक्तिशाली और सुविधायुक्त पदों पर बैठाया जाने लगा, जिससे उनके सामने हमेशा सरकार से पंगा न लेने का लोभ बना रहे। तमाम समितियों, आयोगों और ऐसे दूसरे वैधानिक पदों पर नियुक्तियों के लिए कोई तय मानदंड न बनाकर भ्रष्टाचार के रास्ते साफ रखे गए। इन सारी प्रक्रियाओं का सारांश इंदिरा के समय देश का प्रथम नागरिक, संविधान का केयरटेकर और तीनों सेनाओं का प्रमुख यानी राष्ट्रपति बनने वाले एक व्यक्ति का वह बयान है, जिसमें उसने कहा था कि वह इंदिरा गांधी के घर झाड़ू तक लगाने के लिए तैयार है। इंदिरा जी गईं, आपातकाल गया, लेकिन कांग्रेस ने संस्थाओं को भ्रष्ट करने का संस्कार आत्मसात कर लिया। चुनाव आयोग में नवीन चावल की नियुक्ति और प्रोन्नति इसका सबसे प्रकट उदाहरण है।

और इसी कड़ी में सबसे ताजा उदाहरण है यूलिप पर सेबी और इरडा में हुई लड़ाई पर सरकार का फैसला। सेबी और इरडा के बीच यूलिप (शेयर बाजार में निवेश के साथ बीमा सुविधा देने वाला उत्पाद) पर अधिकार को लेकर झगड़ा चल रहा था। सेबी के प्रमुख सी बी भावे और इरडा के जे हरिनारायण को सरकार की ओर से निर्देश मिले कि वे हाईकोर्ट में एक संयुक्त याचिका दाखिल करें। लेकिन भावे ने अपनी पहल पर मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने का फैसला किया। फिर क्या था, सरकार को गुस्सा आ गया। सरकार की ओर से हरिनारायण को संपर्क किया गया और कहा गया कि एक मसौदा तैयार करें ताकि यूलिप पर इरडा का नियंत्रण हो सके। यानी एक अभिभावक ने दो बच्चों की लड़ाई में फैसला लिखने का अधिकार इसलिए एक के हाथ में दे दिया, क्योंकि दूसरे ने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया। क्या सरकारें ऐसे काम करती हैं? यूलिप में आम लोगों के लाखों करोड़ रुपए लगे हैं, इस भरोसे पर कि सरकार उनके हितों की निगहबान है। लेकिन सरकार केवल अपने अहंकार को तुष्ट करने के लिए किसी एक रेगुलेटर को इसकी कमान थमाने का फैसला कर रही है। अब सोचिए प्रणव मुखर्जी के एहसानों से दबे जे हरिनारायण इरडा प्रमुख के हैसियत से निवेशकों के हितों की सुरक्षा करेंगे या सरकार और कांग्रेस पार्टी के हितों की।

यही कांग्रेस की कार्यसंस्कृति है, जो उसे इंदिरा गांधी और आपातकाल से विरासत में मिली है। संस्थाओं को भ्रष्ट करने की कार्यसंस्कृति। संवैधानिक पदों को भ्रष्ट करने की कार्यसंस्कृति। यह केवल एंडरसन को भगाने में नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस सरकारों के हर दिन के कामकाज का अभिन्न हिस्सा है।

रविवार, 20 जून 2010

क्या यह सचमुच गुजरात को बिहार का स्वाभिमानी जवाब है?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आखिरकार गुजरात को 5 करोड़ रुपए लौटा ही दिए। बहुत ही अजीब सी घटना है। जैसे, स्कूल के एक बच्चे ने किसी दिन चार दोस्तों के बीच मजाक में इस बात का जिक्र कर दिया हो कि उसने अपने फलां दोस्त को अपनी टिफिन में से एक परांठा खिलाया था और परांठा खाने वाले बच्चे को बात इतनी बुरी लगी हो कि अगले दिन वह मां से जबरन परांठा बनवा कर लाया हो और पूरे स्कूल के सामने अपने दोस्त के सामने परांठा फेंक कर हेठी से कहा हो, 'ले! उस दिन खाई थी, आज वापस कर दी।'

नीतीश कुमार ने कुछ ऐसी ही बचकानी हरकत की है कोसी आपदा फंड से पैसे लौटा कर। मैंने जब से खबर सुनी, सोच ही रहा था कि इसका विश्लेषण कैसे करना चाहिए? पहले मुझे लगा, यह उभरते हुए बिहार का आत्मसम्मान है। कुछ ऐसा ही आत्मसम्मान लाल बहादुर शास्त्री ने भी तो अमेरिका को दिखाया था, जब उन्होंने वहां जानवरों को खिलाए जाने वाले पीएल-80 किस्म की गेहूं का आयात बंद कर हरित क्रांति का नारा दिया था। लेकिन क्या वास्तव में गुजरात सरकार का विज्ञापन बिहार का अपमान करने की मंशा से दिया गया था? नीतीश के पैसा लौटाने की घोषणा के अगले दिन पटना के गांधी मैदान में भाषण देते हुए नरेंद्र मोदी ने जो कहा, कम से कम उससे तो ऐसा लगता नहीं। मोदी ने बिहार को लातूर भूकंप के समय मदद देने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने यहां तक कहा कि वह गुजरात में रहने वाले लाखों बिहारियों के प्रतिनिधि के तौर पर उनका कुशल क्षेम देने उनके घर आए हैं और उन्होंने गुजरात के विकास में बिहारियों के योगदान के लिए भी बिहार को धन्यवाद दिया। फिर यह मानने का कोई कारण नहीं है कि नीतीश की प्रतिक्रिया उभरते बिहार के आत्मसम्मान पर लगे चोट का जवाब है। तो यह क्या है?

सरकारी विज्ञापन देने की प्रक्रिया हम सब को पता है। वह मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या रेल मंत्री तय नहीं करते। अभी हाल में क्या हमने भारत सरकार के एक विज्ञापन में पाकिस्तानी सेनाधिकारी की तस्वीर नहीं देखी थी? क्या हाल ही में रेल मंत्रालय के एक विज्ञापन में दिल्ली को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं दिखाया गया था? मीडिया में कुछ हो-हंगामे के अलावा विपक्ष तक ने उन विज्ञापनों को तूल नहीं देकर समझदारी का ही परिचय दिया। लेकिन नीतीश में यह समझदारी नहीं है। क्या सच में नीतीश में समझदारी नहीं है? पिछले चार साल का जद (यू)- भाजपा गठबंधन का शासनकाल दरअसल नीतीश का वन मैन शो ही है। नतीश की कार्यप्रणाली कुछ-कुछ कांग्रेस के गांधी परिवार सी है। शासन की सारी शक्ति नीतीश से निकलती है और वहीं समाप्त होती है। इन चार सालों ने नीतीश को नेता से प्रशासक बना दिया है। अंग्रेजी में बात ज्यादा साफ होगी- नीतीश अब लीड नहीं करते, एडमिनिस्टर करते हैं। उनका अहंकार संगठन और शासन दोनों से बड़ा हो गया है और इसलिए उन्हें ऐसी कोई बात बर्दाश्त नहीं, जो उनके अहंकार को चुनौती देती हो।

बिहार में पिछले चार साल के शासनकाल में मुस्लिम तुष्टीकरण का जो नंगा खेल खेला जा रहा है, वह अद्भुत है। क्योंकि भाजपा सरकार का हिस्सा है, इसलिए मुस्लिमपरस्ती के ऐसे दसियों मसले हैं, जो न मीडिया में आ रहे हैं और न ही लोगों की जानकारी में। लेकिन नीतीश कुमार का लक्ष्य बहुत साफ है। उन्हें न तो बिहार के आत्मसम्मान की चिंता है, न बिहारियों की अपेक्षाओं की। उन्हें मुसलमानों का वोट चाहिए। किसी भी कीमत पर। क्योंकि तभी वह भाजपा को दुलत्ती मार कर अपने बूते सरकार में आ सकते हैं।

यह स्थिति बहुत करीब भी है। क्योंकि मुसलमान, महादलित (नीतीश की नई परिभाषा में) और कुर्मी एवं कोइरी उनके साथ हैं। यादव, ओबीसी की कई जातियां और मुसलमानों का एक वर्ग लालू के साथ है। अगड़ी जातियां कुछ तो जद (यू) के बागी नेताओं के साथ टूटेंगी और बाकी कांग्रेस के हलका सा भी मजबूत होते ही, उसकी झोली में जा गिरेंगी। भारतीय जनता पार्टी अपनी भ्रमित राजनीति और सुशील मोदी जैसे स्वार्थी तथा पदलोलुप नेताओं के कारण मटियामेट होने ही जा रही है। ऐसे में नीतीश के सामने वह विज्ञापन एक धारदार हथियार के तौर पर हाथ आया, जिसे भुनाने के लिए उन्होंने तुरंत वार कर दिया।

कुल मिलाकर इस घटना से तीन बातें बहुत साफ तौर पर सामने आई हैं। एक, नीतीश की प्रतिक्रिया केवल एक शातिर और अहंकारी राजनेता की राजनीतिक चाल है। दूसरी, नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व का मजबूत उम्मीदवार बना कर पेश किया है। और तीसरी बात यह, कि भारतीय राजनीति में मुसलमानों को खुश करने के लिए कोई दल या नेता किसी भी स्तर तक जा सकता है।

शुक्रवार, 18 जून 2010

अभी और होंगे बहुत से भोपाल

मैक्सिको की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम की तरफ से हुई तबाही और उस पर सख़्त अमेरिकी रुख़ के बाद कंपनी द्वारा चुस्ती से कार्रवाई करते हुए 20 अरब डॉलर का मुआवज़ा दिए जाने की घटना से भारतीयों के मन में क्षोभ है, गुस्सा है। अमेरिकी भेदभाव का गुस्सा। यूनियन कार्बाइड और डाओ केमिकल की उदासीनता का गुस्सा। यह गुस्सा इस बात का प्रमाण है कि अभी और भी बहुत से यूनियन कार्बाइड होने बाकी हैं। यह गुस्सा इस बात का प्रमाण है कि भारत अब भी ग़ुलाम मानसिकता के साथ जी रहा है। आंखों में महाशक्ति बनने के सपने के बावजूद हृदय की गहराइयों में हम ग़ुलाम हैं।

कोई हमारे देश में आकर हमारी ही धरती पर क़त्ल-ए-आम करके चला जाता है और उसे न केवल क़त्ल करने के बाद निकलने में, बल्कि क़त्ल करने में भी वे लोग सहयोग देते हैं, जिनके लिए हम जय-जयकार के नारे लगाते हैं। फिर भी, हमारा गुस्सा ओबामा और बीपी पर निकलता है। चुरहट लॉटरी में करोड़ों की रकम डकारने वाले (जिसमें यूनियन कार्बाइड ने भी कुछ करोड़ रुपए का 'अनुदान' दिया था) अर्जुन सिंह तिल-तिल मरने वाले उस समाज में आज भी सुरक्षित घूम रहे हैं। उनके घर में अब भी आग नहीं लगाई गई है।

एंडरसन को देश से निकालने में सूत्रधार की भूमिका निभाने वाले राजीव गांधी की बेवा आज भी चुपचाप मूर्ख, जाहिल और तलवे चाटने वाले कांग्रेसियों की भगवान बनी हुई है, 6 साल के अपने केंद्रीय शासनकाल और 10 वर्षों से ज्यादा से अपने राज्य शासन के दौरान चुपचाप भोपाल को मरते देखने वाली और वोट मांग कर सत्ता का जश्न मनाने वाली भारतीय जनता पार्टी के निर्लज्ज नेता अब भी अपने एयरकंडीशन मीडिया रूम में बैठकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं। उनके घर और कार्यालय अब भी मटियामेट नहीं हुए। तो ओबामा और बीपी की न्यायप्रियता पर सवाल उठाना क्या केवल हमारी नपुंसक ग़ुलाम मानसिकता का परिचायक नहीं है।

तुलसीदास 500 साल पहले ही कह गए थे- समरथ को नहीं दोष गोसाईं। जनसंहार के हथियारों की काल्पनिक कहानी बनाकर इराक को नेस्तोनाबूद कर देने की कहानी दरअसल अमेरिका के सामर्थ्य की ही कहानी है। दूसरी तरफ महाशक्ति बनने की गाल बजाने वाला भारतीय नेतृत्व है, जो पाकिस्तान की ज़मीन में तमाम आतंकवादियों की जड़े होने के पुख्ता प्रमाण के बावजूद वर्षों से अमेरिका से अनुरोध ही करता जा रहा है कि वह पाकिस्तान को रोके। भीख में केवल रोटी के टुकड़े मिलते हैं, आत्मसम्मान और जीने का अधिकार नहीं। यह बात पता नहीं भारत की जनता कब समझेगी। अपनी बहन और बेटी की इज़्जत बचाने के लिए अगर हम गांव के ज़मींदार का दरवाजा खटखटाएंगे, तो बदले में वह उसी बहन और बेटी का एक रात का नजराना तो मांगेगा ही। अपने बुजुर्ग पिता के सम्मान के लिए अगर हम अपने पड़ोसी के आगे गिड़गिड़ाएंगे, तो अपनी महफिल में पानी पिलाने के लिए हमारे पिताजी की सेवाएं तो वह मांगेगा ही।

माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले मेरे एक मित्र हैं, जिन्होंने एक दिन कहा कि भोपाल गैस पीड़ितों ने सैकड़ों की संख्या में वर्षों तक जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन किया और बदले में उन्हें क्या मिला? धोखा, अन्याय और मौत। यही लोग अगर हाथ में हथियार लेकर सड़कों पर उतर जाएंगे, तो उन्हें माओवादी कहकर उनके खिलाफ सेना उतार दी जाएगी। नैतिकता, अध्यात्म और राष्ट्रवाद के तर्क की कसौटी पर इसके खिलाफ बहुत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन भावुकता के मोर्चे पर क्या वास्तव में यह लाजवाब नहीं है? जिसके घर दिन-रात मौत का तांडव हो रहा हो, जिसके देखते-देखते जिसकी पीढ़ियां अपंगता और लाचारी के अंधकूप में समा गई हों, वह नैतिकता, अध्यात्म और राष्ट्रवाद के तर्क समझेगा या नक्सलवाद के करारे जवाब का तर्क। यहां मजेदार बात यह है कि अर्जुन सिंह का बचाव करने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह नक्सवादियों के ज़बर्दस्त पैरोकार भी रहे हैं।

भोपाल पर चल रहे हंगामें में रोज नए खुलासे हो रहे हैं। लेकिन इन खुलासों से जितने जवाब मिल रहे हैं, उनसे कहीं ज्यादा सवाल खड़े हो रहे हैं। इन तमाम सवालों के बीच एक जवाब तो मुझे साफ समझ आ रहा है कि पिछले हजार सालों में हम भारतीयों की ग़ुलाम मानसिकता और परमुखापेक्षी स्वभाव में कुछ भी बदलाव नहीं आया है। जब तक हम अपने घर की सुरक्षा के लिए अमेरिका, चीन और पाकिस्तान से भीख मांगते रहेंगे, तब तक कई यूनियन कार्बाइड कई भोपाल बनाते रहेंगे और हमारी कई पीढ़ियां मानसिक और शारीरिक तौर पर विकलांग पैदा होती रहेंगी।

गुरुवार, 20 मई 2010

शहरों में पलते ज़हरीले नक्सलियों से निपटना भी ज़रूरी

नक्सलबाड़ी से पैदा हुआ आंदोलन बहुत पहले जनता से कट कर आतंकवाद की श्रेणी में पहुंच चुका है, लेकिन मेट्रो शहरों में रहने वाले अधिसंख्य वामपंथी इसे अब भी नक्सली आंदोलन कहने में ही फ़ख़्र महसूस करते हैं। मज़ेदार बात यह है कि ग़रीबों, मज़दूरों और किसानों की लड़ाई लड़ने वाले इन वामपंथियों में से शायद ही किसी का जन्म खेतों में, कारखानों में या झुग्गियों में जारी शोषण और अन्याय के बीच हुआ हो।

इन वामपंथियों का जन्म हुआ है जेएनयू में, बीएचयू में और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में। मार्क्स, लेनिन, हीगल, स्तालिन, माओ, चे गुएरा और फिदेल कास्त्रो की किताबों ने इनका उपनयन संस्कार किया है और सिगरेट के धुएं और दुनिया में मौजूद हर व्यवस्था को ग़ालियां देने की अराजक मानसिकता के बीच इनकी दीक्षा हुई है। शोषण और अन्याय इनके लिए केवल बौद्धिक जुगाली का ज़रिया हैं।

यही कारण है कि ये ख़ुद तो यूपीएससी की परीक्षाओं में बैठकर बुर्ज़ुआ व्यवस्था के शीर्ष पर पहुंचने के सपने पालते हैं, दिन-रात अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने और नया फ्लैट खरीदने के लिए ईएमआई का इंतज़ाम करने के जुगाड़ में लगे रहते हैं, महंगी गाड़ियों के नए-नए मॉडलों को ललचाई नज़रों से सिर घुमा-घुमा कर देखते हैं और नक्सलियों की हत्याओं को पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण से मुक्त करने के लिए छेड़ा गया ज़ेहाद क़रार देते हैं।

यह उसी तरह का ज़ेहाद है, जिसका रूप इस्लामी आतंकवाद के रूप में पूरी दुनिया में दिख रहा है। तालिबान की तरह ही नक्सलियों की दुनिया में मतभेद या असहमति की कोई जगह नहीं है। हज़ारों करोड़ का बजट रखने वाले सर्वहारा नक्सलियों के इलाकों में विकास की व्यथा-कथा और उसमें नक्सलियों की भूमिका पर काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है।

आश्चर्य तो यह है कि हर बात में विदेशी लेखकों और विदेशी नेताओं के सिद्धांतों का उद्धरण देने वाले पढ़ाकू वामपंथियों को दिन के उजाले की तरह साफ ये तथ्य नहीं दिखते। आश्चर्य यह है कि 75 जवानों की हत्या को दो पक्षों की लड़ाई का स्वाभाविक परिणाम मानने वाले इन बुद्धिजीवियों की जान इस बात से सूखने लगती है कि कहीं सरकार सेना या वायु सेना का इस्तेमाल न शुरू कर दे। यानी नक्सली मारें तो युद्ध और जब मरें तो सामंती शासन का शोषण।

ये वामपंथी बुद्धिजीवी भी नक्सली हत्यारों से कम नहीं हैं क्योंकि ये उन कुकृत्यों को बौद्धिक आधार देते हैं। ये नक्सल आतंकवाद के प्रवक्ता हैं, तो ये हत्यारे क्यों नहीं? दरअसल सरकार को जंगल के नक्सली हत्यारों और शहरों में एयरकंडीशन में बैठने वाले बुद्धिजीवी हत्यारों, दोनों से एक ही तरह निपटने की जरूरत है। अखबारों, विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में बैठे ये वामपंथी बुद्धिजीवी देश के लिए ज़्यादा बड़ा खतरा हैं, क्योंकि ये दरअसल वह विचार हैं जो हत्यारे पैदा करते हैं।

नक्सलियों के सफाए के बाद भी अगर ये बचे रहे, तो वामपंथी आतंकवाद किसी-न-किसी और रूप में समाज को निगलने के लिए सामने आएगा। पूरी दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि सर्वहारा की मदद से सत्ता में पहुंचने के बाद वामपंथ ने सबसे पहले उसी सर्वहारा की व्यक्तिगत स्वतंत्रता खत्म की है और फिर उसकी हर मांग का जवाब गोलियों और फांसियों से दिया है।

गुरुवार, 13 मई 2010

जब ग़रीबी और पिछड़ापन स्टेटस सिंबल बन जाए...

कल्पना कीजिए, निठारी की दर्दनाक हत्याओं के एक आरोपी कोली की मौत की सज़ा पर सबसे सर्द और मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया क्या हो सकती है? मेरे ऑफिस के एक सहयोगी की प्रतिक्रिया से मुझे इस सवाल का जवाब मिला। उन्होंने कहा, 'ग़रीब था, इसलिए मौत की सज़ा मिल गई।' उनकी इस प्रतिक्रिया की पृष्ठभूमि में पंढेर को यही सज़ा न मिलना था।

पंढेर को सज़ा न मिलना, इस देश की उसी भ्रष्ट और नाकार न्याय प्रक्रिया का नतीजा तो हो सकता है, जिस पर हमने सैकड़ों फिल्में भी बनाई हैं और हजारों लेख भी लिखे हैं, लेकिन कोली की सज़ा को 'एक ग़रीब की सज़ा' कहने की मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया इस तथ्य को पूरी तरह नज़रअंदाज करती है कि जिन मासूम लड़कियों का क़त्ल किया गया (और कोली ने तो उन मृत नाबालिग शरीरों का मांस तक खाया), वे किसी करोड़पति की बेटियां नहीं थीं। वैसे यह घटिया तर्क भी मैं उस मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया के जवाब में ही दे रहा हूं, क्योंकि अगर वे करोड़पति की बेटियां होतीं, तो क्या कोली और पंढेर के वे कुकर्म उचित ठहराए जा सकते थे?

ख़ैर, कोली की सज़ा-ए-मौत पर आने वाली यह तो एक प्रतिक्रिया है, लेकिन दरअसल देखा जाए तो यह प्रतिक्रिया इस देश में पिछले दो दशकों से चल रही राजनीति के कारण तैयार हुए हमारे मानस की स्वाभाविक आवाज़ है। इस देश की राजनीति ने हमें हर उस बात से प्रेम करना सिखा दिया है, जिसे घोर सामाजिक-आर्थिक विकृति मानते हुए हमें घृणा करना चाहिए। लालू ने ख़ुद को चपरासी का बेटा बताया और पूरे बिहार के चपरासियों को उनमें अपना बेटा नज़र आने लगा। यह अलग बात है कि लालू अपने रोते हुए बेटे को चुप कराने के लिए सरकारी हेलीकॉप्टर में बनारस तक की सैर कराते रहे और राज्य भर के चपरासी अपने साहबों को पानी ही पिलाते रहे।

मुलायम ने अपने को ग़रीब का बेटा बताया। देश का रक्षा मंत्री बनने के बाद उन्होंने गर्व से घोषणा की कि उनके पूरे खानदान में कोई हवलदार तक नहीं बन सका और वह देश की रक्षा सेनाओं के मुखिया बन गए। यह अलग बात है कि उत्तर प्रदेश के तमाम ग़रीब अब भी हवलदारों के डंडे और गालियां खाने को मज़बूर हैं और मुलायम के विदेश शिक्षित बेटे अपने ग़रीब पिता की विरासत संभालने के लिए तैयार हैं। मायावती सत्ता में आईं तो उन्होंने ख़ुद को दलित की बेटी बताया। यह अलग बात है कि अपनी मूर्तियां लगाने में 250 करोड़ रुपए खर्च करने वाली इस दलित की बेटी के पास दंतेवाड़ा में मारे गए सीआरपीएफ के जवानों को देने के लिए पैसे नहीं थे।

करोड़ों लोगों का दीवानगी के हद तक समर्थन पाने वाले इन नेताओं ने भारतीय जनमानस के मनोविज्ञान में एक मौलिक बदलाव किया है। ग़रीब होना, पिछड़ा होना, अछूत होना, अनपढ़ होना अब किसी के मन में आक्रोश पैदा नहीं करता। ये दरअसल सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के अलग-अलग रास्ते बन गए हैं। अछूत समाज से आने वाला युवक अब अंबेडकर की तरह इस सामाजिक कुरीति को उखाड़ फेंकने के लिए लड़ाई नहीं करता। अब तो वह रिक्शे पर लाउडस्पीकर से यह घोषणा करने में ज्यादा फायदा देखता है कि वह अछूत है।

ग़रीब के घर पैदा होना किस तरह किसी की महानता का हिस्सा हो सकता है, मुझे समझ नहीं आता। ग़रीबी भी दो तरह की होती है- एक, अकर्मण्यता से पैदा होती है और दूसरी, वैराग्य से पैदा होती है। गांधी की ग़रीबी वैराग्य से पैदा हुई थी, लेकिन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास चरस के एक कश के लिए 2-2 रुपए के कबाड़ की चोरी करने वाले की ग़रीबी अकर्मण्यता से पैदा हुई है। लेकिन लालू और मायावती छाप राजनीति ने हमारी मानसिकता ऐसी बना दी है कि हम ग़रीब चरसी की ग़ुरबत को भी उसका गुण ही मानने लगे हैं।

मेरे एक बहुत ही समझदार और अध्ययनशील मित्र हैं। उनसे एक दिन किसी ने मज़ाक में पूछा कि सीआरपीएफ के दो जवानों ने दो माओवादियों को रक्तदान किया है। आपकी प्रतिक्रिया? उन्होंने कहा, 'एक ग़रीब ने दूसरे ग़रीब को खून दिया है।' आश्चर्य है कि जिस दिन खून लेने वाले ग़रीबों ने खून देने वाले ग़रीबों को दंतेवाड़ा में गोलियों से छलनी किया था, उस दिन उनकी प्रतिक्रिया थी कि मारने वाले कोई खाना बांटने तो जा नहीं रहे थे।

जानमाने पत्रकार पी साईंनाथ ने एक किताब लिखी है- 'हू लव्स ड्राउट'। यह किताब देश के प्रशासन और अधिकारी तंत्र पर केंद्रित है। यह बात समझ में भी आती है, क्योंकि हर बाढ़, हर सूखे, हर भूकंप और हर आपदा में कई विधायक, मंत्री, अफसरशाह और बाबू करोड़पति बन जाते हैं। तो स्वाभाविक है कि उन्हें इन आपदाओं से प्यार भी होगा, इनका इंतजार भी होगा। लेकिन जो बात समझ में नहीं आती है, वह ये है कि 'हाउ कैन ए पर्सन लव द ट्रैजेडी, व्हिच लव्स हिम ऐज इट्स फॉडर'। ये आश्चर्यजनक नहीं तो क्या है। ग़रीबी, जातिवाद, अशिक्षा जिन लोगों को अपना चारा बना रही है, वही इनसे प्यार करने लगे हैं।

यह भारतीय राजनीति का चमत्कार है। और यह उन समझदार लोगों की उस उदासीनता का भी जवाब है जिसमें वे कंधे उचका कर कहते हैं, 'कोउ नृप होए, हमें का हानी'। राजनीति की दिशा एक पूरे राष्ट्र को नपुंसक बना सकती है, यथास्थितिवादी बना सकती है या फिर पौरुष और तेज से भर सकती है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि राजनीति का संबंध राष्ट्र से हो। जब तक राजनीति का संबंध सत्ता से बना रहेगा, हम अपने समाज के मनोविज्ञान में ऐसा ही ज़हर घोलते रहेंगे। यह सुनने में कुछ-कुछ यूटोपिया सा लगता है, लेकिन कुछ बनाने के लिए पहले उसकी कल्पना तो करनी ही होती है।

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

आम जनता की उम्मीदों से उदासीन 'आम आदमी का बजट'

वित्त वर्ष 2010-11 के लिए पेश बजट प्रस्तावों को 48 घंटे बीत चुके हैं। हर बार की तरह इस बार भी कुछ प्रस्तावों के राजनीतिक महत्व को देखते हुए सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गए हैं और कुछ प्रस्ताव केवल अर्थवेत्ताओं में ही चर्चा का विषय बन सके हैं। जैसे कोई भी व्यक्ति, विषय या समाज संपूर्ण (परफेक्ट) नहीं होता, उसी तरह यह बजट भी नहीं है। इसीलिए इसे कोई भी एक नाम देकर सर पर चढ़ा लेना या खारिज कर देना बचकानापन होगा।

मेरे विचार से प्रणव मुखर्जी का इस बार का बजट उम्मीदों, उदासीनताओं और उपेक्षाओं का सम्मिलित दस्तावेज है। वेतनभोगी जनता के लिए इसने जहां उम्मीद और उत्साह का पिटारा खोला है, वहीं हर दिन अपनी आजीविका के लिए जूझने वाले करोड़ों गरीबों और मजदूरों के लिए यह बजट उदासीनता का दर्द है। और इसमें उपेक्षा मिली है फिर देश के उस हिस्से को, जिसके लिए जबानी खर्च सबसे ज्यादा किया जाता है, यानी किसानों को। देश की आर्थिक वृद्धि दर दहाई अंक में ले जाने की इस सरकार की प्रतिबद्धता संदेह से परे है। लेकिन, ऐसी स्थिति में कृषि को लेकर सरकार में दृष्टि का अभाव (lack of vision) बहुत अखरता है। जबकि स्वयं सरकार भी यह मानती है कि कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4 फीसदी तक पहुंचाए बिना देश के जीडीपी को 10 फीसदी की रफ्तार दे पाना संभव नहीं है, तो फिर कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए महज 400 करोड़ रुपए का आवंटन उदासीनता का दर्दनाक उदाहरण है। वित्त मंत्री फसलों को पानी मिलने के लिए इंद्र देवता से प्रार्थना करने के लिए तो तैयार हैं, लेकिन सिंचाई सुविधाएं बढ़ाने के लिए उनकी झोली में केवल 300 करोड़ रुपए हैं। मेरा साफ मानना है कि कृषि ऋण माफी जैसी योजनाएं सरकारी पैसे का घनघोर दुरुपयोग है और इससे एक ओर तो वास्तविक ज़रूरतमंदों की कीमत पर ग़लत और ग़ैर ज़रूरतमंदों को फायदा पहुंचाया जाता है, वहीं आगे से कर्ज लेकर उसे पचा जाने की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिलता है। इसके बदले अगर 80,000 करोड़ रुपए की रकम देश की सिंचाई व्यवस्था ठीक करने और कृषि उपज बढ़ाने पर खर्च की जाए तो यह केवल एक साल के लिए किसानों के लिए राहत के दरवाजे नहीं खोलेगा, बल्कि उनकी उत्पादकता और आमदनी बढ़ाकर उन्हें और ज्यादा कर्ज समय पर वापस करने के लिए सक्षम बनाएगा। इस दिशा में कोल्ड स्टोरेज शुरू करने के लिए जरूरी उपकरणों के आयात पर सीमा शुल्क 5 फीसदी कम करने और सेवा कर से पूरी छूट एक स्वागतयोग्य घोषणा है।

वेतनभोगियों के लिए ज़रूर यह बजट एक बोनांजा है, जिन्हें स्लैब में हुए बदलाव से भारी राहत मिलेगी। लेकिन यहां भी, अच्छा होता अगर वित्त मंत्री स्लैब की जगह छूट की दरें बढ़ा देते। ऐसा होने से हर आय वर्ग के लोगों को बराबर फायदा होता, जबकि मौजूदा स्थिति में ज्यादा पैसा कमाने वालों को छूट भी ज्यादा मिलेगी और कम वेतन वालों के हाथ कुछ खास नहीं आएगा। इस तरह का विरोधाभास विडंबना ही है। इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड में निवेश को 80 सी के तहत 1 लाख रुपए के ऊपर जोड़ा जाना एक अच्छा कदम है।

उद्योग जगत इस बजट से काफी खुश है, जिसकी एक झलक बजट पेश होने के दौरान शेयर बाजार में आई भारी बढ़त से मिली। हालांकि इसमें भी 'कुछ बहुत अच्छा होने' से ज्यादा 'कुछ बहुत बुरा ने होने' की भूमिका ज्यादा थी, जिसका संकेत बीएसई के 30 शेयरों वाले सूचकांक सेंसेक्स के अपने दिन के शीर्ष स्तर से 240 अंक नीचे बंद होने से मिलता है। उत्पादन और सीमा शुल्क में मिली छूट के चरणबद्ध तरीके से वापस होने को लेकर बाजार लगभग तैयार था। वैकल्पिक न्यूनतम कर (मैट) को 15 से बढ़ाकर 18 फीसदी किया जाना जरूर एक नकारात्मक सरप्राइज था, लेकिन कॉरपोरेट टैक्स पर सरचार्ज को 10 से घटाकर 7.5 फीसदी करने के फैसले से बहुत हद तक इसकी भरपाई हो गई। इनके अलावा नए होटलों पर निवेश को डिडक्शन से जुड़े फायदे देने और शोध एवं अनुसंधान पर वेटेड डिडक्शन में बढ़ोतरी से क्रमशः होटल और फ़ार्मा सेक्टर को फायदा होने की उम्मीद है। अति लघु, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए बजट आवंटन में 30 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी कर उसे 2,400 करोड़ रुपए कर दिया गया है, जिससे निश्चत तौर पर उभरते हुए उद्योगों के विकास में मदद मिलेगी।

सामाजिक एवं जनकल्याण के लिए वित्त मंत्री ने काफी गंभीरता दिखाई है। कुल 3,73,000 करोड़ रुपए के बजट में से 37 फीसदी सामाजिक क्षेत्र के लिए आवंटित किए गए हैं, जबकि 25 फीसदी ग्रामीण क्षेत्र में आधारभूत ढांचे के विकास के लिए दिया गया है। पेयजल की हालत में सुधार के लिए 1,300 करोड़ रुपए बढ़ाए गए हैं, जबकि सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए आवंटन को 2,600 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 4,500 करोड़ रुपए कर दिया गया है। इससे सरकार की मंशा तो ज़ाहिर हो जाती है, लेकिन यह पता नहीं चलता कि क्या वास्तव में एक साल बाद देश की जनता को पीने का बेहतर पानी ज्यादा सुलभ हो जाएगा, यह पता नहीं चलता कि क्या 28 फरवरी 2011 को जब भारत के वित्त मंत्री अगला बजट पेश करने के लिए खड़े होंगे, तब क्या हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा पाने वाले बच्चों की संख्या अपेक्षित तौर पर बढ़ चुकी होगी, क्या शुरुआती 2-3 वर्षों में स्कूल छोड़ कर मजदूरी में लगने वाले बच्चों की संख्या में अपेक्षित सुधार आएगा, क्या बच्चों को जन्म देते समय मरने वाली मांओं की संख्या इस रकम के अनुपात में ही घटेगी और क्या जीवन की रोशनी देखने से पहले ही मौत की आगोश में समाने वाले नौनिहालों की संख्या में अपेक्षित कमी आएगी। यह सब कुछ इसलिए पता नहीं चलता क्योंकि बजट घोषणाओं को अमली जामा पहना सकने का सरकारी रिकॉर्ड बहुत ख़राब है। स्वयं वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में स्वीकार किया, 'वास्तव में, आने वाले वर्षों में, यदि कोई कारक हमें एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में हमारी क्षमता को साकार करने में बाधक हो सकता है तो वह हमारी सार्वजनिक वितरण प्रणालियों की अड़चन है।'

यह बजट जिस एक मोर्चे पर सबसे ज्यादा नाकाम हुआ है, वह है महंगाई का। अपनी जेब बचाने के लिए त्राहि-त्राहि करती जनता के प्रति वित्त मंत्री की उपेक्षा भयानक है। उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी से जहां सीमेंट और स्टील जैसी कमोडिटी की कीमतें बढ़नी तय है, वहीं पेट्रोल-डीजल पर शुल्क बढ़ाने का प्रस्ताव कर मुखर्जी ने एक तरह से आम जनता के ज़ख़्मों पर नमक मल दिया है। हो सकता है कि राजनीतिक दबाव में यह प्रस्ताव वापस लेना पड़े, लेकिन इसने यह तो बता ही दिया है कि इस सरकार की प्राथमिकता सूची में आम आदमी का दुख और उसकी पीड़ा कहीं नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में 74 रुपए प्रति बैरल (160 लीटर) के हिसाब से कच्चे तेल की कीमत इस समय करीब 21.46 रुपए प्रति लीटर पड़ता है। अब रिफाइनिंग और परिवहन चार्ज लगाने के बाद भी किसी तरह यह 44 रुपए प्रति लीटर नहीं हो सकता। पेट्रोल पर हम जो हर रुपया देते हैं, उसमें से 51.36 पैसे सरकार की जेब में जाते हैं। इस पर भी अगर सरकार रोना रोती है, तो यह केवल उसकी लूट वृत्ति ही दर्शाता है।

राजकोषीय घाटे को लेकर सरकार बहुत चिंतित रही है। इस संदर्भ में जिस तरह अगले दो वर्षों में इसके कम होकर जीडीपी का केवल 4.1 फीसदी रह जाने की उम्मीद जताई गई है, उसमें मुझे खुश होने की कोई वजह नजर नहीं आती। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपिनयों में हिस्सा बेचकर 40,000 करोड़ रुपए और 3जी स्पेक्ट्रम की बिक्री से 35,000 करोड़ रुपए जुटाने की योजना बना रही है और इसी के भरोसे राजकोषीय घाटा कम करने की उम्मीद कर रही है। यह कुछ इसी तरह है जैसे आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों से लिया कर्ज़ उतारने के लिए अपने घर के सामान और पत्नी के ज़ेवर बेचने का जुगाड़ कर रहे हों। बेहतर हो सरकार अपना भुगतान संतुलन (बीओपी) ठीक करने के लिए निर्यात बढ़ाए, उत्पादन बढ़ाए और लोगों की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाए। विनिवेश और स्पेक्ट्रम की बिक्री जैसे उपायों से होने वाली आमदनी को सड़क, पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं के विकास में लगाया जाए ताकि रोजगार बढ़े और जीडीपी की वृद्धि दर भी।

कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि यह बजट शेयर बाज़ार और उद्योग जगत के लिए तो अच्छा है, लेकिन आम लोगों के लिए पूरी तरह उदासीन है। अब विचारणीय यह है कि किसी भी बाजार या उद्योग की आमदनी का आखिरी स्रोत तो आम जन ही है, ऐसे में आम जनता की जेब और मन पर कुठाराघात करने वाला कोई भी बजट या प्रस्ताव लंबी अवधि में उद्योग या बाजार का भी भला नहीं कर सकता।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

अंग्रेजी की इस उपेक्षा पर मैं खुश हूं लेकिन...

लेकिन यह एक सैडिस्ट एप्रोच है। कोई हमारा दुश्मन ही सही, उसकी उपेक्षा या दुर्दशा पर खुश होना तो हमारे व्यक्तित्व की एक बड़ी कमी है। फिर भाषा कोई भी हो, हमारी दुश्मन कैसे हो सकती है? अंग्रेजी हो या फ्रेंच, जर्मन हो या हिब्रू- सारी भाषाएं एक समाज विशेष, समय विशेष और विचार विशेष के महल में घुसने का दरवाजा ही तो हैं। फिर भी, भारत में अंग्रेजी केवल एक भाषा नहीं है। यह एक हथियार है, समाज के कमजोर, पिछड़े और गरीब तबके से आने वाली प्रतिभाओं की हत्या करने का। यह एक चोर दरवाजा है, समाज के धनाढ्य और प्रभावशाली वर्ग (वामपंथी मित्रों की शब्दावली में बुर्जुआ वर्ग) के सत्ता के गलियारों में पहुंचने का। इसीलिए इस देश में हिंदी की, तमिल की, गुजराती की, कोंकणी की, मलयालम की, तेलुगू और उड़िया की, असमिया और जनजातीय भाषाओं की, कश्मीरी और पंजाबी की तथा इस देश की मिट्टी से जुड़ी तमाम भाषाओं और उनके साहित्य की उपेक्षा कोई खबर नहीं है, लेकिन अंग्रेजी की उपेक्षा एक खबर है।

राष्ट्रपति ने अपना अभिभाषण हिंदी में पढ़ा। इसमें कोई खबर नहीं। अपनी जनसभाओं में सोनिया और लालकिले से मनमोहन भी अपना भाषण हिंदी में ही पढ़ते हैं। खबर यह है कि राष्ट्रपति के भाषण का अंग्रेजी अनुवाद नहीं हुआ था। जी हां, यही खबर है। क्योंकि इस देश में अंग्रेजी में कुछ अनुवाद नहीं होता (कुछ नहीं मतलब, लगभग कुछ नहीं)। रचनात्मकता और चिंतन की भाषा अंग्रेजी है और अनुवाद की भाषा हिंदी एवं दूसरी भारतीय भाषाएं हैं। दस जनपथ और पीएमओ की एक चिड़िया से भी मेरा परिचय नहीं होने के बावजूद मैं दावा कर सकता हूं कि सोनिया की जनसभाओं और मनमोहन के लालकिले के भाषण अंग्रेजी में लिखे जाते होंगे, फिर उनका हिंदी अनुवाद होता होगा और फिर उन्हें रोमन में लिखा जाता होगा। संसद के हर विधेयक, हर प्रस्ताव, तमाम मंत्रालयों के गजट और विचार पत्र- सभी मूलरूप से अंग्रेजी में लिखे जाते हैं और हिंदी के प्रति सरकार की निष्ठा ज़ाहिर करने के लिए उन्हें उसमें अनुवाद किया जाता है। राजस्थान जैसे राज्य से आने के बावजूद ज्यादातर समय मैंने राष्ट्रपति को अंग्रेजी में ही संवाद करते सुना है। ऐसे में यह मेरे लिए बहुत बड़ी खबर है कि राष्ट्रपति का अभिभाषण हिंदी में ही सोचा गया और लिखा गया।

मुझे हमेशा इस बात पर आश्चर्य होता रहा है कि देश की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं के राजनेताओं और कर्णधारों के लिए हिंदी दुश्मन क्यों होती है, जबकि सभी भाषाओं को अंग्रेजी के कारण अपमान और उन्मूलन का ख़तरा झेलना पड़ रहा है। जितनी समझदारी अब तक बनी है मेरी, उसके मुताबिक तो यही लगता है कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ख़ुद सरकारी रवैया है। अब यही उदाहरण देखिए। राष्ट्रपति के अभिभाषण का अंग्रेजी अनुवाद किया ही नहीं गया। स्वाभाविक है कि जिन प्रांतों के नेता, सांसद, मंत्री हिंदी (देवनागरी में) पढ़ना नहीं जानते, उनके मन में आक्रोश का एक बीज और डल गया। उन्हें यह अहसास करा दिया गया कि हिंदी के बढ़ने का मतलब उनकी लाचारी और बेचारापन है। लेकिन इसका यह निष्कर्ष कतई नहीं है कि अंग्रेजी हमारे देश की अपरिहार्य मजबूरी है।

भारतीय भाषाओं को आपस में प्रेम करने के लिए अंग्रेजी का बंधन नहीं चाहिए। यह जिम्मेदारी देश के सबसे ज्यादा लोगों में बोली और उससे भी ज्यादा लोगों में समझी जाने वाली हिंदी की है। हिंदी के विकास के नाम पर जारी होने वाले करोड़ों के फंड से आधे की कटौती कीजिए और उसमें बाकी दूसरी भारतीय भाषाओं को हिस्सा दीजिए। हिमालय सी मशीनरी वाली भारत सरकार के लिए एक अभिभाषण को ही नहीं, तमाम जरूरी सरकारी कागजों को आठवीं अनुसूची की सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद करना नामुमकिन नहीं है। थोड़ा कठिन जरूर है, लेकिन ठान लेने पर अगर सरकार देश के दूरदराज के गांवों, रेलवे स्टेशनों, झुग्गियों और शहरों में मौजूद करोड़ों शिशुओं को पोलियो ड्रॉप पिला सकती है, तो यह बहुत छोटा काम है। और देश की सच्ची प्रतिभाओं को उभरने के लिए बराबरी का मौका देने और सामाजिक न्याय को सच्चे रूप से स्थापित करने में इस कदम की जितनी महान भूमिका हो सकती है, उसे देखते हुए इस पर होने वाला कोई भी खर्च और परिश्रम कम ही होगा।