बुधवार, 1 जून 2011

बाबा रामदेव को शीर्षासन की ज़रूरत है

बाबा जी का कहना है कि क्योंकि प्रधानमंत्री 121 करोड़ लोगों का प्रतिनिधि होता है, इसलिए उसे एक अफसरशाह (यानी लोकपाल) के प्रति जवाबदेह नहीं बनाया जा सकता है। मेरे मन में बाबा जी की भलमनसाहत पर दो सवाल उठ रहे हैं। पहला, क्या सचमुच अपने देश में प्रधानमंत्री पूरी जनसंख्या का प्रतिनिधि होता है? क्या गुजराल, देवेगौड़ा और जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड अपने नाम करने जा रहे मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जनता ने अपना प्रधानमंत्री चुना है?

निश्चित तौर पर नहीं चुना है, बल्कि मनमोहन सिंह को तो किसी संसदीय क्षेत्र की जनता तक ने नहीं चुना है। लेकिन इस तर्क के तमाम विरोधी हो सकते हैं, जो यह साबित कर देंगे कि यहां तक कि नेहरू, इंदिरा गांधी, वी पी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी (जिनकी पार्टियों को वोट देने वाले वस्तुत: उन्हें ही प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट करते थे) जैसे प्रधानमंत्री भी देश की जनता के कुल मत का 50 फीसदी तक नहीं पा सके थे। इसलिए इस सवाल को फिलहाल बहस के लिए ठंडे बस्ते में डाल देते हैं कि भारत का प्रधानमंत्री वास्तव में देश की जनता का कितना प्रतिनिधि होता है या नहीं।

अब दूसरा सवाल, क्या किसी को केवल इसीलिए लोकपाल के प्रति जवाबदेह नहीं होना चाहिए कि उसे जनता ने चुना है। तब तो एक थाना प्रभारी की उस क्षेत्र के सांसद या विधायक के सामने कानूनी तौर पर कोई हैसियत नहीं होना चाहिए। उसी तरह राज्य के लोकायुक्त को मुख्यमंत्री का चपरासी होना चाहिए और देश के मुख्य न्यायाधीश को प्रधानमंत्री का चारण होना चाहिए। प्रस्तावित लोकपाल को एक अफसरशाह बताना मूर्खता की हद है। इस लिहाज से तो मुख्य चुनाव आयुक्त भी एक अफसरशाह हैं और सेबी के प्रमुख और भारतीय रिज़र्व बैक के गवर्नर भी अफसरशाह हैं।

क्या बाबा रामदेव भूल गए कि अभी कुछ ही महीने पहले एक भ्रष्ट आरोपी को किस निर्लज्जता के साथ मुख्य सतर्कता आयुक्त की कुर्सी पर बैठाने के लिए हर संभव कोशिश की गई थी। और वह कोशिश और किसी ने नहीं, 121 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि, घनघोर इमानदार डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने सिपहसालार पी चिदंबरम के साथ मिलकर की थी। हद तो यह कि पकड़े जाने पर सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने सफेद झूठ यह कहा कि उन्हें थॉमस पर लंबित आरोपों की जानकारी ही नहीं थी, जबकि थॉमस के चयन के लिए हुई तीन सदस्यीय पैनल की बैठक में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने साफ तौर पर इस मुद्दे को उठाया था।

ख़ैर, लौटते हैं बाबा रामदेव के उसी तर्क की ओर। तो अगर 121 करोड़ लोगों का प्रतिनिधि इमानदारी का पुतला होता है, तो 20 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि रहे मुलायम यादव और मायावती चोर कैसे हो सकते हैं। तो उनके खिलाफ चलने वाले आय से ज्यादा संपत्ति बटोरने और ताज कॉरिडोर घोटाले का मामला भी तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। 15 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि रहे लालू पशुओं का चारा नहीं खा सकते और तमिलनाडु के कुछ करोड़ लोगों के प्रतिनिधि करुणानिधि का कुनबा 2जी की नीलामी में सैकड़ों करोड़ नहीं डकार सकता। फिर तो इस तर्क से हर सांसद, हर विधायक, हर पार्षद और वार्ड सदस्य और हर निर्वाचित प्रतिनिधि कानून के दायरे से बाहर होना चाहिए। क्या बेवकूफ़ी भरा तर्क है?

यहां मामला निर्वाचित प्रतिनिधियों के किसी एक अफरसशाह के प्रति जवाबदेह होने का नहीं हैं। मामला है उस निर्वाचित प्रतिनिधि के देश और संविधान के प्रति जवाबदेह होने का। चाहे वह लोकपाल हो, कोई न्यायाधीश हो या कोई भी नियामक- वह कोई व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह एक संस्था होता है, जिसमें संविधान की शक्तियां निहित होती हैं। रामदेव का यह तर्क ठीक है कि भ्रष्ट तो लोकपाल भी हो सकता है। तो उसके लिए ज़रूरी उपाय किए जाने चाहिए। संविधान निर्माताओं ने चेक्स एंड बैलेंसेज के जिस सिद्धांत पर जवाबदेहियों का निर्धारण किया था, उसमें किसी व्यक्ति और संस्था को अवध्य नहीं माना गया। इसीलिए कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका सबको एक-दूसरे पर अंकुश रखने के कुछ अधिकार दिए गए।

अब आज़ादी के छह दशकों बाद वे चेक्स एंड बैलेंसेज नाकाफी साबित हो रहे हैं। भ्रष्टाचार का ज़हरीला पानी नाक के ऊपर से बह रहा है और इसके लिए तत्काल कुछ किए जाने की ज़रूरत है। लोकपाल का प्रयोग कितना सफल होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन इसके अधिकारों को लेकर सरकार की ओर से जो चालबाजियां की जा रही हैं, वह अपने आप में इसके प्रभावी हो सकने का संकेत है।

यह समझने के लिए कोई वैज्ञानिक होना ज़रूरी नहीं है कि भ्रष्टाचार का मूल सत्ता और ताक़त है। जहां अधिकार और शक्तियां हैं, वहीं से भ्रष्टाचार का जन्म होता है। इसलिए इस पर सबसे क़रारा प्रहार भी सत्ता के शीर्ष से ही होना चाहिए। भूखों, नंगों और ज़िंदगी की जद्दोज़हद में पानी-पानी हो रहे लोगों पर तो कानून का डंडा चलाइए और विधायकों, सांसदों, मंत्रियों और सबके मुखिया प्रधानमंत्री को आरती दिखाइए। और फिर सपना देखिए एक भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का। ऐसे सपने देखने वालों को अपनी सोच की दिशा सीधी करने के लिए सिर के बल खड़ा होने की ज़रूरत है, चाहे वह योग गुरू बाबा रामदेव ही क्यों न हों।

सोमवार, 17 जनवरी 2011

जंगपुरा और पुष्प विहार में अंतर के नतीजों से डरिए

12 जनवरी, दिन बुधवार। दिल्ली के दो अलग-अलग हिस्सों में दो अवैध पूजा स्थलों को ढहाया गया। जंगपुरा में एक मस्जिद ज़मींदोज की गई और पुष्प विहार में एक मंदिर गिराया गया। लेकिन हमारे समाज और राजनीति पर इन दोनों घटनाओं के असर में फ़र्क था। आइए, इसके बाद हुई घटनाओं की कड़ी से इस अंतर को देखा जाए।

अगले दिन यानी 13 जनवरी को राजधानी के लगभग तमाम अखबारों में मस्जिद गिराए जाने की ख़बर पहले पेज पर थी। होना लाज़िमी भी था। सुबह 6 से 9.30 बजे तक मस्जिद गिरी और 11.30 बजे जामा मस्जिद के शाही इमाम वहां पहुंच गए। हज़ार से ज़्यादा की संख्या में मुस्लिम वहां इकट्ठे हो गए। स्थानीय विधायक (जो कि एक ग़ैर मुस्लिम हैं) अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ मुसलमानों के ख़िलाफ हुए इस अत्याचार पर आवाज़ बुलंद करने वहां पहुंच गए। दो और विधायक, मटिया महल के शोएब इक़बाल और ओखला के आसिफ़ मोहम्मद ख़ान वहां आ गए। ज़ाहिर है, वह जनप्रतिनिधि होने के नाते नहीं, बल्कि मुसलमान होने के नाते अपना फर्ज़ अदा करने पहुंचे थे। बात यहीं नहीं थमी।

मस्जिद ढहने के बाद की पहली नमाज पास के थाने में पढ़ी गई। बाद के नमाज के लिए हज़ारों मुसलमान गिराई गई मस्जिद की जगह की ज़िद करने लगे, जो कि उन्हें बाद में दे दी गई। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और अपने नाम के आगे मुल्ला जुड़वाने के शौक़ीन मुलायम सिंह यादव ने उसी दिन घटनास्थल पर पहुंच कर घोषणा की कि यह मुसलमानों पर ज़ुल्म है। दिल्ली की मुख्यमंत्री कैसे पीछे रहतीं? वह भी भागी-भागी पहुंची। अल्पसंख्यकों के साथ हुए इस अत्याचार पर आंसू बहाया। फिर अगले दिन शाही इमाम के दरवाज़े पर मत्था टेकने जामा मस्जिद पहुंचीं। आधे घंटे की बैठक के बाद शाही इमान ने सच्चे देशभक्त की तरह मुसलमानों से शांति बरतने की अपील की और उन्हें बताया कि मस्जिद फिर वहीं बनेगी।

शीला जी ने उनसे वादा किया है कि पहले जिस ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा कर मस्जिद बनाई गई थी, उसे अब सरकार अपने खर्चे से (मतलब आम लोगों के खर्चे से) ख़रीद कर वक्फ़ बोर्ड को सौंपेगी। नतीजा- घटनास्थल पर मौजूद मुस्लिम श्रद्धालुओं ने डीडीए द्वारा बनाई गई चहारदिवारी ढाह दी और घटनास्थल पर एक अस्थाई मस्जिद बना दी गई। 12 जनवरी को मस्जिद तोड़े जाने के बाद से अब तक वहां हज़ारों मुसलमान मौजूद हैं और हर समय की नमाज मिलकर अदा कर रहे हैं।

अब दूसरी घटना। पुष्प विहार का मंदिर गिराए जाने के बाद न कोई पत्ता हिला, न कंकड़ गिरा। एक अवैध इमारत को ढहाने की घटना को वहां के पूरे हिंदू समाज ने सहर्ष स्वीकार किया। नतीजतन, अखबार और टीवी के लिहाज से कोई ख़बर ही नहीं बनी। लेकिन जंगपुरा में हो रहा खेल जब अखबारों की सुर्खियां बन रहा हो, तो स्वाभाविक तौर पर राहुल गांधी के शब्दों में लश्कर-ए-तोएबा से भी ख़तरनाक कट्टर हिंदुओं पर कुछ करने का दबाव तो बना ही होगा। तो फिर शनिवार को पुष्प विहार में सड़कों पर जाम लगा। बीआरटी भी जाम की गई।

रविवार को इंडियन एक्सप्रेस ने पांचवें पन्ने पर दो कॉलम में यह ख़बर लगाई, तो मुझे भी पहली बार पता चला कि पुष्प विहार में चार दिन पहले कोई मंदिर भी तोड़ा गया था। लेकिन इस खबर में एक ख़ास बात थी। जंगपुरा में इकट्ठा होने वाले, विरोध करने वाले और नारे लगाने वाले मुसलमान थे। पुष्प विहार मंदिर के लिए जमा होने वाले भाजपाई थे, विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस वाले थे। वहां कोई हिंदू नहीं था। जंगपुरा की जंग मुसलमानों की जंग है, लेकिन पुष्प विहार का विरोध भाजपाइयों और संघियों का पार्टी कार्यक्रम है।

हिंदुओं का न कोई सेकुलर शाही इमाम है, न कोई स्थानीय विधायक, न शोएब इक़बाल हैं, न आसिफ़ मोहम्मद ख़ान। न ही बगल के राज्य से भागा-भागा आने वाला कोई मुल्ला मुलायम है और न ही राज्य की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। हिंदुओं के लिए खड़े होने वाले केवल वही मुट्ठी भर लोग हैं, जो चिदंबरम जी और दिग्विजय सिंह की नज़र में हिंदू आतंकवादी हैं और राहुल गांधी की नज़र में पाकिस्तान की सेना से संचालित होने वाले लश्कर से भी ख़तरनाक हैं।

क्योकि इस देश के कम्युनिस्टों की आंखों पर तो हिंदू विरोध का पट्टी पड़ी है, इसलिए उनसे जागने की उम्मीद व्यर्थ है। लेकिन इन मुट्ठी भर बौद्धिक विकलांगों के अलावा जो देश की 98 फीसदी से ज्यादा आबादी है, उससे ज़रूर इस तरह की घटनाओं के निहितार्थ समझने की उम्मीद की जा सकती है। इस देश का मुसलमान देशभक्त है और मुख्यधारा के साथ चलना चाहता है, लेकिन इमाम, इक़बाल, ख़ान, मुलायम और शीला जैसों की दुकानदारी चलते रहने के लिए ज़रूरी है कि वह कूपमंडुक बना रहे और पूरे देश में उसकी छवि कट्टरपंथी और कानून के दुश्मन की बने। क्योंकि अगर ऐसा होगा, तभी बहुसंख्यक हिंदुओं के भीतर उसकी प्रतिक्रिया होगी, सुनील जोशी और असीमानंद जैसे नाम पैदा होंगे (यह मानते हुए कि वह दोषी हैं) और जब ऐसा होगा, तभी फिर उन्हें हिंदुओं का भय दिखा कर अपनी दावत चलती रहेगी।

अगर किसी को इस सिद्धांत में कोई अतिशयोक्ति दिखती हो, तो वह अपने दो बच्चों या घर के दो सदस्यों के बीच यही प्रयोग(जंगपुरा और पुष्प विहार के अंतर का) दुहरा कर देख ले। वे तमाम हिंदू, जिन्हें बम विस्फोटों के मामलों में आरोपी बनाया गया है, एक ही गुट के हैं। मतलब अगर ये सारे आरोप सही भी हैं, तो ये हिंदू समाज के स्वभाव में आ रहे किसी बदलाव का संकेत नहीं करते। लेकिन कल्पना कीजिए, अगर वास्तव में चिदंबरम, दिग्विजय और राहुल गांधी की राजनीतिक बयानबाजी सच साबित हो जाए, तो भारत को पाकिस्तान बनने में कितना समय लगेगा, जहां अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक कानून का विरोध करने वाले (न कि उन्हें विशेष सुविधाएं देने की मांग करने वाले) गवर्नर की हत्या करने वाले पर फूल बरसाने वालों में पुलिसवाले और वकील तक शामिल थे।

इसलिए अगर आप इस देश के मुसलमानों के हितचिंतक हैं, तो जंगपुरा और पुष्प विहार का अंतर ख़त्म किए जाने के लिए आवाज़ उठाइए। लेकिन अगर आपको केवल राजनीति करनी है, तो कीजिए, लेकिन फिर इस ग़लतफ़हमी में मत रहिए कि इस आग की लपटों से आपका घर और आपके बच्चे बच जाएंगे।

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

हम सब माओवादी हैं, लेकिन...

बिनायक सेन को उम्रक़ैद की सज़ा सुनने के बाद उनकी पत्नी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अवसाद भरा दिन है। यह प्रतिक्रिया थोड़ी अजीब है। माओवाद और चाहे जिस भी तरह की समाजसेवा कर रहे हों, कम से कम देश में लोकतंत्र की जड़ें तो मज़बूत नहीं ही कर रहे हैं। अगर बिनायक सेन की पत्नी को लोकतंत्र की चिंता है, तो इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि शायद एक ग़ैर सरकारी संगठन चला रहे सेन छत्तीसगढ़ सरकार के माओवाद विरोधी उत्साह का मिथ्या शिकार बन रहे हों। आख़िर अपने देश में पुलिस महकमे की सबसे बड़ी विशेषताओं में किसी को कहीं भी और किसी भी अपराध के लिए जेल में डाल देना और फिर उसका अपराध साबित करना भी शामिल है ही। लेकिन फिर सेन के समर्थन में खड़े होने वालों और धरना-प्रदर्शन करने वालों की लिस्ट पर नज़र जाते ही, उनके निर्दोष होने की कहानी का पोपलापन सामने आने लगता है। सेन के मित्र वही लोग हैं, जो माओवादियों के मारे जाने पर मानवाधिकार की दुहाई देने लगते हैं और माओवादी हिंसा को वंचितों और अन्याय के शिकार हुए लोगों की क्रांति कह कर जश्न मनाते हैं। तो दाल में कुछ काला लगना स्वाभाविक है।

फर्ज़ कीजिए की आपके बुज़ुर्ग पिताजी अपने पेंशन का चेक लेने जाएं और वहां क्लर्क 20 मिनट तक केवल इसलिए उन्हें लाइन में खड़ा रखे क्योंकि तेंदुलकर का शतक पूरा होने वाला था और वह क्रिकेट का दीवाना है, तो आप क्या करेंगे। क्या आपका खून नहीं खौलेगा और आपका मन नहीं होगा कि उस क्लर्क के मुंह में कालिख पोतकर, उसका सर मुंडा कर उसे पूरे शहर में घुमा देना चाहिए। अगर आप किसी मंत्री के बेटे या बेटी नहीं है, आपका कोई नज़दीकी संबंधी कहीं का सांसद, विधायक, डीएम, एसपी कोई अन्य प्रशासनिक अधिकारी नहीं है, तो मेरा दावा है कि आपने कम से कम एक दर्ज़न बार तो अपने किसी दोस्त या परिवार में यह प्रतिक्रिया ज़रूर दी होगी कि अमुक अधिकारी या क्लर्क या ड्राइवर या दुकानदार या डॉक्टर या इंजीनियर को चौराहे पर फांसी दे देनी चाहिए। आम लोगों की यह सबसे आम प्रतिक्रिया है, जो व्यवस्था के प्रति उनका गुस्सा व्यक्त करने के काम आता है। माओवादी आम आदमी के इसी गुस्से को अंजाम तक पहुंचाते हैं। बहुत अच्छा काम करते हैं।

माओवादियों के तमाम समर्थक यहीं तक आकर रुक जाते हैं। लेकिन कहानी यहां से आगे बढ़ती है। माओवादी संगठन बनाते हैं और संगठन चलाने के लिए पैसा चाहिए होता है। पैसा ग़रीब किसान और मज़दूर नहीं दे सकते। तो उसके लिए कारोबारियों, ठेकेदारों और वेतनभोगियों की ज़रूरत होती है। अब कोई भी कारोबारी, ठेकेदार या वेतनभोगी अपनी मेहनत की कमाई में से माओवादियों को टैक्स तो दे नहीं सकता। तो, फिर वह अपने-अपने धंधों में बेइमानी करता है। और एक बार फिर कारोबारी, ठेकेदार, इंजीनियर या डॉक्टर की बेइमानी का अंतिम शिकार वहीं ग़रीब किसान और मज़दूर होते हैं, जिन्हें न्याय दिलाने के लिए माओवादियों ने इस सारी कहानी की शुरुआत की थी। तो, यहीं आकर मेरे अंदर का माओवादी भी मर जाता है। क्योंकि व्यक्तिगत तौर पर अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति जहां मुझे अपील करती है, वहीं संगठन बनाकर राज्य को चुनौती देने का सैद्धांतिक आवरण मुझे डराता है।

इसमें दोष माओवादियों का ही नहीं है, यह तो संगठन का विज्ञान है। चाहे कथित खालिस्तान आंदोलन के नेता हों या कश्मीरी आतंकवाद के अगुवा या फिर उल्फा के अलंबरदार- सब ने करोड़ों की व्यक्तिगत संपत्तियां खड़ी की हैं और यह कोई गुप्त सूचना नहीं है। माओवादियों के प्रेरणा पुरुष नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड से पूछिए। सरकार को हर शोषण एवं अन्याय का मूल कारण बताकर और पूंजीवाद के जुमले गढ़ कर बिना जवाबदेही के अपहरण, हत्याएं और दूसरी आपराधिक गतिविधियां करना तो बहुत आसान है, लेकिन जब ख़ुद उन्हें ही देश का शीर्ष पद दे दिया गया तो वह निरर्थक विवाद पैदा करने और चीन के तलवे चाटने के अलावा कुछ नहीं कर सके। आजकल वह फिर आतंकवादी रास्तों पर लौटने की भूमिका तैयार कर रहे हैं।

मेरा यह सुविचारित मत है कि जंगल में घूमने वाले माओवादियों से ख़तरनाक क़ौम शहरों में रहने वाले कथित बुद्धिजीवी माओवादी हैं। बिनायक सेन की सज़ा पर एमनेस्टी इंटरनेशनल के लंदन कार्यालय से जताई गई चिंता की भाषा और तेवर देखिए। आपको समझ में आ जाएगा कि इन मानवाधिकार की आड़ में माओवाद बेच रहे ये कथित बुद्धिजीवी कितने ख़तरनाक हैं। गिलानी के साथ गलबहियां कर कश्मीर में भारतीय शासन को दुनिया का सबसे क्रूर और दमनकारी शासन बताने वाली अरुंधति राय इसी ख़तरनाक क़ौम का एक सिरा हैं। इसलिए जंगल को माओवादियों के सफाए से पहले इन शहरी माओवादियों को नकेल डालना बहुत ज़रूरी है, या कहें कि माओवाद पर विजय की पूर्व शर्त है। सवाल यह है कि रमन सिंह की सरकार की तरह क्या मनमोहन सिंह की सरकार भी इस पूर्व शर्त को पूरा करने का हिम्मत और इच्छा शक्ति रखती है।

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

ये हिंदू उदारता के वेस्ट बाईप्रोडक्ट्स हैं, इन्हें झेलते रहिए

इमाम अब्दुल्ला बुखारी ने पत्रकारों से भरे प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार को खुद भी पीटा और अपने गुंडों से भी पिटवाया। एक उर्दु अखबार के उस पत्रकार का दोष यह था कि उसने एक ऐसा सवाल पूछ लिया था, जो बुखारी को पसंद नहीं आया। सवाल था कि 1528 में अयोध्या के राम जन्मभूमि का खेसरा राजा दशरथ के नाम था। तो राजा रामचंद्र ही उसके स्वाभाविक उत्तराधिकारी होंगे। यह बात उच्च न्यायालय ने भी स्वीकार की है और सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जिलानी को भी इसकी जानकारी है। तो आपसी भाईचारे के लिए मुसलमान भाई क्यों नहीं राम जन्मभूमि हिंदुओं को सौंप देते। सवाल सुनने भर की देरी थी कि एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक मुस्लिम पूजा स्थल के मुख्य पुजारी ने गुंडों की भाषा में चिल्लाते हुए पत्रकार अब्दुल वहीद चिश्ती को गंदी और भद्दी गालियां दीं, उन्हें कौम का दुश्मन करार दिया और उनका सर कलम करने का आदेश दिया।

कल्पना कीजिए कि इस घटना में बुखारी की जगह विश्व हिंदू परिषद या बजरंग दल का कोई नेता होता या किसी प्रतिष्ठित मंदिर के पुजारी होते, तो क्या होता। एनडीटीवी जैसे सेकुलर चैनल की अगुवाई में तमाम फेसबुकिए सेकुलरों ने हंगामा खड़ा कर दिया होता। देश के गृहमंत्री ने तो पहले ही आतंकवाद पर भगवा रंग पोत दिया है, अब हिंदू संगठन और पुजारियों के लिए भी नए-नए विशेषण गढ़े जा रहे होते। लेकिन देखिए सेकुलरिज्म का चमत्कार। सेकुलरों के मुंह पर ताला जड़ा है। बुखारी की गुंडागर्दी का यह पहला उदाहरण नहीं है। अभी कुछ साल पहले इसने जी न्यूज के एक पत्रकार (इत्तेफाक से वह भी मुस्लिम थे) पर भी हमला करवाया था। इसके बावजूद मुझे याद नहीं आता कि बात-बात में हिंदू प्रतीकों, संगठनों और परंपराओं पर नाक-मुंह बिचकाने वाले सेकुलरों ने कभी औपचारिकता के लिए भी इसके खिलाफ अपने जीमेल स्टेटस में या फेसबुक लेबल में विरोध दर्ज कराया हो।

यही है भारत में सेकुलरिज्म का असली चरित्र। क्योंकि खुद को हिंदू विरोधी नहीं कह सकते, तो सेकुलर कहा जाता है। इन्हें मुसलमानों से भी प्रेम नहीं है। इन्हें बुखारियों, मदनियों और गिलानियों से प्रेम है। कोई मुसलमान इन लोगों के खिलाफ खड़ा होकर तो देखे, समर्थन तो दूर की बात ये सेकुलर उन्हें सहानुभूति देने तक नहीं आएंगे। अफसोस की बात यह है कि इसमें आप और हम तो क्या कहें, खुद ये सेकुलर भी कुछ नहीं कर सकते। इनकी मानसिक रचना ही कुछ ऐसी है, जन्मगत संस्कार ही कुछ ऐसे हैं। हिंदू संस्कृति और गौरव से जुड़ी हर बात का विरोध करने में इन्हें असीम आनंद का अनुभव होता है और उसी से उन्हें ऊर्जा भी मिलती है। इसलिए इनमें सुधार की उम्मीद व्यर्थ है। ये हिंदू परंपरा की उदारता के वेस्ट बाईप्रोडक्ट्स (कचरे) हैं, इन्हें झेलते रहिए।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

चिदंबरम साहब, मैंने आपको ग़लत समझा, मुझे माफ़ कर दीजिए

चिदंबरम साहब ने आतंकवाद को भगवा रंग दे दिया। बड़ा बवाल हुआ। भाजपा वाले हंगामा करने लगे और संघी आंखें चौड़ी तरेरने लगे। एक हिंदू होने और भारतीय इतिहास एवं संस्कृति में भगवा रंग का महत्व समझने के कारण मेरे मन में भी काफी उग्र प्रतिक्रिया हुई। एक-दो मित्रों के साथ चर्चा में मैंने चिदंबरम साहब को भला-बुरा भी कहा। लेकिन आज मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है। मैं चिदंबरम साहब से माफी मांगना चाहता हूं।

आज टीवी चैनलों पर मैंने सचमुच भगवा आतंकवाद का एक चेहरा देखा। भगवा चोले और भगवा पगड़ी में खड़ा वह आतंकवादी बड़ी निर्लज्जता से बिहार में नक्सलियों द्वारा चार पुलिसवालों के अपहरण को उचित ठहरा रहा था। वह कह रहा था कि क्योंकि बहुत से नक्सलियों को मामूली आरोपों के कारण जेल में बंद रखा गया है, इसलिए उन्हें छुड़ाने के लिए नक्सलियों का यह कृत्य सौ फीसदी सही है। वह सरकार को नसीहत (या शायद नक्सलियों की ओर से धमकी) दे रहा था कि वह नक्सलियों को प्रोवोक न करे।

मुझे तुरंत लगा कि मैंने चिदंबरम साहब को समझने में भूल कर दी। भगवा के पीछे छुपा अग्निवेश नाम का यह आतंकवादी सचमुच देश के लिए बहुत बड़ा खतरा है। किसी भी नक्सली से ज्यादा ख़तरनाक। क्योंकि यह आपके और हमारे बीच रहता है, मंचों पर शांति और मानवता की बातें करता है। ख़ास बात यह है कि वह ख़ुद चिदंबरम साहब और उनकी पार्टी की तरह सेकुलर है। चिदंबरम साहब की ही तरह उसका भी मानना है कि इस्लाम के नाम पर होने वाले हज़ारों विस्फोटों और लाखों क़त्लों के बावजूद इस्लामिक आतंकवाद शब्द ग़लत होगा।

और मुझे पूरा भरोसा है कि जब चिदंबरम साहब ने भगवा आतंकवाद को देश के लिए उभरता हुआ ख़तरा बताया था, तो ख़ुद भगवा में लिपटे रहने के बावजूद वह बहुत खुश हुआ होगा, क्योंकि इससे पूरे हिंदू समाज और हिंदू इतिहास पर कलंक के छीटें उड़ते हैं। लेकिन अब बात साफ हो गई है। चिदंबरम साहब का वैचारिक मित्र है यह आतंकवादी, इसलिए गृहमंत्री जी की राजनीतिक मज़बूरी भी समझनी चाहिए। सीधे अग्निवेश सरीखे आतंकवादियों के ख़तरे को बताने के बजाए उन्होंने उसे भगवा आतंकवादी क़रार दिया। कांग्रेसी हैं न बेचारे, तो उन्हें न हिंदू होने का मतलब पता है, न भगवा का। सो थोड़ी सी ग़लती कर गए। लेकिन अब मैं समझ गया हूं, इसलिए देश से प्रार्थना है कि वह चिदंबरम साहब को माफ़ कर दे और ख़ुद चिदंबरम साहब से प्रार्थना करता हूं कि वह मुझे माफ़ कर दें।

शनिवार, 21 अगस्त 2010

इंडिया इंक के डायरेक्टरों का वेतन 1 करोड़ सालाना तो होना ही चाहिए

सांसदों का वेतन तीन गुना होने पर पूरा देश गुस्से और घृणा से भरा हुआ है। मैं इस पूरे मसले के उठने के दिन से ही सोच रहा हूं कि ऐसा क्यों है? मुकेश अंबानी, रतन टाटा, नंदन नीलेकणी और ऐसे सैकड़ों लोग हैं जिनका मासिक वेतन भी कुछ करोड़ रुपयों में है, लेकिन उनके प्रति तो कभी हमें गुस्सा नहीं आता। एक इंजीनियर, प्रोफेसर या टेलीविजन पत्रकार का औसत वेतन भी 30-40 हज़ार रुपए हो चुका है, तो फिर सांसदों का वेतन 16 हज़ार रुपए क्यों होना चाहिए? इस बात से शायद ही कोई इंकार कर सकता है कि 10-15 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले, हर महीने सैकड़ों लोगों की मेजबानी करने वाले और हर हफ्ते किसी ने किसी के निजी कार्यक्रम में शामिल होने और गिफ्ट देने वाले सांसदों का वेतन बढ़ना चाहिए। फिर यह गुस्सा और घृणा क्यों?

मुझे लगता है कि यह गुस्सा और घृणा सासंदों पर नहीं बल्कि उनके सांसदपने पर है? हमारे देश के छह दशकों के महान लोकतंत्र की यह सबसे बड़ी कमाई है कि हमारे यहां राजनेता गुंडागर्दी, अपराध, भ्रष्टाचार और हर तरह की सामाजिक बुराई का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुके हैं। एक राजनेता सांसद चुने जाने के लिए 10-10 करोड़ रुपए तक खर्च करता है। बढ़े हुए वेतन के साथ भी उसका पांच साल का वेतन होगा करीब 2.5 करोड़। तो क्या इसी के लिए वह 10 करोड़ रुपए खर्च करता है?

सांसदों पर इस देश की सुरक्षा से लेकर कृषि और शिक्षा से लेकर कारोबार तक के लिए नीतियां और कानून बनाने की ज़िम्मेदारी है। हमारे सांसद अपनी इस ज़िम्मेदारी को कितनी अच्छी तरह निभाते हैं, हम सबको पता है। कई बार तो कोरम पूरा नहीं होने के कारण संसद में किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा तक टालनी पड़ती है। और तो और, संसद के अंदर सवाल पूछने जैसे अपने मूल कर्तव्य के पालन के लिए भी सांसदों द्वारा घूस लिए जाने की घटना सामने आ चुकी है। हर सांसद को उसके 5 साल के कार्यकाल में सीधे उसके माध्यम से खर्च करने के लिए 10 करोड़ की रकम मिलती है। इसके अलावा दसियों सरकारी योजनाओं के लिए मिलने वाली करोड़ों रुपए की अन्य रकम भी सांसदों के ज़रिए खर्च होती है। इनमें वास्तव में कितना कल्याण योजनाओं पर खर्च होता है और कितना जनप्रतिनिधियों की अगुवाई में सरकारी अधिकारियों के बंदरबांट में निकल जाता है, इसका अनुमान हर भारतीय को है।

तो अब जब लालू जी के नेतृत्व में तमाम सांसदों ने (वामपंथियों को छोड़कर) जब अपने को ग़रीबी का पुतला बना कर वेतन बढ़ाने के लिए अभियान छेड़ ही दिया है, तो यह देश के लिए एक अच्छा मौक़ा है। तमाम सांसदों को देश रूपी कंपनी के बोर्ड का डायरेक्टर मानते हुए 1-1 करोड़ रुपए सालाना वेतन दे दिया जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही उन्हें मिलने वाली अनगिनत अन्य सुविधाएं वापस ली जानी चाहिए। वे और उनकी पत्नियों के लिए ट्रेन में प्रथम श्रेणी की आजीवन यात्रा सुविधा के अलावा विमान में मुफ्त टिकट, लुटियंस ज़ोन में मुफ़्त बंगले आदि की सुविधाएं वापस लेना चाहिए। बोर्ड की यानी संसद की बैठकों में उनकी उपस्थिति अनिवार्य करनी चाहिए। उनके लिए सीएल, पीएल, मेडिकल और सिक लीव तय होनी चाहिए और उससे ज्यादा छुट्टी लेने पर उन्हें विदाउट सैलेरी करना चाहिए। जो फंड उन्हें जनता के लिए दिया जाए, उसके एक-एक पैसे का हिसाब उसी तरह होना चाहिए जैसे किसी कंपनी के डायरेक्टरों के हस्ताक्षर से खर्च होने वाली रक़म का होता है। साथ ही भ्रष्टाचार के किसी भी मामले में पकड़े जाने पर उन्हें बोर्ड से बाहर किया जाना चाहिए।

लालू जी को प्रधानमंत्री बनने का बड़ा शौक़ है। सो एक दिन के लिए ही सही, एक छद्म संसद बनाकर वह प्रधानमंत्री तो बन ही गए। और इत्तेफाक़ तो देखिए, वह छद्म प्रधानमंत्री बने भी तो उसी काम के लिए, जिसके लिए वह वास्तव में प्रधानमंत्री बनने का सपना देखते हैं- और ज्यादा पैसे बनाने के लिए। तो ये जिस योजना का ब्लूप्रिंट मैं यहां रख रहा हूं, वह निश्चित तौर पर ऐसे सांसदों के बूते की नहीं है जो लालू जैसे नेता को केवल अपना वेतन बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री मानने को तैयार हैं। तो फिर... । इस यूटोपिया को पाने के लिए किसी और नेता की ज़रूरत है, जो कम से कम अभी तो दृष्टिपटल पर नहीं। तो, तब तक हर मंच पर इसके लिए आवाज़ उठाते हुए उस नेतृत्व का इंतज़ार करते हैं।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

सोनिया जी, आप महान हो, आपको शत-शत प्रणाम

सोनिया जी, आज सभी अखबारों में आपका बयान पढ़ा। आपने बहुत ही सख़्त चेतावनी दी है राष्ट्रमंडल के घोटालेबाजों को। आपने कहा है कि खेल आयोजन ख़त्म होने के बाद किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा। वाह, इसे कहते हैं टाइमिंग। जिस सरकार और जिस पार्टी में आपकी मर्ज़ी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता है, वहां अगर कहीं किसी को पहले आपके इस रुख़ का अहसास हो गया होता, तो सब गड़बड़ हो जाती। हज़ारों करोड़ की लूट नहीं हो पाती और देश की प्रतिष्ठा मटियामेट नहीं हो पाती।

जो खेल सालों पहले से तय थे, जिसकी निगरानी के लिए आपके लाडले के विराट व्यक्तित्व की छत्रछाया में 2005 में ही समिति का गठन हो चुका था, जिसके आयोजन क्षेत्र यानी दिल्ली में आपके दरबार में शीर्षासन करने वालों की सरकार 12 साल से है, जिन खेलों का सूत्रधार आपकी पार्टी का एक सांसद है, उन खेलों के आयोजन में हो रहा घोटाला महीनों से मीडिया की सुर्खियां बना रहा। लेकिन आपने पूरी तरह यह सुनिश्चित किया कि आपकी चेतावनी खेल शुरू होने से केवल 45 दिन पहले ही सामने आए। जब पहले ही 650 करोड़ रुपए के बजट पर 35,000 करोड़ रुपए की लूट हो चुकी है।

आखिर इस देश के प्रधानमंत्री को भी तो केवल 59 दिन पहले ही इन खेलों पर पहली बार ध्यान देने की ज़रूरत महसूस हुई। ईमानदारी और सुराज के प्रति आपकी निष्ठा... वाकई बेजोड़ है। लेकिन ये देश में जो कैग और सीवीसी जैसे कुछ बदमाश संगठन हैं न, आपको परेशान करने पर तुले रहते हैं। दोनों ने टेलीकॉम मंत्री राजा के खिलाफ जांच शुरू कर दी है। दोनों कह रहे हैं कि राजा जी ने टेलीकॉम लाइसेंस देने में 26,000 करोड़ रुपए का घोटाला कर दिया। अब इतनी बड़ी बात कहने से पहले इन्हें आपसे भी तो सलाह ले लेनी चाहिए थी। लेकिन कोई बात नहीं।

आपने दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए कानून मंत्रालय को राजा जी की सुरक्षा में उतार दिया है। आपके कानून मंत्रालय ने कैग और सीवीसी की औकात बताते हुए कह दिया है कि उन्हें न तो इस तरह घोटाले उजागर करने का अधिकार है और न ही उन्हें इसके लिए जिम्मेदारी दी गई है। अब अगर इतने से ही काम हो गया, तो ठीक है, लेकिन अगर ज्यादा हल्ला-हंगामा होगा, तो आप फिर एक बयान दे ही देंगी कि कानून को अपना काम करने दिया जाएगा। आपका बयान सारे अखबारों के पहले पन्ने की सुर्खी बन जाएगा और आपकी सरकार एक बार फिर सार्वजनिक जीवन में शुचिता का प्रतीक बन जाएंगी। आपकी यह रणनीति अचूक है।

मैं इसीलिए आपका फैन हूं। आपको प्रधानमंत्री बनने से रोककर कुछ मूर्खों को ऐसा लगा कि वह उन्होंने आपके प्रभाव की सर्वव्यापी चादर पर कैंची चला दी। लेकिन अगले कुछ वर्षों के भीतर हरकिशन सिंह सुरजीत से लेकर लालू, मुलायम, अमर सिंह जैसे नेताओं को अपने दरबार में नाक रगड़वा कर आपने यह साबित कर दिया कि उन मूर्खों को आपके महान व्यक्तित्व का ज़रा भी आभास नहीं था। आपको राजनीति का नवसिखुआ मानने वालों से बड़ा बुद्धू कौन है? देखिए न, आपका गृहमंत्री नक्सलवाद के खिलाफ पूरी ताकत झोंक दे रहा है और आपके राहुल बाबा के ड्रीम प्रोजेक्ट उत्तर प्रदेश का पार्टी प्रभारी आए दिन उसी गृहमंत्री के खिलाफ अखबारों में लेख लिख रहा है और बयान दे रहा है। बीच-बीच में आपके दरबारी रिपोर्टर अखबारों में यह ख़बर भी देते रहते हैं कि पार्टी हाईकमान ने दिग्विजय जी को गै़रज़िम्मेदाराना बयान न देने की ताक़ीद कर दी है। अब बताइए न, वास्तव में जिस दिन आप दिग्विज जी को एक बार यह चेतावनी दे देंगी, उसके बाद उनकी जबान तालू से न चिपक जाएगी। लेकिन, राजनीति का यह गुर दशकों तक चप्पल घिस कर थोड़े ही सीखा जाता है, जो भाजपाई और वामपंथी समझ जाएंगे। यह तो आपको दैवी वरदान है।

देश के होने वाले प्रधानमंत्री और आपके सुपुत्र ग़रीब जनता के साथ मिट्टी की टोकरी कंधे पर उठाकर तस्वीरें खिंचवाते हैं और सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे ज़्यादा पिछड़े वर्गों के घरों में रात बिताते हैं। यह ज़रूर आप ही की समझदारी होगी। नहीं तो आपकी सरकार ने जिस तरह ग़रीबों का आटा गीला किया है और जीवन की मूलभूत सुविधाओं को भी लग्ज़री बना दिया है, उसके बाद भी आप की पार्टी ग़रीबों की सबसे हमदर्द होने का दावा करे, यह कमाल कैसे हो सकता था। आपकी प्रतिभा का लोहा तो देश को उसी दिन मान लेना चाहिए था, जब आपने एक मिट्टी के माधो को अपने परिवार की सवा सौ करोड़ लोगों की प्रजा का भाग्यनियंता तय कर दिया। क्या शानदार चुनाव था आपका। जैसे नरसिंह राव ने देश की हर समस्या का समाधान चुप्पी में ढूंढ लिया था, वैसे ही डॉ मनमोहन सिंह के लिए हर बीमारी का रामबाण इलाज मंत्रियों का समूह है, जिसे जीओएम कहते हैं।

यहां तक कि सरकार के ही दो विभागों की आपसी लड़ाई में भी प्रधानमंत्री मामला जीओएम को ही सौंप देते हैं। इसीलिए तो राष्ट्रमंडल जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषय को उन्होंने शीला दीक्षित और कलमाडी की बिटिया की शादी का आयोजन सरीखा बनवा दिया। वैसे ही, कश्मीर जैसे अहम राष्ट्रीय मसले पर वह कानों में तेल डाले सोए रहे और जब घाटी में आम लोगों का नक़ाब पहने अलगाववादियों के प्रदर्शन में 50 से ज़्यादा जानें चली गईं और पूरी जनता भारत विरोधी नारे लगाने लगी, तब उनकी ओर से पहला बयान आया। बयान भी क्या? अलगाववादियों के एजेंडे यानी स्वायत्तता और सुरक्षा बलों के विशेष अधिकार वाले कानून पर विचार करने का बयान। मानना पड़ेगा सोनिया जी आपकी पारखी नज़रों को। दस साल पहले आपने अपने एजेंडे को पूरा करने वाला एक ऐसा व्यक्ति तलाश लिया, जो शैक्षणिक डिग्रियों और करियर प्रोफाइल में तो इस देश की व्यवस्था का मज़बूत स्तंभ लगे, लेकिन 7, रेसकोर्स में बैठकर आपके एजेंडे पर मुहर लगाए।

जैसे हरि अनंत, हरि कथा अनंता, उसी तरह आपकी भी महिमा अपरंपार है। पूरी धरती को कागज़ और सातों समुंदरों को स्याही बनाकर भी उसका गान नहीं किया जा सकता। उम्मीद है मेरी इस छोटी सी कोशिश में आपके जो बहुत सारे दूसरे चमत्कारों की चर्चा नहीं हो पाई है, उसके लिए आप मुझे माफ करेंगी। आप महान हैं, आपको शत-शत नमन।