गुरुवार, 9 जनवरी 2014

प. बंगाल की राह पर दिल्ली

दिल्ली में कुछ अद्भुत हो रहा है- चुनाव प्रचार के दौरान एफएम पर अरविंद केजरीवाल दिल्ली वालों को बार-बार, कई बार यह समझाते रहे। चुनाव परिणाम आया और सबको पता चला कि वह अद्भुत क्या था, जो हो रहा था। चुनाव खत्म हुए, परिणाम आए, साल भर पहले पैदा हुई आम आदमी पार्टी की सरकार बनी और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने। देश की राजधानी में क्रांति के एक नए युग का सूत्रपात हुआ। उसके बाद शुरू हुआ परिवर्तन का दौर। लेकिन इस दौर के साए में दिल्ली में कुछ और भी अद्भुत घटना शुरू हुआ है, जो अब तक लोगों की चेतना में नहीं आ सका है।

दिल्ली और कोलकाता का वैसे भी बहुत पुराना संबंध रहा है। दिल्ली पर कब्ज़े की ईस्ट इंडिया कंपनी की कोशिशों को 1757 में जिस पलासी की लड़ाई से पहली सफलता मिली थी, वह कोलकाता से केवल 150 किलोमीटर पर है। दिल्ली से पहले 1911 तक ब्रिटिश भारत की राजधानी पर कोलकाता ही हुआ करती थी। लेकिन ख़ैर ये घटनाएं तो महज़ इत्तेफाक़ हैं। एक और इत्तेफाक़ यह भी है कि पश्चिम बंगाल से ढाई दशकों के बाद बेदखल हुई सीपीएम के मुखिया प्रकाश करात आम आदमी पार्टी से बहुत खुश हैं। करात साहब ने कहा है कि आप ने वह कर दिखाया है, जो सीपीएम नहीं कर सकी। वह कम्युनिस्ट राजनीति से मध्यम वर्ग को जोड़ने की बात कर रहे हैं।

लेकिन केजरीवाल की अगुवाई में आप ने दिल्ली में कम से कम एक अद्भुत घटना की शुरुआत तो कर ही दी है, जो पूरी दनिया में कम्युनिस्ट पार्टियों के शासन का मुख्य तरीक़ा है। प. बंगाल में सीपीएम ने यही कर के 25 सालों तक सामाजिक आतंकवाद के साए में अपनी सत्ता कायम रखी। और अब दिल्ली उस कम्युनिस्ट वे ऑफ गवर्नेंस का अगला प्रयोगशाला साबित होने जा रही है।
कुछ घटनाओं पर ग़ौर फरमाइए। जब दिल्ली जल बोर्ड के सीईओ मुफ्त पानी योजना की घोषणा कर रहे थे, तब उनके ठीक बगल में आम आदमी पार्टी के बड़बोले नेता कुमार विश्वास बैठे थे। क्यों? वह सरकार की घोषणा थी, या पार्टी का कार्यक्रम था? 

मेरे एक मित्र जो इंडिया टुडे में रिपोर्टर हैं, उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट में लिखा है कि सरकारी विज्ञप्तियां आम आदमी पार्टी के कार्यालय से जारी की जा रही हैं। क्यों? सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने केंद्र सरकार की योजना राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत चल रही अस्पताल प्रबंधन सोसाइटीज, जिन्हें रोगी कल्याण समिति कहा जाता था, उन्हें भंग कर दिया है और अब अस्पतालों की जवाबदेही तय करने की जिम्मेदारी आप के कार्यकर्ताओं को दे दी गई है (इंडियन एक्सप्रेस न्यूजलाइन, 7 जनवरी)।

प्रदेश के कानून मंत्री सोमनाथ भारती सभी ज़िला जजों की बैठक बुलाना चाहते हैं। चलो मान लिया कि नए हैं, उन्हें पता नहीं था कि ये जज, सरकार को नहीं बल्कि दिल्ली हाई कोर्ट को जवाबदेह हैं। लेकिन मुख्य सचिव (कानून) ए एस यादव ने जब यही बात उनको बताई तो उनको गुस्सा आ गया और उन्होंने यादव को पुराने शासन का पैरोकार करार कर उनके खिलाफ मीडिया में बयानबाज़ी शुरू कर दी। शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने 120 आप कार्यकर्ताओं की टीम तैयार की है, जिसने कल सरकारी स्कूलों का निरीक्षण किया (टाइम्स ऑफ इंडिया, 8 जनवरी)।

यह शासन का वही तरीक़ा है, जो हमने प. बंगाल में 25 साल तक देखा है। इस तरह के शासन में डीएम, पार्टी के ज़िला अध्यक्ष; बीडीओ, पार्टी के ब्लॉक अध्यक्ष; कमिश्नर (राज्यों में डीजीपी) पार्टी के राज्य अध्यक्ष इत्यादि के प्रति जवाबदेह होते हैं। लोगों को अपनी दैनिक शासकीय ज़रूरतों के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं के पास जाना होता है। किसी मोहल्ले की पार्टी इकाई तय करती है कि उस मोहल्ले में बनने वाले मकान के लिए ईंट, सीमेंट, बालू और सरिये किस दुकान से खरीदे जाने चाहिए। पार्टी इकाई ही किसी जगह होने वाले स्थानीय निर्माण के ठेके पर फैसला करती है और वही राशन कार्ड से लेकर वोटिंग कार्ड बनवाने के लिए सिंगल विंडो का काम करती है।


पिछले दो हफ्तों में आम आदमी पार्टी का शासन देखने के बाद मुझे अब यह साफ समझ में आने लगा है कि जिन मोहल्ला समितियों को सारे फंड और अधिकार देकर सत्ता के विकेंद्रीकरण का मॉडल अरविंद केजरीवाल साहब ने पेश किया है, उसका स्वरूप दरअसल क्या होने वाला है। भ्रष्टाचार विरोध का मुखौटा लगाकर कम्युनिस्ट शासन ने जिस तरह दिल्ली में अपना झंडा गाड़ा है, वह ख़तरनाक और डराने वाला है। उम्मीद की किरण केवल यह है कि दिल्ली, प. बंगाल नहीं है और इसलिए आप के कम्युनिज्म से समाजवाद का मुखौटा उतरने के लिए शायद ढाई दशकों का इंतज़ार नहीं करना होगा। 

बुधवार, 1 जनवरी 2014

‘आप’ अब आंदोलन नहीं, पार्टी है

ये आम आदमी पार्टी की नहीं, आम आदमी की जीत है... यह राजनीति के संस्कारों की शुद्धि का प्रारंभ है... ये भारत में एक नई क्रांति का सूत्रपात है...
ये जुमले हैं, जो आजकल दिल्ली की राजनीति के जरिए देश पर छाने को बेताब हैं। आम तौर पर ऐसा ही होता है कि जब शोर इतना हो, तो आपके सच का पिटारा नितांत अप्रासंगिक लगने लगता है। लेकिन मुझे इससे क्या कि आप सुनें या न सुनें... दिल का हाल सुने दिलवाला, सीधी सी बात, न मिर्च मसाला। तो हम तो कहेंगे, आप अगर आज नहीं सुनेंगे, तो कल आएंगे, पलट कर सुनने के लिए।

आम आदमी पार्टी की जीत के शोर में सब बौराए हैं। मेरे कई मित्र कह रहे हैं, भाई इनको थोड़ा टाइम तो दो। अभी तो ये आए हैं, अगर कुछ शुरू किया है, तो उसका परिणाम तो दिखे। सही है... लेकिन दोस्तों समय नहीं है। ये मैं नहीं कह रहा... अरविंद केजरीवाल भी कह रहे हैं। समय नहीं है। बस 100 दिन बचे हैं लोकसभा के चुनावों में। अगर उससे पहले हम न समझे, तो फिर समझ कर क्या होगा।

पिछले 7 दिनों में आप और अरविंद केजरीवाल के बारे में बहुत सी बातें साफ हो गई हैं। दिक्कत केवल यह है कि मीडिया के जयकारे में वे साफ बातें भी इतनी धुंधली दिख रही हैं कि दिमाग उनको मानने को तैयार नहीं है। बिजली और पानी पर आम आदमी पार्टी के वादों की बात हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी ने 72 घंटे के भीतर दोनों वादे पूरे कर दिए। लेकिन क्या यह पार्टी सत्ता में केवल इन्हीं वादों के कारण आई थी? क्या देश में इसे लेकर जो जिज्ञासा और उत्साह पैदा हो रहा है, वह केवल इन्हीं वादों के कारण है?

दरअसल आप ने अपनी पोजिशनिंग राजनीतिक पार्टी के तौर पर की ही नहीं थी। यह एक आंदोलन था, जिसने तंत्र की शुचिता की बात की। वीआईपी कल्चर खत्म हो, सिस्टम का भ्रष्टाचार खत्म हो, सिस्टम को सिरे से बदला जाए- जैसे नारों ने लोगों को एक ताजी राजनीतिक धारा की उम्मीद बंधाई क्योंकिं लोकलुभावने वादे और सरकारी खजाने को लुटा कर रॉबिन हुड बनने वाले वादे भारतीय राजनीति में नए नहीं हैं।

अब देखिए, 28 दिसंबर को आप सरकार के शपथ लेने के बाद से क्या हो रहा है। थोक में प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले किए गए, जैसा कि हर सत्ता परिवर्तन पर होता है। साफ है कि इन तबादलों का भ्रष्टाचार या कार्यकुशलता से कोई लेना-देना नहीं था, बल्कि ये केजरीवाल साहब के एक पसंदीदा अधिकारी (जिन्हें उन्होंने पद संभालते ही अफसरशाही की सबसे ऊंची कुर्सी दी है) की सिफारिशों पर किए गए। लाल बत्तियों पर रोक लग गई... बहुत अच्छा, लेकिन क्या इतने से वीआईपी कल्चर खत्म हो जाएगा। नियम तोड़ने पर अपने बाप, भाई, मामा, ताऊ की धौंस देकर पुलिस पर रोब गांठने वाले क्या लाल बत्ती से चलते हैं? सचिवालय से सुरक्षा हटा ली गई। अगले दिन फिर समझ में आया कि गड़बड़ हो गई, तो ऐसी सुरक्षा हुई कि मीडिया तक को अंदर जाने से रोक दिया गया।

अब देखें, दो सबसे बड़े वादे, जिन्हें 72 घंटों में पूरा कर इतिहास रचा गया है। पहले पानी की बात। दिल्ली में पानी को लेकर समस्या क्या है? पानी का महंगा होना... पानी का नहीं होना? 37 लाख घरों में से करीब 17.5 लाख घरों में पानी नहीं आता। ये घर ग़रीब है, अनधिकृत कॉलोनियों में बने हैं या फिर झुग्गियों में हैं। वहां रोज टैंकरों से पानी आता है, जिससे अपना हिस्सा पाने के लिए वहां के बाशिंदों को गाली-गलौच, झगड़े और संघर्ष से रोज़ जूझना पड़ता है। आप ने मुफ्त पानी का वादा किया था... दे दिया। लेकिन किसे? क्या जीके, फ्रेंड्स कॉलोनी, सीआर पार्क, गुलमोहर पार्क, नीतिबाग जैसे मोहल्लों में रहने वालों को मुफ्त पानी की जरूरत है?

दूसरा, बिजली। बिजली आधी कीमत में ही क्यों, मुफ्त भी दी जा सकती है। सवाल यह है कि इसका मॉडल क्या है। क्या सब्सिडी पर कोई चीज़ फ्री देना समस्या का समाधान है... या वह आज की समस्या को कल पर टालना है। फिर सब्सिडी का राजस्व, जनता के टैक्स से ही वसूला जाता है। तो आखिर उसका बोझ तो जनता पर ही आना है।

अब मेरे कुछ मित्रों का कहना है कि बाकी काम तो धीरे-धीरे ही हो सकते हैं, ये सारी बातें तो बस केवल आलोचना के लिए आलोचना करना है। बिलकुल सही बात है, मैं सहमत हूं। लेकिन सरकार बनने के बाद से आप नेताओं और अरविंद केजरीवाल के बयान सुनिए, प्राथमिकताएं देखिए। मेट्रो से शपथ ग्रहण में जाने का ड्रामा कर पहले केजरीवाल जी ने साबित किया कि वह गांधी या पटेल नहीं, बल्कि लालू या मायावती लीग के नेता ज्यादा हैं, जिसे अपने प्रचार प्रोपैगैडा के आगे राष्ट्रीय संपत्तियों के नुकसान और उसकी सुरक्षा से कोई खास सरोकार नहीं है। फिर लाल बत्ती हटाने के बाद, उन्होंने कोई ऐसे संकेत नहीं दिए कि वह वीआईपी संस्कृति का गला घोंटना चाहते हैं, न ही उन्होंने पुलिस या बाबुओं को ऐसा कोई संदेश दिया।

मुफ्त पानी की घोषणा के साथ या बाद, कहीं पाइपलाइन बिछाने की जल्दबाजी या प्राथमिकता नहीं दिखी... सब्सिडी से बिजली सस्ती करना तो उसी लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा है, जो कांग्रेस, बीजेपी, सपा या अन्नाद्रमुक अपने-अपने राज्यों में कर रहे हैं। सब्सिडी किसी नेता के पिताजी के खाते से नहीं आती, जनता से ही वसूली जाती है। हां, कुल मिलाकर एक कदम जो अब तक आप सरकार ने वास्तव में सिस्टम के तौर पर आम आदमी के हित में उठाया है, वह है दिल्ली-यूपी के बीच ऑटो कनेक्टिविटी देना। लेकिन यह भी देखिए, तो प्रशासनिक फैसला ही है।

दिल्ली के करीब 60-70 हजार लोग इस भीषण ठंड में आसमान के नीचे सो रहे हैं। क्या दिल्ली सरकार
को तुरंत कुछ नहीं करना चाहिए। मनीष सिसोदिया ने दौरा किया, आश्वासन दिया कि जल्दी ही कुछ करेंगे। जल्दी... मतलब, कब? कुछ तो कर सकते हैं आप, जैसे, मेरे विचार से रात 10 से सुबह 6 बजे तक दिल्ली के सारे सब-वे उन्हें सोने के लिए दिए जा सकते हैं। कम से कम दो-तीन हफ्ते, जब तक यह जानलेवा सर्दी कम नहीं हो जाती। 200-300 लोग होंगे, तो अपराध की आशंका भी जाती रहेगी, जिसके कारण फिलहाल उन्हें रात में बंद रखा जाता है। कुछ तो करिए। लेकिन क्योंकि आपने इसका चुनावी वादा नहीं किया, तो शायद मीडिया में इसे इतना कवरेज न मिले। इसलिए आप इस पर कुछ नहीं करेंगे।

मेरे कहने का मतलब केवल यह है कि आम आदमी पार्टी ने एक आंदोलन के जरिए सिस्टम को बदलने के नारे के साथ जो शुरुआत की थी, वह अब विशुद्ध वोट खींचू राजनीति में बदल चुकी है। सुराज और स्वराज की जगह चुनावी उन्माद पैदा करने की रणनीति ने ले लिया है। एक आंदोलन के तौर पर आम आदमी पार्टी की मौत हो चुकी है, अब देखना है कि एक राजनीतिक दल के तौर पर इसकी जिंदगी कितनी लंबी चलती है।


केजरीवाल साहब को समर्पित

नेता, बड़ा नेता और महान नेता – इन तीनों में क्या अंतर है? नेता वह है जो एक खास समय में एक खास मुद्दे पर एक निश्चित समाज को नेतृत्व देता है, बड़ा नेता वह है जो एक लंबे समय तक कई छोटे और बड़े मुद्दों पर कई समूहों के समाज को नेतृत्व देता है और महान नेता वह है जो अपने जीवन के बाद भी भौगोलिक सीमाओं के परे जाकर लोगों को विभिन्न समस्याओं से जूझने का समाधान, प्रेरणा देता है।

तो कोई नेता, कैसे बड़ा नेता और फिर महान नेता बन जाता है- कैसे? क्या मैकेनिज्म है इस विस्तार का? कई विचार हो सकते हैं, शोध भी हो सकता है और किताबें भी लिखी जा सकती हैं। लेकिन एकदम संक्षेप में इसका जवाब यह है कि कोई व्यक्ति अपने समाज से जितना ज्यादा जुड़ता चला जाता है, उसकी व्यापकता और प्रभाव उतना ही बढ़ता चला जाता है। लेकिन फिर इसी प्रक्रिया में उस व्यक्ति का सेल्फ डिस्ट्रक्शन मैकेनिज्म (आत्मघाती तंत्र) भी विकसित हो जाता है। व्यक्ति समाज से जुड़ता है, फिर बड़ा बन जाता है और फिर इतना बड़ा बन जाता है कि समाज से कट जाता है। फिर उसे समझ ही नहीं आता कि समाज क्या चाहता है, उससे क्या उम्मीद करता है या समाज में कौन सी धारा बह रही है। ऐसा क्यों होता है?

दरअसल व्यक्ति के समाज से जुड़ने और पहले नेता, फिर बड़ा नेता बनने के साथ ही उसके पास सत्ता और ताकत भी आते हैं। फिर उस सत्ता से लाभ उठाने की इच्छा रखने वाले उससे जुड़ते हैं। ये लोग फिर समाज और नेताजी के बीच एक बफर जोन, फिल्टर जोन बना देते। फिर नेताजी वही सुनते हैं, जो ये लोग सुनाना चाहते हैं और वही देखते हैं, जो ये लोग दिखाना चाहते हैं। नेताजी के इर्द-गिर्द इतना सघन आवरण तैयार हो जाता है कि उनकी ग्रोथ खत्म हो जाती है। फिर नेताजी, बड़े नेता नहीं बन पाते और जो बड़े नेता बन गए वे कभी महान नेता नहीं बन पाते। गांधी, मंडेला, मार्टिन लूथर जैसे महान नेताओं, मोदी, लालू और मायावती जैसे बड़े नेताओं और हजारों छोटे नेताओं की जिंदगियों में यह प्रक्रिया आराम से देखी जा सकती है।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

ये भूत तो झाड़ू से ही भागेगा साहब, बंदूक से नहीं

मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखने वाले दिल्ली में आप की सरकार बनने के बाद एकदम अधीर हो गए हैं। एकाएक उन्हें लगने लगा है कि मोदी की दाल में केजरीवाल की मक्खी ने सारा खेल खराब कर दिया है। सच भी है, मीडिया का हाल देखिए। पूरा माहौल बदल गया है। लेकिन, राजनीति का हाल  भी क्रिकेट की तरह ही है। अंतिम बॉल तक हार-जीत बाकी रहती है। हां, ये ज़रूर है कि अंतिम बॉल पर हार के जबड़े से जीत खींचने वाली टीमें कम से कम वैसा बदहवास नहीं होतीं, जैसे नितिन गडकरी टाइप के लोग हो रहे हैं।

केजरीवाल के दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही गडकरी ने जिस तरह के बयानों का सिलसिला शुरू किया है, उससे मुझे शक होने लगा है कि उन्होंने मोदी की नैया डुबाने के लिए नई रणनीति तैयार कर ली है। अगर ऐसा नहीं है, तो इसका दूसरा मतलब यह है कि देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी का पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एक राजनीतिक नौसिखुआ है, जो अपने ही गोलपोस्ट में गोल करने पर आमादा है। गडकरी लोगों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि एक उद्योगपति ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच समझौता करा दिया है। यह आरोप सच है या झूठ, पता नहीं- लेकिन मूर्खतापूर्ण और राजनीतिक आत्मघात का एक नमूना है, इसमें कोई दो मत नहीं। 

केजरीवाल भ्रष्ट हैं – यह उनको वोट देने वाली 25 लाख जनता इसलिए नहीं मान लेगी कि ऐसा नितिन गडकरी कह रहे हैं। और न ही पूरे देश में केजरीवाल को लेकर पैदा हुई जिज्ञासा इससे शांत हो जाएगी। उलटा होगा यह कि आप को वोट देने वाले ऐसे लाखों मतदाता जो अब तक विधानसभा में केजरी, लोकसभा मे मोदी का नारा लगाते रहे हैं, पूरी तरह केजरीवाल के पीछे लामबंद हो जाएंगे। मोदी का विरोध करने वाले, चाहे वे वामपंथी हों या मुसलमान- उन्हें केजरीवाल के रूप में एक सशक्त विकल्प मिला है, जिसके पीछे अपनी पूरी ताकत लगाकर वे मोदी को रोकना चाहेंगे। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को अपनी रणनीति उन मतदाताओं पर केंद्रित करनी चाहिए, जिनके लिए केजरीवाल मोदी के विरोध का जरिया मात्र नहीं, बल्कि एक नई राजनीति की उम्मीद हैं। 

ऐसे मतदाताओं को यह समझाया जा सकता है कि केजरीवाल को लोकसभा में वोट देना परोक्ष रूप से सोनिया गांधी, मुलायम, लालू जैसी ताकतों को मजबूत करने जैसा ही है। देश के युवा मतदाताओं को मोदी के लिए खड़ा करने की रणनीति उस तरह की नकारात्मक प्रोपगैंडिस्ट राजनीति से नहीं तैयार हो सकती, जो गडकरी कर रहे हैं। हो सकता है वह केजरीवाल से अपनी निजी दुश्मनी निकाल रहे हों क्योंकि उनकी कंपनी पूर्ति में घोटाले की खबरें उछाल कर केजरीवाल ने दरअसल दूसरी बार उनके पार्टी अध्यक्ष बनने की संभावनाओं में पलीता लगा दिया था। लेकिन ऐसा कर के दरअसल वह मोदी की संभावनाओं में पलीता लगा रहे हैं और केजरीवाल के पक्ष में उस समूह की लामबंदी का रास्ता भी तैयार कर रहे हैं, जो कम से कम अभी तक मोदी या केजरीवाल की उधेड़बुन में फंसा हुआ है। 

गडकरी हों या मोदी, उन्हें समझना होगा कि केजरीवाल के भंवर जाल से निकलने के लिए सकारात्मक राजनीति की जरूरत है, क्योंकि केजरीवाल की राजनीतिक पैदाइश ही उस नकारात्मक राजनीतिक की देन है, जो अब तक देश में होती रही है। अरविंद केजरीवाल गैर पारंपरिक राजनीति के धुरंधर हैं, उन्हें गैर पारंपरिक राजनीति से ही शिकस्त दी जा सकती है, न कि थके हुए और सड़ांध मारते राजनीतिक हथकंडों से। बाकी काम तो उनके वादे खुद ही कर देंगे। आप का भूत झाड़ने के लिए झाड़ू ही चलाना होगा, बंदूक से काम नहीं चलने वाला।

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

थके-हारे वामपंथ की आखिरी उम्मीद हैं केजरीवाल

आम आदमी पार्टी की दिल्ली में जीत के बाद राजनीति में बदलाव की चर्चा अपने चरम पर पहुंच चुकी है। चर्चा पहले भी हो रही थी, लेकिन उसमें कुतूहल था, उम्मीद की बातें थीं और एक सकारात्मकता (पॉजिटिविटी) थी। मगर अब इस चर्चा ने अपना रूप बदल लिया है। सोशल मीडिया हो या सोशल गॉसिपिंग – अब चर्चा का माहौल गरम है। सकारात्मकतका की जगह नकारात्मकता ने ले ली है। जो समर्थक हैं वे अपने इरादों, नीयत और निष्ठा की बात कम और विरोधियों के इरादों तथा नीयत की बात ज्यादा कर रहे हैं। जो विरोधी हैं, वे तल्ख हो चुके हैं और ईमानदार पार्टी की नैतिकता में किसी भी छेद को नज़रअंदाज करने के मूड में नहीं हैं। आखिर ये बदलाव हुआ क्यों है और इसके राजनीतिक मायने क्या हैं?

दरअसल इसे समझने के लिए आप के राजनीतिक समर्थकों और विरोधियों को समझना होगा। आप ने भ्रष्टाचार उन्मूलन को अपना मुख्य राजनीतिक नारा बनाया और यही उसकी विचारधारा भी बनी। अब भ्रष्टाचार के विरोध से भला किसे विरोध हो सकता है। तो, एक तरह से देखा जाए तो दिल्ली चुनाव के परिणाम आने से पहले आप के विरोधियों की लिस्ट खाली और निस्तेज सी थी। कांग्रेस और भाजपा से जुड़े लोग, जिनकी सत्ता में सीधी हिस्सेदारी की संभावना आप के कारण धूमिल हो रही थी, केवल वही आप का तीव्र विरोध कर रहे थे। लेकिन आम लोग, चाहे वे कांग्रेसी हों, दक्षिणपंथी हों या फिर वामपंथी- आप के मौन और मुखर समर्थन में थे। तो विरोध कहीं बहुत तल्ख और गर्म स्वरूप में हमारे सामने था ही नहीं। स्वयं आप के आंतरिक सर्वे में कहा गया कि उसके 31 फीसदी समर्थक नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं। एक सामान्य समझ यही बनी कि आप के युवा समर्थक विधानसभा में केजरीवाल और लोकसभा में मोदी के झंडाबरदार बनेंगे। तो स्वाभाविक तौर पर मोदी के दक्षिणपंथी समर्थकों ने बढ़चढ़ कर अपना समर्थन जताया। 

दूसरी ओर, वामपंथियों को पहली बार लगा कि गैर कांग्रेसी, गैर भाजपाई कोई ऐसी धारा इस देश में खड़ी की जा सकती है, जिसे जनता का समर्थन मिल रहा है। ऐसे में उन्होंने भी अपना पूरा जोर केजरीवाल के पक्ष में लगाया। लेकिन चुनाव परिणाम आते ही स्थितियां कुछ बदल सी गईं।

चुनाव परिणाम आने के साथ ही केजरीवाल के दक्षिणपंथी समर्थक सकते में आ गए। उन्हें लगा कि केजरीवाल के साए ने मोदी को अपनी परछाईं में समेट लिया है। कल तक जो लोग केजरीवाल को केवल दिल्ली विधानसभा की घटना मान रहे थे, उन्हें लगने लगा कि अब यह घटना मिशन मोदी की राह में आने लगी है। वे तिलमिलाए और उन्होंने केजरीवाल की आलोचनात्मक समीक्षा शुरू कर दी। दूसरी ओर, इसी संकेत ने वामपंथियों में नई जान फूंक दी। पश्चिम बंगाल से भी उखड़ने के बाद वामपंथ भारत में वैसे ही कैंसर रोग का मरीज बना हुआ है। सबसे आशावादी वामपंथी में देश में चुनावी सफलता पाने का सपना नहीं देखता और इसीलिए वामपंथ की पूरी राजनीतिक रणनीति केवल कांग्रेस, लालू जैसी ताकतों के साथ चिपक कर खुद को प्रासंगिक बनाए रखने तक सीमित रही है। 

उनका राजनीतिक दर्शन केवल और केवल भारतीय जनता पार्टी को रोकना है और 2 महीने पहले तक मोदी के सामने वे पस्त हो चुके थे। धूलधूसरित कांग्रेस से उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी और इसलिए मोदी को रोकने के लिए वे किसी चमत्कार की ही उम्मीद कर सकते थे। अरविंद केजरीवाल वही चमत्कार बनकर उनके सामने आए हैं। वामपंथियों को एकाएक फिर यह उम्मीद जग गई है कि मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोका जा सकता है। और इसलिए दक्षिणपंथियों की हर आलोचना, हर  समीक्षा पर वे टूट पड़ रहे हैं। तो स्वाभाविक है कि यह चर्चा गर्म और तल्ख हो गई है। लोकसभा चुनावों तक इसमें नरमी आने की संभावना भी नहीं है। 

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

एक बहादुर ज़िंदगी की गुमनाम मौत

आज सुबह उस बहादुर लड़की की अंत्येष्टि की कहानी और उससे जुड़ी घटनाएं पढ़ते हुए अनायास ही मेरे दिमाग में कुछ दिनों पहले की इसी तरह की कहानियां ध्यान में आ गईं, जो मुंबई हमलों के एकमात्र ज़िंदा पकड़े गए आतंकवादी को फांसी दिए जाने के बाद अख़बारों में आई थीं। 3.30 बजे सुबह निर्भया (उस लड़की के लिए दिया गया एक छद्म नाम) का शव सिंगापुर से आया। 7.30 बजे उसकी अंत्येष्टि कर दी गई।

उसकी मां चीख-चीख कर बेहोश होती रही कि मेरी बेटी को कुछ देर और मेरे पास रहने दो। लेकिन उस मां को अपनी बेटी को जी भर कर आखिरी बार देखने तक नहीं दिया गया। कांग्रेस सांसद महाबल मिश्रा ने अपने उन्हीं लोगों के साथ, जो उनके लिए चुनावी संसाधन जुटाते होंगे, लड़की की अंत्येष्टि के लिए सामान जुटाए। महाबल निर्भया के पिता की 'मदद' कर रहे थे। लेकिन इस मदद की असलियत इस बात से ही उजागर हो जाती है कि निर्भया के शव को अग्नि देने के लिए सूर्योदय तक का इंतज़ार नहीं किया गया। टॉर्च की रोशनी में आनन-फानन से अंतिम क्रिया कर दिया गया। अंतिम क्रिया कहां किया गया, यह भी गुप्त है।

ये खबरें, ये कहानियां हमारे लोकतंत्र पर एक थप्पड़ है। मैं सुबह से ही सोच रहा हूं सरकार की उस मानसिकता के बारे में, जिसके तहत यह किया गया। सरकारें कसाब और ओसामा बिन लादेन सरीखों के साथ ऐसा ही करती हैं ताकि उनकी तरह सोचने वालों के लिए वह सहेजने की जगह या याद न बन जाए। लेकिन निर्भया न क़साब थी, न ओसामा (अमेरिकी सरकार ने कुछ ऐसा ही किया था। फिर सरकार ने ऐसा क्यों किया? दरअसल क़साब या ओसामा का नाम हमारे ज़हन में इसीलिए आता है कि हम मानते हैं कि यह सरकार हमारी है।

लेकिन क्या यह सरकार भी मानती है कि हम उसके हैं? हां, वह हमें अपनी प्रजा ज़रूर मानती है, लेकिन अपना नहीं मानती। ठीक उसी तरह जैसे अंग्रेज हमें अपनी प्रजा ज़रूर मानते थे, लेकिन अपना नहीं मानते थे। इसीलिए भगत सिंह को जब फांसी दी गई, तो ऐसे कि किसी को पता न चले। उनके शव को आनन-फानन में जलाया गया। क्या इसलिए कि अंग्रेज भगत सिंह की निजता का सम्मान करते थे? निर्भया देश की नवोदित युवा क्रांति की प्रतीक बन चुकी है। और यह सरकार नहीं चाहती कि इस क्रांति को कोई चेहरा मिले।

सरकार दरअसल निर्भया की निजता नहीं, इसी क्रांति के प्रतीक को छिपाना चाहती है। वह नहीं चाहती कि नेहरुओं और गांधियों को टक्कर देता कोई ऐसा स्मारक भी खड़ा हो जाए, जो जनता का हो। यह बलात्कार की शिकार किसी आम लड़की की कहानी नहीं है, जिसे सामाजिक अपमान और क्लेश से बचाने के लिए निजता के नियम को बनाया गया है। उस लड़की के सभी संबंधी उसे जानते हैं, उसका गांव, उसका मोहल्ला उसको जानता है।

फिर यह सरकार किससे उसकी पहचान को छिपाना चाहती है? एक मिनट के लिए मान लीजिए कि उस लड़की का नाम राधा था। आप जान गए कि उस लड़की का नाम राधा था, तो उसकी निजता कैसे खंडित हो सकती है? आप तो उसे पहले भी नहीं जानते थे और अब भी नहीं जानते। यह जनता को बेवकूफ बनाने के लिए गढ़ा गया सिद्धांत है, जिसमें मीडिया को भी शामिल कर लिया गया है। उस बहादुर लड़की ने कोई पाप नहीं किया है कि उसकी पहचान छिपाया जाए।

इस क्रांति को सरकार कितनी हिकारत भरी नजर से देखती है, इसका प्रमाण पहले तो गृहमंत्री के उस मूर्खतापूर्ण बयान से मिला था, जब उसने कहा कि कल अगर गढ़चिरौली में 100 आदिवासी मारे जाएं तो क्या सरकार वहां बात करने चली जाएगी और दूसरा सबूत प्रधानमंत्री के उस घड़ियाली संदेश से मिला, जिसके खत्म होने के साथ ही उन्होंने कैमरामैन से पूछा कि उनका शॉट ठीक रहा कि नहीं। 12 दिनों तक देश का (क्योंकि दिल्ली में पूरा देश रहता है) युवा यहां-वहां मोमबत्तियां जलाता रहा, नारे लगाता रहा और वर्ल्ड कप की जीत के जश्न में भीड़ का हिस्सा बनने वाली सोनिया गांधी या उनके भावी प्रधानमंत्री बेटे में से कोई या उनका कोई विश्वस्त दरबारी एक बार भी उनके बीच नहीं आया। यह भी इस पूरे आंदोलन के प्रति इस सरकार की समझ का ही सबूत है।

यह सचमुच हमारा दुर्भाग्य है कि हम एक ऐसी सरकार की प्रजा हैं, जो लोकतंत्र की घोर अलोकतांत्रिक उपज है। इस विशुद्ध जनाक्रोश से निपटने के लिए इसकी प्रतिक्रिया देखिए। इंडिया गेट बंद कर देना, मेट्रो के 10 स्टेशनों को हर दूसरे-तीसरे दिन बंद करना, 1-2 जगहों को छोड़कर पूरी दिल्ली में 144 लगाना और दिल्ली पुलिस को लाठियां भांजने के लिए सड़कों पर उतार देना। लेकिन यह सरकार निश्चिंत है कि 2014 से पहले कैश सब्सिडी फेंक कर यह चुनाव जीत लेगी। 60 साल में हमारा लोकतंत्र इतना ही परिपक्व हुआ है कि पहले वोट के लिए दारू बंटती थी, अब नीतिगत टुकड़े फेंके जाते हैं। फिर क्या फ़िक्र, अंतिम लक्ष्य तो सत्ता ही है।

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

फांसी मांगकर इस सरकार को सेफ पैसेज मत दीजिए

बलात्कारियों को कड़ी सज़ा देने की मांग के साथ शुरू हुए आंदोलन में जिस एक भावना का सबसे उग्र प्रदर्शन हुआ है और हो रहा है, वह है पुलिस का विरोध। कल जिस तरह अलग-अलग जगहों पर आंदोलनकारियों ने दिल्ली पुलिस के कॉन्स्टेबलों की ओर थूका, रोड ब्लॉक कर रहे पुलिस के जवानों की ओर सिक्के उछाले और उन्हें नोट दिखा कर यह संकेत दिया कि आओ, इसी के तो भूखे हो तुमलोग। तो आकर ले जाओ अपनी बोटी और हमें जाने दो- वह दिखा रहा है कि अन्ना के आंदोलन में जो घृणा, जो नफ़रत नेताओं के खिलाफ दिखी थी, कुछ उसी तरह का माहौल इस आंदोलन में पुलिस के खिलाफ़ दिख रहा है।

इस गैंगरेप ने देश को एक बेहतरीन मौक़ा दिया है। मौक़ा व्यवस्था परिवर्तन का। एक बार फिर हमें वही बेवकूफ़ी नहीं करनी चाहिए, जो अन्ना आंदोलन ने की। बलात्कारियों को फांसी तो दीजिए, लेकिन इसका आधार क्या होगा? सबूत और पुलिस का आरोप पत्र। लेकिन अगर पुलिस जांच ही नहीं करे, पैसे खाकर सबूत ही नष्ट कर दे, आरोप पत्र ही न दाखिल करे, तो?

हत्या के लिए फांसी होती है, तो कितनों को फांसी हुई अब तक! 6 महीने और साल भर की बच्चियों का बलात्कार कर हत्या कर देते हैं शैतान- तो क्या यह रेयरेस्ट ऑफ द रेयर केस नहीं है? तो उनमें आरोपियों को फांसी क्यों नहीं होती? उसके लिए तो किसी कानून में बदलाव या संविधान में संशोधन की भी ज़रूरत नहीं। जब देश में 54 फीसदी बलात्कार के मामले पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते और जो पहुंचते हैं उनमें 97 फीसदी के आरोपी 24 घंटे भी जेल में बंद नहीं रहते, तो साफ है कि गड़बड़ी कानून में नहीं, नीयत में है।

यह मौक़ा केवल फांसी की सज़ा मांगने का नहीं, पूरी पुलिस व्यवस्था में सुधार की मांग उठाने का है। सुप्रीम कोर्ट के कई प्रयासों के बाद पुलिस सुधार लागू होने की कोई गुंजाइश नहीं बन रही। इसलिए की राजनीति पुलिस को अपने टूल के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है। हमें यह याद रखना चाहिए कि यह वही आईपीएस और आईएएस सेवाएं हैं, जिनका गठन अंग्रेजों ने भारतीयों का खून चूसने के लिए किया था।

यह वही पुलिस व्यवस्था है, जिसे भारतीयों को ग़ुलाम बनाए रखने के हथकंडे सिखाए गए थे। इसीलिए ब्रिटेन की पुलिस और भारत की पुलिस में इतना अंतर है। अंग्रेजों ने ब्रिटेन की पुलिस को अपने लोगों की सेवा के लिए बनाया, जबकि भारत की पुलिस को यहां के लोगों पर शासन करने के टूल के तौर पर खड़ा किया। गठन का यह विज्ञान भारत की पुलिसिया व्यवस्था में अब तक उसी तल्खी के साथ दिखता है। इस बदलने का समय आ गया है। पुलिस सुधार तुरंत लागू करने की ज़रूरत है। केवल बलात्कारियों को लिए फांसी का प्रावधान कर इन नेताओं को, इस सरकार को बचने का रास्ता मत दीजिए।

इस पूरे आंदोलन के खिलाफ़ जिस तरह सरकार अपना मुंह चुराती नज़र आ रही है, वह इस बात का सबूत है हम एक ऐसी सरकार के शासन में रह रहे हैं, जो केवल लाल बत्तियों की कारों, एयर कंडीशंड मीडिंग हॉल्स और एसपीजी के सुरक्षा घेरों से शासन करना जानती और चाहती है। ऐसी सरकार की पुलिस से केवल ऐसे ही व्यवहार की उम्मीद की जा सकती है, जो उसने कल दोपहर बाद और शाम को इंडिया गेट पर दिखाया। शांतिपूर्ण तरीक़े से बैठी लड़कियों पर लाठियां भांजी गईं और कड़ाके की ठंड में युवाओं पर पानी की बौछारें छोड़ी गईं। मेट्रो का इंडिया गेट के आसपास के 9 स्टोशनों को बंद करने का फैसला इस डरी हुई बहरी सरकार की चरम मूर्खता का ही संकेत है।

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

पुलिस और राजनीति भी तो हमारे ही हैं

एक लड़की के साथ हुई दरिंदगी से पूरा देश उबल रहा है। मुझे पूरा भरोसा है कि इस उबाल में उन कुछ लोगों का खून भी खौल रहा होगा, जो उस दुर्भाग्यपूर्ण रविवार की रात को उस रास्ते से गुज़रे थे। उन्होंने उस लड़की और उसके दोस्त की खून से लथपथ काया देखी थी, उन तीन फरिश्तों की पुकार सुनी थी, जो उन्हें बचाने की जद्दोज़हद कर रहे थे। वे लोग भी ज़रूर आज टीवी के सामने बैठ कर अपनी बेटियों और बहनों के सामने इस हैवानियत पर पुलिस, नेताओं और उन शैतानों पर गालियों की बारिश कर रहे होंगे। कौन थे ये लोग? क्या अधिकार है इनको किसी और को गाली देने का? और वही लोग क्यों, मैं या आप अगर उसी रास्ते से उस दिन गुज़र रहे होते, तो हमने क्या रुक कर उन दोनों को अपनी गाड़ी से अस्पताल पहुंचाया होता? इन सवालों के जवाब केवल हम ख़ुद ही दे सकते हैं।

लेकिन मेरे मन में यह सवाल है कि जब तक हम ऐसे हैं, तब तक पुलिस या राजनीति कैसे बदल सकती है? यह पुलिस, यह राजनीति भी तो हमारा ही हिस्सा है। हमारे ही लोग हैं। मुझे लगातार यही लग रहा है कि देश भर में आक्रोश से भरी आवाज़ों में मूल मुद्दा कहीं खो सा गया है। मुझे ऐसा लगता है कि अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की तरह ही यह जनांदोलन भी शुरू से ही अपना लक्ष्य भटक-सा गया है। अन्ना ने अपने आंदोलन का आधार जन लोकपाल को बना लिया, मानो जन लोकपाल के बनते ही देश में हर व्यक्ति साधु हो जाएगा, पैसे की ताक़त ख़त्म हो जाएगी और उपभोक्तावाद की मौत हो जाएगी। दिल्ली में हुए गैंगरेप पर हो रही पूरी बहस भी केवल अपराधी के लिए फांसी और कानून-व्यवस्था के मसले के रूप में सीमित हो गई है।

बलात्कार कानून-व्यवस्था का मसला कम और सामाजिक व्यवस्था का ज़्यादा है। बलात्कारियों को फांसी देना या लिंगच्छेदन कर देना या रासायनिक बधियाकरण कर देना जैसी सज़ाओं पर ज़रूर विचार होना चाहिए। लेकिन पिछले केवल हफ्ते भर में जिस तरह तीन साल, पांच साल की बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं सामने आई हैं, उसमें दोषी को सज़ा देने से ज़्यादा बड़ा सवाल मुझे यह लगता है कि इस आक्रोश के बीच भी ऐसे मामले क्यों सामने आ रहे हैं? दोषी को सज़ा देने का मूल मक़सद भी यही है कि किसी और को उस शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से न गुज़रना पड़े, जो बलात्कार के बाद ज़िंदगी भर की सौगात होती है।

रेप, एब्यूज़ एंड इनसेस्ट नेशनल नेटवर्क (रेनन) के आंकड़े बताते हैं कि देश में होने वाले बलात्कार के कुल मामलों में से 66 फीसदी के आरोपी किसी न किसी रूप में पीड़ित के जानने वाले होते हैं और 38 फीसदी तो सीधे दोस्त या परिवार से जुड़ा कोई शख़्स होता है। तो आप पुलिसिया व्यवस्था को चुस्त कर कितने बलात्कार रोक लेंगे।

दूसरी बात, बलात्कार अनियंत्रित यौन इच्छा का चरम प्रकटीकरण है। तो क्या हमें उन कारकों के बारे में नहीं सोचना चाहिए, जहां से इस तरह की इच्छाओं को उठने से ही रोका जा सके। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि जिन देशों में शराब की कीमतें बढ़ाई गईं, वहां महिलाओं के खिलाफ़ अपराध में कमी आई है। इस बारे में कोई ठोस आंकड़ा नहीं है, लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 100 में से जिन 66 महिलाओं के साथ उनके किसी-न-किसी परिचित ने यौन उत्पीड़न किया, उनमें से कितनों ने शराब पी रखी थी या फिर शराब पीन के आदी थे। घर-घर में कंडोम के उत्तेजक विज्ञापन, फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता- क्या इन सबका ऐसी घटनाओं में कोई योगदान नहीं है? इन पर भी चर्चा होनी चाहिए।

कानून-व्यवस्था का मसला निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि रेनन के मुताबिक बलात्कार के आरोप में पकड़े गए आरोपियों में से 97 फीसदी 24 घंटे के भीतर जेल से बाहर आ जाते हैं। इस आंकड़े के साथ ही उस स्टडी के निष्कर्षों को भी जोड़ कर देखा जाना चाहिए जो तिहाड़ जेल में बंद बलात्कार के आरोपियों/दोषियों के बीच किया गया। ऐसा हर क़ैदी पुलिस के हत्थे चढ़ने से पहले कम से कम चार बार किसी-न-किसी का यौन उत्पीड़न कर चुका था। साफ है कि अगर हमारी पुलिस संवेदनशील हो जाए और कानून के छेद बंद हो जाएं तो हर बलात्कारी की शिकार बनी कम से कम तीन लड़कियां बचाई जा सकती थीं। यानी सिर्फ दिल्ली में इस साल अब तक जिन 600 महिलाओं को इस वेदना से गुज़रना पड़ा है, उनमें से 450 को बचाया जा सकता था।

लेकिन एक बार फिर पुलिस के साथ समाज का रवैया कटघरे में है। आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार के 54 फीसदी मामले तो पुलिस के पास जाते ही नहीं। ऐसा कुछ तो पुलिस की उदासीनता और कई मामलों में अपराधी के साथ मिलीभगत के कारण होता है और बहुत से मामलों में मां-बाप लड़की के भविष्य की चिंता करते हुए मामला दबा देना उचित समझते हैं। बलात्कार पीड़ितों के प्रति समाज का रवैया हमेशा से दोमुंहा रहा है। कई ऐसे मामले सामने आए हैं जब बलात्कार का शिकार हुई लड़की के परिवार को गांव या शहर तक छोड़ना पड़ गया है। तो हम कानून को जितना भी सशक्त कर लें, जब तक हमारा ख़ुद का रवैया नहीं बदलेगा, कोई फायदा नहीं होगा। इसको ऐसे समझें कि मान लें कि दिल्ली गैंगरेप के छहों आरोपियों को कल फांसी दे दी जाए। लेकिन जो लड़की इनकी दरिंदगी का शिकार हुई है, अगर उसे समाज जीने का अधिकार न दे, सम्मान न दे, एक सामान्य जीवन जीने का मौक़ा न दे- तो क्या फायदा इन छह को फांसी देने का। आख़िर तो हम इस लड़की की पूरी ज़िंदगी को उन दरिंदों के साए से नहीं उबरने देंगे न !

काटजू जैसे बहुत से लोग जिन्हें लग रहा है कि उनकी बहन, बेटी और बीवी घर की चहारदिवारियों में पूरी तरह सुरक्षित है, स्यापा कर रहे हैं कि मीडिया बेवजह इसे इतना ज़्यादा तूल दे रहा है। लेकिन इन बुद्धिजीवियों को यह समझ में नहीं आता कि यह आक्रोश एक दिन में पैदा हुआ आक्रोश नहीं है। और न ही ऐसा है कि ये आंदोलन समस्या के अंतिम समाधान का ब्रह्रास्त्र हैं। लेकिन जनांदोलनों का इतिहास और उनका मनोविज्ञान यही बताता है कि ऐसे आंदोलन लक्ष्य प्राप्ति की महत्वपूर्ण कड़ियां होती हैं। ऐसे कई जनांदोलनों से ही समाज अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकता है और ऐसे स्वतःस्फूर्त आंदोलन ही समाज के ज़िंदा होने का सबूत हैं।





शनिवार, 18 अगस्त 2012

मीडिया चुप है, नेता चुप हैं, हम 'ख़बर' देख रहे हैं

असम और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों के लोगों को देश भर से खदेड़ा जा रहा है। सरकार, नेता और मंत्री आश्वासनों की बरसात कर रहे हैं और समाज मूकदर्शक बन कर टीवी चैनल पर 'ख़बर' देख रहा है। कौन सा समाज ख़बर देख रहा है? और अगर समाज ख़बर देख रहा है, तो इन पूर्वोत्तर वासियों को धमकियां कौन दे रहा है और इन पर हमले कौन कर रहा है? इस सवाल पर सब चुप हैं।

मीडिया चुप है, नेता चुप हैं। होना लाज़िमी है। इसलिए कि हमला करने वाले 'कुछ भटके हुए नौजवान' हैं। ये कुछ मुट्ठी भर वही भटके हुए नौजवान हैं, जिन्होंने मुंबई के आज़ाद मैदान में 50,000 की संख्या में इकट्ठा होकर नंगा नाच किया। ख़बरिया चैनलों के ओवी वैन जलाए, अमर जवान ज्योति पर लातों और लोहे के रॉड से हमले किए। लेकिन इन मुट्ठी भर भटके हुए नौजवानों की पहचान क्या है? कौन हैं ये? इन्हें किस बात का गुस्सा है? और आख़िर में एक सवाल, यह घटना के सबक क्या हैं?

देश भर में फैले इन मुट्ठी भर नौजवानों को गुस्सा इस बात पर है कि असम में और म्यांमार में जो दंगे हुए हैं, उनमें मुसलमानों पर अत्याचार हुए हैं। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने हफ्ते भर पहले यह धमकी दी थी कि इन दंगों के कारण पूरे देश के मुसलमान युवक कट्टरवाद की ओर आकर्षित होंगे। असम में हुए दंगे बोडो हिंदू आदिवासियों और बंगलादेशी मुसलमानों के बीच के दंगे हैं।

यह कोई गुप्त तथ्य नहीं है कि आज असम में बंगलादेशी मुसलमान वहां की राजनिति को नियंत्रित करने लगे हैं, वहां के मूल निवासियों की आजीविका के लिए बड़ा ख़तरा बन चुके हैं और यहां तक कि उनकी ज़मीनों पर कब्ज़े कर रहे हैं। ये दंगे उसी का नतीजा हैं, जिनमें इस बात की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है जानोमाल के नुकसान के तौर पर किस पक्ष को कितनी क्षति हुई है। लेकिन पूरे देश के मुसलमानों में आक्रोश है। माफ़ कीजिए, मुट्ठी भर भटके हुए नौजवानों के मन में इस घटना को लेकर आक्रोश है। और उस आक्रोश का प्रकटीकरण यह है कि पूरे देश में पूर्वोत्तर के हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं, उन्हें धमकियां दी जा रही हैं।

कल ईद के पहले की आख़िरी नमाज थी, जिसे अलविदा नमाज कहते हैं। उत्तर प्रदेश के कई शहरों, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद सहित देश के कई दूसरे हिस्सों में भी इस नमाज के बाद इन मुट्ठी भर भटके हुए नौजवानों ने पथराव किए। किस पर किए, मैं नहीं समझ पा रहा हूं, क्योंकि एक बार फिर मीडिया इस सवाल पर चुप है।

लखनऊ, कानपुर या इलाहाबाद में पूर्वोत्तर के लोगों की बस्तियां तो हैं नहीं कि उन पर पथराव हुए। तो पथराव का निशाना कौन था? हां, यह ख़बर ज़रूर है कि इन भटके हुए नौजवानों ने लखनऊ के एक पार्क में टहल रही कुछ महिलाओं को घेर कर उनके कपड़े फाड़ दिए। यह तो ख़बर है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में और क्या कुछ हुआ होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है।

एक रहस्य और है। हमने आज तक यही सुना है कि नमाज ख़ुदा की इबादत है। यह भी कि पांच नमाजी मुसलमान सच्चा मुसलमान होता है और अल्लाह के ज़्यादा क़रीब होता है। फिर ऐसा क्यों होता है कि पथराव, गुंडागर्दी और आतंकवाद की ऐसी घटनाएं अक्सर नमाज के बाद ही होती हैं। ये मुट्ठी भर भटके हुए नौजवान जब नमाज के बाद निकलकर पथराव कर रहे थे, तो अधिसंख्य उदार, समन्वयवादी और धार्मिक सहिष्णुता की भावना से लबरेज मुस्लिमों ने उन्हें रोकने के लिए क्या किया?

सोचिए, मंदिर में 100 या 200 लोग आरती के लिए इकट्ठे हों, पूजा करें और फिर बाहर निकल कर महिलाओं को नोचने लगें, अपने पड़ोसियों पर पथराव करने लगें। कल्पना कर पाते हैं क्या आप इसकी? और अगर ऐसा हो तो, इस देश के हिंदू समाज (वामपंथियों और सेकुलरों को छोड़कर, क्योंकि उन्हें तो वैसे भी इस शब्द से ही दस्त और उलटियां शुरू हो जाती हैं) की प्रतिक्रिया क्या होगी?

और अब आख़िरी सवाल। इन घटनाओं का सबक क्या है? देश के एक हिस्से में भारतीयों और विदेशी घुसपैठियों के दो समूहों के बीच संघर्ष होता है। इस संघर्ष के मूल में कहीं भी इनकी अलग-अलग मज़हबी पहचान नहीं है, बल्कि इसका कारण जनसंख्या संतुलन का विदेशी घुसपैठियों के पक्ष में झुक जाना है। यह पूरी तरह से एक सामाजिक-आर्थक संघर्ष है। लेकिन क्योंकि विदेशी घुसपैठिए एक ख़ास मज़हब के हैं, इसलिए पूरे देश में उस मज़हब के लोगों को गुस्सा आ जाता है। और फिर वे पूरे देश में हिंदू पूर्वोत्तर वासियों को मारना और धमकाना शुरू कर देते हैं।

यह महत्वपूर्ण है। क्योंकि पूर्वोत्तर के जिन लोगों को धमकाया जा रहा है, मारा जा रहा है- वे बोडो जनजाति के नहीं हैं। लेकिन वे हिंदू हैं। असम का बंगलादेशी घुसपैठी पूरे देश के मुसलमानों का सगा है और बोडो हिंदू क्योंकि उनके प्रभुत्व का विरोध कर रहे हैं, तो पूर्वोत्तर का हर हिंदू उनका दुश्मन है। यह सबक उन वामपंथियों के लिए भी है, जो देश के आदिवासियों को हिंदू मानने से इंकार करते हैं।

काश, कि वे अपनी बात अपने कलेजे के टुकड़ों इन मुट्ठी भर भटके हुए नौजवानों को समझा पाते। ख़ैर, ये तो सबक तभी लेंगे, जब उनका भी नंबर आ जाएगा। लेकिन देखना है, बाकी का समाज समय रहते इससे सबक लेता है कि नहीं। उसकी कुम्भकर्णी नींद अब भी खुलती है कि नहीं?

बुधवार, 25 जुलाई 2012

वहशी और सफेदपोश नक्सलियों का गठजोड़

अगर आप इमानदार नहीं है, तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किसी की आलोचना कर रहे हैं या प्रशंसा। आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार वही निरीह जनता होती है, जिसके नाम पर उस कृत्य को सैद्धांतिक जामा पहनाया जाता है। कश्मीर, खालिस्तान, उल्फा और अब नक्सली- इन सबने सबसे ज्यादा खून और आंसू उन्हीं का बहाया है, जिनके नाम पर ये लडऩे का दावा करते हैं। लेकिन विडंबना देखिए, तमाम सेकुलर मानवाधिकारवादी और वामपंथी आतंकवाद के नाम पर केवल उनसे लडऩे वाले सुरक्षा बलों पर ही प्रहार करते हैं।

छत्तीसगढ़ में निरीह आदिवासी मारे गए। कैसे मारे गए? क्या पुलिस ने उन्हें घर में घुस कर मारा या थाने में लाकर मारा? खुफिया सूचना पर नक्सलियों को दबोचने जा रहे सुरक्षा बलों पर रात के अंधेरे में फायरिंग हुई और जवाबी कार्रवाई में ये आदिवासी मारे गए। इसलिए कि गोलियां चलाने वालों ने इन निरीह बेचारे आदिवासियों को ह्युमन शील्ड के तौर पर सुरक्षा बलों की गोलियों के सामने कर दिया। लेकिन यहां एक और महत्वपूर्ण एंगल है। अगर नक्सलियों को सुरक्षा बलों से लडऩा ही नहीं था, उन्हें नुकसान पहुंचाना ही नहीं था, तो उन पर गोली ही क्यों चलाई। क्या इसका देश भर में सेकुलर मानवाधिकारवादी और वामपंथी के विरोध प्रदर्शनों से कोई संबंध है? कहीं यह एक ही नक्सली खेल के दो हिस्से तो नहीं? खेल का पहला हिस्सा छत्तीसगढ़ के गांव में गरीब आदिवासियों को सुरक्षा बलों की गोलियों के आगे परोस कर खेला गया और अब दूसरा हिस्सा शहरों और बुद्धिजीवी संस्थाओं में मौजूदा सफेदपोश नक्सलियों द्वारा सुरक्षा बलों को खलनायक साबित कर खेला जा रहा है?

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

नई मस्जिद, पुरानी कहानी


कुछ दिन पहले मेरे एक मुसलमान पत्रकार परिचित (मित्र इसलिए नहीं लिख रहा क्योंकि अभी कुछ दिनों पहले मैंने फेसबुक पर उनको अनफ्रेंड कर ब्लॉक कर दिया है) ने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखा था, जिसकी पहली लाइन थी कि भारत का मुसलमान मंदिर के घंटे की तरह है, जिसे जो चाहे, जब चाहे बजा जाता है। उस पर चली बहस तीन दिन तक खिंची और अंत में इतनी गंदी और अमर्यादित हो गई कि उन सज्जन को अपनी पूरी पोस्ट ही डिलीट करनी पड़ी।

ख़ैर, मैंने उनके पोस्ट पर अपना जो प्रतिवेदन दिया था, उसका लब्बोलुआब यही था कि भारत के मुसलमानों को हर उस राजनेता को अपना असल दुश्मन मानना चाहिए जो उनकी गलत मांगों को प्रश्रय देकर उन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करता है। उन्हें मेरी बात नहीं समझ में आई, जैसा कि मेरा अनुमान था। अब फिर मैं अपनी बात वहीं से शुरू कर रहा हूं। दिल्ली में 200 करोड़ रुपए की लागत से पूरी तरह तैयार मेट्रो स्टेशन की खुदाई में एक मस्जिद के अवशेष मिले। दावा है कि यह मस्जिद औरंगजेब ने बनवाई थी।

तुरंत उस इलाके का मुस्लिम विधायक और वहां के इमाम, मुल्ले दिल्ली की मुख्यमंत्री के पास पहुंचे। अब इस देश की राजनीति में कहां इतनी हिम्मत कि वह मुसलमानों की किसी मांग पर उनसे उसका स्पष्टीकरण पूछने का साहस कर सके। तो तुरंत शीला दीक्षित ने उनको मस्जिद की पूरी सुरक्षा का भरोसा देते हुए डीएमआरसी को निर्देश दिया कि 200 करोड़ रुपए से तैयार मेट्रो स्टेशन को कहीं और शिफ्ट किया जाए। जैसे ये 200 करोड़ रुपए शीला जी के पिताजी ने उन्हें विरासत में दिए थे।

खैर, यह तो एक अध्याय था। दूसरा अध्याय। भारतीय पुरातात्विक विभाग ने उस इलाके को किसी भी निर्माण के लिए प्रतिबंधित कर दिया और एमसीडी (भाजपा प्रशासित) ने घोषणा की कि वह अपनी ज़मीन नहीं देगा। लेकिन इस देश का मुसलमान यहां के कानून से हमेशा ऊपर रहा है (अगर आपको याद हो तो वहीं जामा मस्जिद के इमाम ने अपने खिलाफ़ वारंट जारी करने वाले सुप्रीम कोर्ट को पागल क़रार दिया था और उसका बाल भी बांका नहीं हुआ)। इस देश की राजनीति मुसलमानों के पैरों पर लोटने वाली दासी रही है (तभी दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों के घर जाकर अपनी नाक रगड़ी थी)। सो, तमाम प्रशासन और कानून को धता बताते हुए मस्जिद के खंडहर का पुनर्निर्माण शुरू हो गया है। स्टील के ढांचे, क्रंक्रीट और सीमेंट से दीवारें खड़ी की जा रही हैं और पूरा प्रशासन नपुंसक हो गया है।

एक और मज़ेदार बात देखिए। कल ही एनडीटीवी ने घंटे भर का प्रोग्राम किया और महान पत्रकार बरखा दत्त ने अपने पेट पैनल के जरिए देश को यह बताने की कोशिश की कि इस देश में अल्पसंख्यक (मुसलमान पढ़ें) पूर्वग्रह और भेदभाव का सामना कर रहा है। उन्होंने एक मुस्लिम को केस हिस्ट्री बनाया था, जिसे स्पाइसजेट के विमान से उतार दिया गया था। सैनिक अधिकारी बताए जाने वाले उस मुस्लिम ने स्पाइसजेट पर उन्हें मुसलमान होने के कारण उतारने का आरोप लगाया। स्पाइसजेट का कहना है कि वह प्रतिबंधित इलाकों की तस्वीर उतार रहे थे और इसलिए उनका कैमरा लेकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि उन्होंने तस्वीर डिलीट कर दी है। उन्होंने क्रू के साथ बदतमीजी की और सहयोग करने से इंकार किया।

सच-झूठ का फैसला इंक्वायरी के बाद होगा, लेकिन सेकुलरिज़्म (मतलब हिंदू विरोध) के प्रति निष्ठावान एनडीटीवी ने यह घोषित कर दिया कि इस देश में मुस्लिम पीड़ित है। यह एक ख़तरनाक स्थिति है, जिससे देश के हर नागरिक को डरना चाहिए। उपर जिन मुस्लिम पत्रकार का मैंने ज़िक्र किया, उन्हें तकलीफ़ थी कि यहां मुसलमानों को किराए का मकान नहीं मिलता और कि आपस में लड़ने वाले हिंदू, मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक हो जाते हैं। मैं भी यह मानता हूं। बीमारी की पहचान आपने ठीक कर ली है, लेकिन सही इलाज से आप डरते हैं। भले ही कोई हिंदू लालू, मुलायम, सोनिया, दिग्विजय या शीला दीक्षित का वोटर हो, लेकिन यह खेल उसे भी अखर रहा है। देश की पूरी राजनीति को मुसलमानों के पैरों पर लोटते देख कर उनके अंदर पर भी प्रतिक्रिया हो रही है। और इसी कारण हर दिन इस देश के हिंदू के अंदर मुसलमानों के प्रति थोड़ी-थोड़ी घृणा और थोड़ा-थोड़ा गुस्सा भर रहा है।

इस स्थिति से केवल मुसलमानों को ही नहीं, हर हिंदू को भी डरना चाहिए। क्योंकि घृणा और हिंसा हिंदू समाज का मूल संस्कार नहीं है। लेकिन इतिहास गवाह है कि समाज का गठन तर्क पर नहीं, इतिहास की नींव पर होता है। अगर देश की 100 करोड़ जनता मुसलमानों से घृणा करने लगेगी, तो उस स्थिति की कल्पना कोई भी कर सकता है। लालू, मुलायम, सोनिया और शीला को उस स्थिति से डर नहीं, क्योंकि उन्हें तो बस 5-10-15 या 20 साल की गद्दी चाहिए। मुसलमानों की क़ौमी गुंडागर्दी बंद होनी चाहिए, नहीं तो इस देश के लिए एक भीषण त्रासदी की भूमिका तैयार होती रहेगी।

गुरुवार, 21 जून 2012

क्यों जरूरी है मोदी का समर्थन


नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहिए। क्यों? क्योंकि उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों में मुसलमानों की सुरक्षा के पर्याप्त उपाय नहीं किया। नीतीश टाइप के सेकुलरिस्ट इसके लिए अक्सर अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों का हवाला देते हैं कि उन्होंने राजधर्म का पालन नहीं किया। बिलकुल सही है। मैं भी ऐसा ही मानता हूं। लेकिन 1984 में कांग्रेसी दंगाइयों को सिखों की हत्या का खुलेआम संदेश देने वाले राजीव गांधी के बारे में अटल जी के क्या विचार हैं? उत्तराखंड की मांग को लेकर अपने लोकतांत्रिक मांगों के समर्थन में आंदोलन कर रहे निरीह और निहत्थे लोगों की हत्या और महिलाओं का बलात्कार करवाने वाले मुलायम यादव के बारे में अटल जी ने कुछ कहा था कि नहीं, पता नहीं। नंदीग्राम में गरीब जनता पर बेइंतहां जुल्म ढाने वाली कम्युनिस्टों की सरकार सेकुलर हैं। अल्पसंख्यकों (मुसलमानों) का इस देश के संसाधनों पर पहला अधिकार बताने वाले मनमोहन सिंह सेकुलर हैं। शराब के नशे में की गई शाहरूख खान की गुंडागर्दी के बाद जब उनपर कार्रवाई की गई, तो लालू यादव ने कहा कि उनको मुसलमान होने के कारण परेशान किया जा रहा है। लालू यादव सेकुलर हैं। मुसलमानी टोपी (स्कल कैप) पहनकार ख़ुद को मुल्ला घोषित करने वाले मुलायम सेकुलर हैं।

ये तमाम सेकुलरिस्ट प्रधानमंत्री बन सकते हैं, मुख्यमंत्री बन सकते हैं। मोदी नहीं बन सकते हैं। क्योंकि मोदी हिंदू साम्प्रदायिक हैं। यानी इस देश में मुस्लिम साम्प्रदायिक (जिन्हें यहां सेकुलर कहा जाता है) तो हर पद पर बैठ सकते हैं, लेकिन हिंदू साम्प्रदायिक नहीं। बस यही एक कारण है, जिसके कारण अपने को हिंदू मानने वाले हर भारतीय को मोदी के लिए खड़े हो जाना चाहिए।

नीतीश ने कम से कम मेरा भ्रम तो खत्म कर ही दिया है। मोदी एक अच्छे प्रशासक हो सकते हैं। लेकिन उन्होंने बहुत बार यह साबित किया है कि उनका अहंकार पार्टी से बड़ा हो गया है। संजय जोशी प्रकरण में उन्होंने यह भी साबित किया कि वह बड़े नेता तो हैं, लेकिन महान नेता नहीं। मैं अब तक इसी उधेड़-बुन में था कि क्या मोदी जैसे अड़ियल और अहंकारी व्यक्ति को सच में प्रधानमंत्री बनना चाहिए। लेकिन अगर इस देश के तमाम मुस्लिम साम्प्रदायिक सेकुलरिस्ट केवल इसलिए मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाहते कि उनमें सत्ता के शीर्ष पर जाने के बाद भी हिंदुत्व के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने का माद्दा है, तो फिर ये हिंदू समाज की जिद होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री तो मोदी ही बनेंगे।

बनेंगे या नहीं बनेंगे... ये तो समय ही बताएगा। लेकिन अब मेरा 110 फीसदी मत मोदी के साथ है। और मैं फिर कहता हूं, कि हर हिंदू (दुर्घटनावश हिंदू घर में पैदा होने वालों से मुझे कुछ नहीं कहना है) को 110 फीसदी समर्थन के साथ मोदी के लिए खड़े हो जाना चाहिए।



मंगलवार, 23 अगस्त 2011

यह इंसान महामूर्ख है या मुसलमानों का शातिर दुश्मन !

किसी एक ग्रुप के भीतर अगर आपको किसी एक व्यक्ति की मिट्टी पलीद करनी हो, तो दो तरीक़े होते हैं। पहला, आप उसके ख़िलाफ़ सही या ग़लत, किसी भी तरह के मसले पर दुष्प्रचार करें और उसे सबके लिए घृणा का पात्र बना दें। लेकिन इस रास्ते के अपने जोखिम हैं। क्योंकि जैसे ही आप किसी के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करना शुरू करते हैं, आपके विरोधी उसके स्वाभाविक मित्र बन जाते हैं और फिर जो तटस्थ होते हैं, वह भी आपके चरित्र का विश्लेषण शुरू कर देते हैं।

तो इस काम के लिए दूसरा तरीक़ा ज़्यादा प्रभावी हो सकता है। आप पहले उस व्यक्ति के मित्र बन जाइए। फिर पूरे ग्रुप को यह भरोसा दिला दीजिए कि आपसे बड़ा उसका कोई शुभचिंतक नहीं है। इसके बाद आप ग्रुप को और उसमें सबसे ज़्यादा सम्मानित व्यक्तियों को अपने 'मित्र' की तरफ से ग़ालियां देना शुरू कर दीजिए और ग्रुप के श्रद्धेय प्रतीकों का अपमान करना शुरू कर दीजिए। कुछ ही दिनों में आपका 'मित्र' पूरे ग्रुप में घृणा का पात्र बन जाएगा।

जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी ने भारत के मुसलमानों की मिट्टी पलीद करने के लिए यही दूसरा रास्ता अपनाया है। उन्हें मुसलमानों का कितना समर्थन और भरोसा हासिल है, ये तो पता नहीं, लेकिन देश की सबसे प्राचीन और विख्यात मस्जिदों मे से एक के इमाम होने के कारण मीडिया और राजनेताओं के दरबार में इन्हें बहुत महत्व दिया जाता है। इनके पूज्य पिताजी ने एक बार सुप्रीम कोर्ट के उनके खिलाफ़ समन जारी करने को चुनौती देते हुए देश के सबसे बड़े न्यायालय को पागल क़रार दिया था और कोर्ट उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका था।

ये मुसलमानों की रहनुमाई का दावा करते हैं और इसी बूते उन्होंने अण्णा के आंदोलन को मुस्लिम विरोधी क़रार देते हुए क़ौम को इससे दूर रहने की सलाह दी है। इनका कहना है कि भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे इस्लाम विरोधी हैं। इनसे कोई पूछे कि आज़ादी की लड़ाई में ये दोनों ही नारे केंद्र में रहे थे। तो क्या भारत की स्वतंत्रता का पूरा आंदोलन भी इस्लाम विरोधी था? बुखारी के इस मूर्खतापूर्ण बयान से क्या मुस्लिम इस देश की मुख्यधारा से कटे हुए नहीं प्रतीत होते हैं? वैसे भी यह कोई मज़हबी आंदोलन तो है नहीं कि इसमें किसी व्यक्ति को पूजा पद्धति के आधार पर अपना रुख तय करने की ज़रूरत हो।

यह आंदोलन विशुद्ध तौर पर एक सामाजिक आंदोलन है। इसलिए कोई भी व्यक्ति जो इसे मुसलमानों, पिछड़ों, दलितों या किसी भी दूसरे वर्ग के आधार पर समर्थन या विरोध का आह्वान कर रहा है, वह उस क़ौम का सबसे बड़ा दुश्मन है। रही भारत माता या वंदे मातरम नारे की बात, तो यह तो निजी विश्वास का मसला है। मैं हिंदू हूं और सनातन काल से यह देश मेरी मां है। यह मुझे मेरी पूजा पद्धति ने नहीं, मेरे खून में हज़ारों साल से बहते मेरे संस्कारों ने सिखाया है। यही खून इस देश के 20 करोड़ मुसलमानों की नसों में भी बह रहा है। चाहे लोभ से या भय से या फिर कुछ अन्य सामाजिक कारणों से, जब इन मुसलमानों के पूर्वजों ने इस्लाम अपनाया, तो उन्होंने अपनी पूजा पद्धति बदली, अपने श्रद्धा केंद्र बदले और प्रेरणा पुरुष बदले, लेकिन उनकी नसों में आज भी अपने हिंदू पूर्वजों का ही खून है। इसलिए यह देश उनकी भी मां ही है।

बुखारी सरीखों का मानना है कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी की इबादत करना कुफ्र है, इसलिए भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे इस्लाम विरोधी हैं। पहली बात तो यह कि किसी की जय करना उसकी इबादत करना नहीं होता है और संस्कृत की प्राथमिक जानकारी रखने वाला भी यह बता देगा कि वंदना का अर्थ हमेशा पूजा के तौर पर नहीं होता है। इसके बावजूद अगर इन दोनों नारों से बुखारी को परेशानी है, तो ये नारे लगाना अण्णा के आंदोलन की कोई पूर्व शर्त नहीं हैं। इससे ऐसे तमाम वामपंथी जुड़े हैं, जो जन्म से भले हों, मन से कत्तई हिंदू नहीं हैं। तो बुखारी मुसलमानों के लिए कुछ नए नारे दे सकते थे। लेकिन वह ऐसा करेंगे नहीं।

इसके बजाए वह मुसलमानों को पूरे देश के सामने खलनायक और देशविरोधी साबित करना चाहते हैं। क्योंकि तभी समाज उनके खिलाफ़ प्रतिक्रिया देगा और केवल तभी वह मुसलमानों को बता सकेंगे कि 90 करोड़ हिंदू तुम्हें खाना चाहते हैं और तुम केवल तभी सुरक्षित रह सकोगे, जब मेरी छत्रछाया में रहोगे। क्योंकि अगर देश का मुसलमान अण्णा के साथ खड़ा हो गया और उसने अपनी मज़हबी पहचान की ज़िद छोड़ दी, तो बुखारी की नेतागिरी का क्या होगा। तो अब गेंद मुस्लिम समाज के पाले में है। उसे ही यह तय करना है कि वह देश की मुख्यधारा में बहने को तैयार है या अपने क़ौम के इस शातिर दुश्मन की गोद में खेलने को। इस सवाल का जवाब तय करेगा कि भारत के भविष्य का इतिहास भारतीय मुसलमानों को किस पन्ने पर रखता है।

सोमवार, 22 अगस्त 2011

मुझे भ्रष्टाचार से कोई प्रॉब्लम नहीं, लेकिन मैं अण्णा के साथ हूं

मेरी उम्र 34 साल है। मेरे पिता बिहार सरकार के तहत ग्रेड-ए अधिकारी थे और एक अत्यंत प्रतिष्ठित और वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त हुए। मैंने जीवन में आर्थिक तौर पर कोई अभाव नहीं देखा। भागलपुर के टीएनबी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान एक-दो बार बेटिकट यात्रा भी की, लेकिन कारण ग़रीबी नहीं, छात्र जीवन की स्वाभाविक अराजक वृत्ति रही। फिर भी, यह भरोसा हमेशा रहा कि अगर टीटीई ने पकड़ा तो उसे रिश्वत देने लायक पैसे हैं। पढ़ाई-लिखाई के बाद पत्रकार बना। तो पहले और अब, जब भी किसी सरकारी विभाग से साबका पड़ा, तो या तो रिश्वत देकर या अपने दूसरे पत्रकार मित्रों के संबंधों के बलपर कभी कोई ख़ास परेशानी नहीं हुई। कुल मिलाकर अगर सार-संक्षेप में कहूं तो अपनी अब तक की ज़िंदगी में मुझे भ्रष्टाचार से कभी समस्या नहीं हुई। उल्टे कहूं, तो भ्रष्टाचार ने मुझे थोड़ी-बहुत सहूलियत ही दी है।

यह कहानी केवल मेरी नहीं है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी भी मध्यवर्गीय व्यक्ति की थोड़ी-बहुत फेरबदल के साथ यही कहानी होती है। यह वर्ग ट्रेन में स्लिपर या एससी थ्री टीयर में चलता है। टिकट न भी हो तो 500 का पत्ता निकाल कर टीटीई साहब को देता है और ऐश से एक बर्थ पर पसर कर चलता है। यह वर्ग लाइसेंस, राशनकार्ड या पासपोर्ट बनवाने जाता है तो एजेंट को एकमुश्त 1000-2000 रुपए थमाता है और उसे सीधे अपने हाथ में पाता है। छोटे-मोटे काम के लिए 100-200 रुपए खर्च करने में उसे कोई परेशानी नहीं होती और यह भ्रष्टाचार कुल मिलाकर उसकी ज़िंदगी थोड़ी आसान कर रहा है।

अब दूसरा वर्ग, जिसे उच्च या इलीट कहा जाता है, उसकी ज़िंदगी पर एक नज़र डालते हैं। इस वर्ग में अमूमन बड़े कारोबारी, सांसद, विधायक और प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी (आईएएस और आईपीएस) आते हैं। यही वर्ग दरअसल भ्रष्टाचार के बड़े हिस्से का जनक और पोषक होता है। नेताजी को चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों रुपए चाहिए होते हैं। बाबू साहब (आईएएस) उन्हें सरकारी तंत्र के छिद्र दिखाते हैं। बाबू साहब और नेताजी मिलकर नीतियों में ऐसी जलेबी छानते हैं जिससे किसी खास कारोबारी घराने या कंपनी के सैकड़ों करोड़ के वारे-न्यारे हो जाते हैं और उसमें से कुछ करोड़ नेताजी और बाबू साहब की झोली में भी आ गिरते हैं। पुलिस का खेल थोड़ा दूसरा है और ये हम सब जानते हैं, इसलिए इसका विस्तार नहीं करूंगा।

अब बचा तीसरा वर्ग, जिसे पिछड़ा, ग़रीब, निम्न मध्य वर्ग आदि-आदि नामों से जाना जाता है। नेताओं के जबानी जमा खर्च में यह वर्ग सबसे प्रीमियम होता है। अपने 15 साल के शासन में सैकड़ों करोड़ के घोटाले करने वाले लालू हों या अपने जन्मदिन पर हीरे के गहनों का भौंडा प्रदर्शन करने वाली बहन जी, इन सबका भाषण ग़रीबों, पिछड़ों और कमज़ोरों से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म होता है। यह वर्ग आपको दिल्ली रेलवे स्टेशन पर अक्सर सैकड़ों की संख्या में जनरल बॉगी के आगे लाइन लगाए दिख जाएगा। कभी इनके साथ यात्रा की है आपने जनरल बॉगी में? आप कर ही नहीं पाएंगे, रहने दीजिए। 16-17 घंटों की यात्रा में कई ऐसे होते हैं, जो 1 मिनट के लिए भी बैठ नहीं पाते।

टॉयलेट तक में लोग और सामान ठूंसे होते हैं, इसलिए लोगों के लिए पूरे रास्ते टॉयलेट तक जाना मुहाल होता है। उस पर जब टीटीई आता है, तो उसका व्यवहार लोगों के साथ ऐसा होता है, जैसे वे इंसान हो ही नहीं। उस टीटीई के साथ 1-2 वर्दीधारी सिपाही भी होते हैं। और आपको शायद विश्वास नहीं होगा, ये दोनों-तीनों मिलकर लोगों के बैग की तलाशी तक लेते हैं और क्योंकि इन्हें पता होता है कि सामने वाला अपनी 6-8 महीने की बचत लेकर घर जा रहा होगा, तो उनसे रुपए तक छीन लेते हैं। यह हक़ीकत है और इसमें एक लाइन भी अतिशयोक्ति नहीं है।

यही वर्ग जब लाइसेंस या राशन कार्ड बनवाने पहुंचता है, तो इसे इस टेबल से उस टेबल तक धक्के खिलाया जाता है, क्योंकि उसके पास रिश्वत देने के पैसे नहीं होते। यही वर्ग पुलिस वालों के डंडे भी खाता है और इलाके में कोई वारदात होने पर थानेदार की गालियां और अपमान भी झेलता है।

लेकिन आश्चर्यजनक तौर पर मीडिया में एक बहस को परवान चढ़ाया जा रहा है कि भ्रष्टाचार विरोधी अण्णा का आंदोलन दलित और पिछड़ा विरोधी है। साफ तौर पर ऊपर जिन वर्गों की बात है, उनका आधार जाति न होकर, पूरी तरह से आर्थक स्थिति है। लेकिन दलित और पिछड़े हितों के पैरोकार होने वालों का ऐसा दावा है कि यह पूरा आंदोलन केवल मेरे जैसे मध्यवर्गीय लोगों को शोशा है और इसमें पिछड़े और दलितों की कोई रुचि नहीं है। और कयोंकि यही लोग हैं, जो यह मानते हैं कि हर पिछड़ा और दलित ग़रीब और बेचारा है, तो हम भी यह मान लेते हैं कि जो तीसरा वर्ग है उसमें ज्यादातर हिस्सेदारी इन्हीं पिछड़े और दलित वर्गों की है।

तो अगर यह देश भ्रष्टाचार मुक्त हो जाए (हालांकि यह एक यूटोपिया है), तो इसका सबसे बड़ा फायदा क्या इसी तीसरे वर्ग को नहीं होगा? अब यह मेरी समझ से तो पूरी तरह बाहर है कि ऐसी बातें कर और माहौल बनाकर दलितवादी स्वार्थी तत्व क्या हासिल करना चाहते हैं। अलबत्ता इतना ज़रूर है कि इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो ख़ुद ही आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं और दलितवाद की मलाई चाभ रहे हैं और कुछ दूसरे चंगू या मंगू हैं, जो फेसबुक और ट्विटर जैसे माध्यमों का इस्तेमाल कर दलितवादी राजनीति की मलाई में अपने लिए हिस्सेदारी ढूंढ रहे हैं।

अण्णा के आंदोलन में विसंगतियां हो सकती हैं। उनकी कुछ या कई मांगें भी अव्यावहारिक हो सकती हैं। लेकिन उनकी सदिच्छा पर इस देश को भरोसा है और यही इस आंदोलन का सार है। देश अगर भ्रष्टाचार मुक्त हो सके या कम से कम यह बीमारी न्यूनतम स्तर पर आ सके, तो इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा उन्हीं को होगा, जिन्हें सदियों से उनके स्वाभाविक अधिकारों से वंचित रखा गया है। जिनके पास भ्रष्टाचार के राक्षस को भेंट करने के लिए चढ़ावा नहीं है और जो अपने न्यायोचित मांगों के लिए सबसे ज़्यादा अपमानित और प्रताड़ित होते हैं।

मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के लिए तो यह आंदोलन देशभक्ति और समाजनिष्ठा का प्रतीक है, लेकिन ग़रीबों एवं कमज़ोरों के लिए यह उनके स्वाभिमान की लड़ाई है, अधिकारों की लड़ाई है और रोज़गार की लड़ाई है। जो भी लोग इसे पिछड़ो और दलितों का विरोधी बता रहे हैं, उनसे बड़ा उनका कोई दुश्मन नहीं है।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

गुजराती आईपीएस अधिकारियों की क्रांति का राज़ क्या है?

गुजरात में 2002 के गोधरा बाद के दंगों ने चाहे मानवता को कभी न मिटने वाले घाव दिए हों, लेकिन इन्होंने देश पर एक बड़ा उपकार भी किया है। देश हर्ष मंदर, संजीव भट्ट, राहुल शर्मा, कुलदीप शर्मा, सतीश वर्मा, आर बी श्रीकुमार, रजनीश राय जैसे प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की एक पूरी फौज से रू-ब-रू हुआ, जो जनहित के लिए पूरी सरकार से टकराने और अपना करियर दांव पर लगाने की हिम्मत रखती है। लेकिन सवाल यह है कि ऐसे अधिकारियों की पीढ़ी केवल गुजरात में ही क्यों पैदा हो रही है?

उत्तर प्रदेश में जीतेंद्र सिंह बबलू, धनंजय सिंह, स्वामी प्रसाद मौर्य, डी पी यादव, कदीर राना और योगेंद्र सागर जैसे जानेमाने जनसेवकों के खिलाफ चल रहे हत्या, बलात्कार जैसे मामलों के सारे मुकदमें पिछले 4 वर्षों में धीरे-धीरे उठा लिए गए हैं (इंडियन एक्सप्रेस पेज 1, 12 अगस्त)। माया सरकार के इन लाडलों के खिलाफ ये केस बनाने के लिए न जाने कितने ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाई होगी और न जाने कितनों ने अपनी जानें गंवाई होंगी। लेकिन इन 4 वर्षों में एक भी आईपीएस या आईएएस अधिकारी की अंतरात्मा नहीं जागी।

पुणे में पुलिसिया गुंडई के दृश्य तीन दिनों से लगातार हम अपने टीवी स्क्रीनों पर देख रहे हैं। वहां एक पुलिस अफसर निशाने लगा-लगा कर खरगोशों की तरह किसानों का शिकार कर रहा था। कुछ टुच्चे पुलिसिए कारों और मोटरसाइकिलों पर गली के गुंडों की तरह डंडे और लात बरसा रहे थे। यह सब बिना राजनीतिक प्रश्रय और संकेत के तो हो नहीं रहा होगा? एक किसान को तो बाक़ायदा पुलिस हिरासत में लेकर गोली मार दी गई- यानी फ़र्ज़ी मुठभेड़। लेकिन किसी आईएएस और आईपीएस अधिकारी का ज़मीर नहीं जाग रहा। इसकी तुलना गुजरात से कीजिए। सोहराबुद्दीन, इशरत जहां और तुलसीराम प्रजापति- पुलिस के हाथों मारे गए ये तीन, सुप्रीम कोर्ट से लेकर कई आईपीएस अधिकारियों के लिए फर्ज़ और अन्याय के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बन गए हैं। इनमें सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति तो घोषित इनामी अपराधी थे। और इशरत जहां के आतंकवादियों से संबंध भी साबित हो चुके हैं।

लेकिन आए दिन इन कथित फर्ज़ी मुठभेड़ों को लेकर सुप्रीम कोर्ट अपनी सक्रियता दिखाता रहता है। कई अति वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जेल में है। अखबारों में सोहराबुद्दीन की एक तस्वीर छपती है, जिसमें वह एक अति पारिवारिक आम शहरी की तरह अपनी पत्नी के साथ ताजमहल के आगे बैठा दिखाया जाता है। दूसरी ओर अपनी पैशाचिक हंसी से न्याय व्यवस्था की हंसी उड़ाने वाला हरियाणा का पूर्व डीजीपी राठौड़ एक किशोरी को आत्महत्या के लिए मज़बूर करने और उसके भाई की ज़िंदगी तबाह करने के बावजूद ज़मानत पाकर मज़े लूट रहा है। किन्हीं माननीय न्यायाधीश की, किसी आईएएस या आईपीएस अफसर की आत्मा नहीं जागती।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 1993 से 2009 के बीच 2,318 लोग पुलिसिया अत्याचार नहीं झेल पाने के कारण हिरासत में मारे गए। हम सब जानते हैं कि पुलिस हिरासत में हुई मौतें कैसे होती हैं। अपनी खाल बचाने के लिए या नियमित सत्कार करते रहने वाले किसी गुंडे या अपने किसी राजनीतिक आका को खुश करने के लिए किसी अपराध के लिए कोई ग़रीब पकड़ लिया जाता है। फिर हवालात में उसे उलटा लटकाया जाता है, उसके हलक में और कभी-कभी तो मलद्वार में भी डंडे डाले जाते हैं, बिजली के झटके लगाए जाते हैं, लातों-जूतों से पिटाई की जाती है और उससे अपराध कबूल करवाया जाता है। इसी पुलिसिया पराक्रम के दौरान कई बार पकड़ा गया आदमी मर जाता है। पूरा पुलिस महकमा, एसपी, एसएसपी, डीजीपी, डीआईजी, आईजी, डीएम और कानून-व्यवस्था से जुड़े सेक्रेटरी (आईएएस) सभी इन घटनाओं से अवगत होते हैं। माननीय न्यायालय को भी सब पता होता है।

लेकिन किसी आईएएस या आईपीएस अफसर की आत्मा नहीं जागती। ख़ास बात यह है कि इन 2,318 लोगों में से 190 मौतें गुजरात में भी हुईं। लेकिन सोहराबुद्दीन, प्रजापति और इशरत की मौतों के लिए रात भर करवटें बदलने वाले गुजरात के कर्तव्यनिष्ठ आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को पुलिस हिरासत में मरते इन ग़रीबों पर कोई दया क्यों नहीं आती?

कारण चाहे जो भी हो, कम से कम दो ऐसे दयावंत, दयालु मानवाधिकारवादियों की कहानी तो हम सब को पता है। एक हैं गुजरात दंगों के समय वहां आईएएस रहे हर्ष मंदर, जो अब देश भर के वामपंथियों और हिंदू विरोधियों के भगवान हो गए हैं। इन्हें नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभियान छेड़ने के एवज़ में देश की सबसे ताकतवर गैर सरकारी संस्था राष्ट्रीय सलाहकार परिषद यानी एनएसी में सदस्यता का तोहफा दिया गया है।

दूसरी मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ हैं। यह बात साबित हो चुकी है कि उन्होंने पैसे देकर बेस्ट बेकरी कांड की मुख्य गवाह को मोदी सरकार के खिलाफ किस तरह इस्तेमाल किया। मोदी के खिलाफ अपने इस अभियान में उन्होंने अपने दुष्प्रचार का प्रोपगेंडा कुछ इस तरह चलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने बेस्ट बेकरी की सुनवाई गुजरात से बाहर करवाने के निर्देश दिए। लेकिन अब उनकी करतूतों का काला चिट्‌ठा सामने आने के बावजूद वह कानून की गिरफ्त से बाहर हैं। उनके एनजीओ को विदेश से मिलने वाले करोड़ों रुपए से उनकी हिंदू विरोधी कारस्तानियां बदस्तूर जारी हैं।

पुणे के किसानों को मारने वाला पुलिसकर्मी हफ्ते भर बाद मीडिया से गायब हो जाएगा, मऊ के दंगों में खुली जीप पर घूमघूम कर कत्लेआम करवाने वाले मुख्तार अंसारी को हर कोई भूल चुका है, थानों में चीखचिल्ला कर दम तोड़ने वाले ग़रीबों की किसी को हवा भी नहीं लगती। लेकिन मोदी का भूत ज़िंदा रहना चाहिए। योंकि इसके बड़े फायदे हैं। इससे सोनिया का वरदहस्त भी मिल सकता है और करोड़ों रुपए का डोनेशन पाने वाले समाजसेवक होने का तमगा भी। तो क्या इसीलिए सारे क्रांतिकारी पुलिस अफसर गुजरात में ही पैदा हो रहे हैं?

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

भाजपा के लिए कहीं दक्षिण का वाटर लू न बन जाए कर्नाटक?

कर्नाटक दक्षिण भारत में भाजपा का वाटर लू तो साबित नहीं होने जा रहा। अगर हो जाए, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए और अगर न हो तो, यही मानना चाहिए कि भाजपा को सचमुच राम का सहारा है। कर्नाटक को दक्षिण भारत का गेटवे मानकर खुश होने वाले भाजपाइयों के लिए तीन सालों का वहां का शासन किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रहा है। एक राष्ट्रीय और कैडर आधारित पार्टी के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में कंठ तक डूबा उसका एक मुख्यमंत्री पिछले करीब साल भर से उसे ब्लैकमेल कर रहा है और वह बेबस, लाचार नजर आ रही है।

लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है? भारतीय दर्शन में लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मार्ग की शुचिता को बहुत महत्व दिया गया है। यह सही है कि आधुनिक भारतीय राजनीति में इस शुचिता की भी अपनी एक सीमा है। लेकिन अगर लक्ष्य केवल सत्ता हासिल करना न हो और आप एक विचारधारा के साथ राजनीति करने का दंभ भरते हों, तो उस सीमा तक की शुचिता तो आपको रखनी ही चाहिए। अगर आप नहीं रखेंगे, तो आपका हश्र वही होगा, जो कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी का हुआ है। साल 2008 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले कर्नाटक में सत्ता के मुहाने पर बैठी भाजपा के धैर्य का बांध टूट गया और उसने घोषित तस्करों, रेड्‌डी बंधुओं को अपनी गोद में बिठा लिया। ये रेड्‌डी बंधु, जिनका किसी राजनीतिक दल या विचारधारा से किसी तरह का कोई सरोकार नहीं था और जो पूर्ववर्ती सरकारों में मंत्री बन कर राज्य में लूट का तंत्र चला रहे थे, एकाएक भाजपा के प्रिय हो गए। बेल्लारी उनका चारागाह था और सुषमा स्वराज ने वहां से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा था। अब सुषमा जी को रेड्‌डी बंधुओं की कौन सी सेवाएं मिली थीं, यह तो वही जानें, लेकिन जिन भ्रष्ट स्मगलरों की कारस्तानी कर्नाटक के बच्चे-बच्चे को पता थी, उन्हें सार्वजनिक तौर पर अपना भाई और प्रिय बताकर सुषमा जी ने भाजपा की वैचारिक प्रतिबद्धता की जड़ों में मट्‌ठा डाल दिया।

यह बहुत ही रोचक घटनाक्रञ्म है। करीब साल भर पहले इन्हीं रेड्‌डी बंधुओं ने येद्दयुरप्पा को खून के आंसू रुलाए। येद्दयुरप्पा ने रेड्‌डी बंधुओं की लूट पर अंकुश लगाई और उन तीनों भाइयों ने अकूत संपत्ति के बल पर खरीदे विधायकों के बूते मुख्यमंत्री को इस्तीफे के लिएम जबूर कर दिया। पार्टी हाईकमान आंखों पर पट्‌टी डाल कर सोया रहा। सुषमा जी ने अपने मुख्यमंत्री की जगह स्मगलर भाइयों को गले लगाया। फिर येद्दयुरप्पा भागे-भागे दिल्ली आए। दिल्ली में बैठे भाजपा नेताओं ने साफ कर दिया कि रेड्‌डी बंधु नाम के कैंसर से छुटकारा पाने का उनका कोई इरादा नहीं है। अत्यंत अपमानजनक परिस्थितियों में येद्दयुरप्पा को रेड्‌डी बंधुओं से समझौता करना पड़ा।

उनके लोगों को, जिन्हें मंत्रिमंडल से निकाला गया था, फिर से शामिल करना पड़ा। क्या उसी समय भाजपा को रेड्‌डी बंधुओं को पार्टी से चिपकाने की अपनी गलती का सुधार नहीं करना चाहिए था? सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लंबी अवधि की राजनीति करने वाली एक राष्ट्रीय पार्टी एक सरकार के लिए अपनी मूलभूत जमीन कमजोर करने का जोखिम कैसे ले सकती है? लेकिन भाजपा ने यह जोखिम लिया। येद्दयुरप्पा को राजनीति का समीकरण समझ में आ गया। उसके बाद साल भर में उन्होंने अपने विधायकों को क्या घुट्‌टी पिलाई, किस तरह के फायदे दिए, किस तरह की छूट दी कि पूरा मामला पलट गया। आज कर्नाटक के 60 विधायक उनके साथ आंसू बहाने को तैयार हैं। यह ठीक है कि ये सभी उनके लिंगायत समुदाय से ही हैं। लेकिन ये लोग साल भर पहले भी तो लिंगायत ही थे।

अब एक नजर येद्दयुरप्पा के इतिहास पर भी डालिए। साल 2004 विधानसभा चुनाव में भाजपा को 79 सीटें मिलीं और वह विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी। लेकिन कांग्रेस ने जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बनाया। मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे येद्दयुरप्पा इतने मायूस और हतोत्साहित हुए कि उन्होंने भाजपा छोड़ने का फैसला कर डाला। जेडीएस के एच डी देवेगौड़ा और उनके बेटे कुमारस्वामी के आगे मत्था टेकने पहुंच गए। हालांकि बाद में भाजपा ने उन्हें रोकने में सफलता पा ली, लेकिन 2008 के चुनावों में ऐसे नेता को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करना क्या वैचारिक दिवालियापन नहीं था। जब येद्दयुरप्पा का असली चरित्र सामने आ चुका था, तो क्यों नहीं पार्टी ने अगले चार साल में एक नया नेता तैयार किया जिसकी अगुवाई में चुनाव लड़ा जा सके?

ये वो सवाल हैं, जिन पर भाजपा को विचार करना होगा और इनके जवाब खोजने होंगे। कर्नाटक की घटनाओं का राज्य और देश में भाजपा की राजनीति पर चाहे जो असर हो, लेकिन देश के लोगों के मन में इन घटनाओं को जो असर हो चुका है, उसे धुलने में वर्षों लग जाएंगे। यह कीमत निश्चित तौर पर पांच साल तक कर्नाटक की सरकार चलाने के फायदों के मुकाबले बहुत ज्यादा है।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

देश को आज सबसे ज़्यादा ख़तरा किससे है- बालकृष्ण से?

रामदेव के शिष्य बालकृष्ण आज की तारीख में देश के सामने कानून-व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश में तीन-तीन मेडिकल अफसरों की हत्या, विदेशी बैंकों में पड़े हजारों या लाखों करोड़ रुपए की काली रकम, मुंबई में हुआ ताजातरीन आतंकवादी हमला- सब पृष्ठभूमि में चले गए हैं। रोज बालकृष्ण के बारे में नई-नई खबरें आ रही हैं। उन्होंने नकली पासपोर्ट बनवाया, रिवॉल्वर खरीदा, पिस्तौल खरीदा और पता नहीं क्या-क्या। लेकिन बालकृष्ण के बारे में ये सारी सच्चाइयां सरकार के खिलाफ रामदेव के मोर्चा खोलने के बाद ही क्यों सामने आईं?

यह समझना मुश्किल नहीं है। हां, यह समझना मुश्किल जरूर है कि लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित कोई सरकार इस हद तक निर्लज्ज कैसे हो सकती है। इस पूरे प्रकरण से कोई एक बात सबसे साफ तौर पर साबित हुई है, तो वह यही है कि देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई की कोई संवैधानिक निष्ठा नहीं है और वह बस सरकार के दरवाजे पर बैठा एक पालतू कुत्ता है, जिसका काम केवल सरकार के इशारे पर दुम हिलाना, भौंकना और समय पड़ने पर काटना है।

चार साल पहले ठीक इसी तरह का एक और मामला सामने आया था। असम के तेजपुर से कांग्रेस सांसद एम के सुब्बा पर आरोप लगे कि वह नेपाल के नागरिक हैं और फर्जी तरीकों से उन्होंने भारत की नागरिकता हासिल की। सीबीआई जांच करती रही और सुब्बा भारतीय संसद की शोभा बढ़ाते रहे। चार साल की जांच के बाद जनवरी 2011 में जाकर आखिरकार सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल किया जब सुब्बा पहले ही पांच साल तक सांसद होने की सारी शक्तियों, अधिकारों और फायदों का लाभ उठा चुके थे। आरोप पत्र में सुब्बा के नेपाली नागरिक होने की पुष्टि कर दी गई। लेकिन इसके बावजूद सुब्बा आज भी भारतीय नागरिकता के मजे लूट रहे हैं।

इसकी तुलना बालकृष्ण के मामले से कीजिए। मई की शुरुआत में रामदेव की सरकार से भिड़ंत हुई। और तीन महीने बीतते-बीतते बालकृष्ण की गिरफ्तारी के लिए सीबीआई ने पैर पटकने शुरू कर दिए। उससे पहले तक बालकृष्ण की लिखी चिट्‌ठी दिखाते सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों से कोई पूछे कि पिछले कई सालों से, जब बालकृष्ण सार्वजनिक सभाओं में और टीवी चैनलों पर अपने आयुर्वेद ज्ञान का प्रदर्शन कर रहे थे, तब सरकारी मशीनरी को क्यों इस बात का इल्म नहीं हो सका कि बालकृष्ण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे हैं?

लेकिन इस सरकार से किसी तरह के जवाब की उमीद करना ही व्यर्थ है। बिना चेहरे, बिना जवाबदेही और बिना दिशा वाली इस सरकार की कमान एक ऐसी महिला के हाथ में है, जिसे चारणों और चाटुकारों से घिरे रहने की आदत हो, जिसने खुद कभी किसी सरकारी फैसले के लिए कोई जवाबदेही न ली हो, जो रिमोट कंट्रोल से शासन करने में विश्वास रखती हो और दिग्विजय सिंह जैसे निम्नस्तरीय नेता जिसके सबसे बड़े औज़ार हों, उससे आप क्या उमीद-कर सकते हैं। मत भूलिए कि इटली की इसी अंडर ग्रेजुएट के पीएम इन वेटिंग लाडले को आरएसएस जैसे संगठन लश्करे तोएबा से ज्यादा ख़तरनाक लगते हैं। तो अगर बालकृष्ण अगर आज इस देश की सबसे बड़ी समस्या हैं, तो इसमें आश्चर्य क्या है।

बुधवार, 1 जून 2011

बाबा रामदेव को शीर्षासन की ज़रूरत है

बाबा जी का कहना है कि क्योंकि प्रधानमंत्री 121 करोड़ लोगों का प्रतिनिधि होता है, इसलिए उसे एक अफसरशाह (यानी लोकपाल) के प्रति जवाबदेह नहीं बनाया जा सकता है। मेरे मन में बाबा जी की भलमनसाहत पर दो सवाल उठ रहे हैं। पहला, क्या सचमुच अपने देश में प्रधानमंत्री पूरी जनसंख्या का प्रतिनिधि होता है? क्या गुजराल, देवेगौड़ा और जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड अपने नाम करने जा रहे मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जनता ने अपना प्रधानमंत्री चुना है?

निश्चित तौर पर नहीं चुना है, बल्कि मनमोहन सिंह को तो किसी संसदीय क्षेत्र की जनता तक ने नहीं चुना है। लेकिन इस तर्क के तमाम विरोधी हो सकते हैं, जो यह साबित कर देंगे कि यहां तक कि नेहरू, इंदिरा गांधी, वी पी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी (जिनकी पार्टियों को वोट देने वाले वस्तुत: उन्हें ही प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट करते थे) जैसे प्रधानमंत्री भी देश की जनता के कुल मत का 50 फीसदी तक नहीं पा सके थे। इसलिए इस सवाल को फिलहाल बहस के लिए ठंडे बस्ते में डाल देते हैं कि भारत का प्रधानमंत्री वास्तव में देश की जनता का कितना प्रतिनिधि होता है या नहीं।

अब दूसरा सवाल, क्या किसी को केवल इसीलिए लोकपाल के प्रति जवाबदेह नहीं होना चाहिए कि उसे जनता ने चुना है। तब तो एक थाना प्रभारी की उस क्षेत्र के सांसद या विधायक के सामने कानूनी तौर पर कोई हैसियत नहीं होना चाहिए। उसी तरह राज्य के लोकायुक्त को मुख्यमंत्री का चपरासी होना चाहिए और देश के मुख्य न्यायाधीश को प्रधानमंत्री का चारण होना चाहिए। प्रस्तावित लोकपाल को एक अफसरशाह बताना मूर्खता की हद है। इस लिहाज से तो मुख्य चुनाव आयुक्त भी एक अफसरशाह हैं और सेबी के प्रमुख और भारतीय रिज़र्व बैक के गवर्नर भी अफसरशाह हैं।

क्या बाबा रामदेव भूल गए कि अभी कुछ ही महीने पहले एक भ्रष्ट आरोपी को किस निर्लज्जता के साथ मुख्य सतर्कता आयुक्त की कुर्सी पर बैठाने के लिए हर संभव कोशिश की गई थी। और वह कोशिश और किसी ने नहीं, 121 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि, घनघोर इमानदार डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने सिपहसालार पी चिदंबरम के साथ मिलकर की थी। हद तो यह कि पकड़े जाने पर सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने सफेद झूठ यह कहा कि उन्हें थॉमस पर लंबित आरोपों की जानकारी ही नहीं थी, जबकि थॉमस के चयन के लिए हुई तीन सदस्यीय पैनल की बैठक में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने साफ तौर पर इस मुद्दे को उठाया था।

ख़ैर, लौटते हैं बाबा रामदेव के उसी तर्क की ओर। तो अगर 121 करोड़ लोगों का प्रतिनिधि इमानदारी का पुतला होता है, तो 20 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि रहे मुलायम यादव और मायावती चोर कैसे हो सकते हैं। तो उनके खिलाफ चलने वाले आय से ज्यादा संपत्ति बटोरने और ताज कॉरिडोर घोटाले का मामला भी तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। 15 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि रहे लालू पशुओं का चारा नहीं खा सकते और तमिलनाडु के कुछ करोड़ लोगों के प्रतिनिधि करुणानिधि का कुनबा 2जी की नीलामी में सैकड़ों करोड़ नहीं डकार सकता। फिर तो इस तर्क से हर सांसद, हर विधायक, हर पार्षद और वार्ड सदस्य और हर निर्वाचित प्रतिनिधि कानून के दायरे से बाहर होना चाहिए। क्या बेवकूफ़ी भरा तर्क है?

यहां मामला निर्वाचित प्रतिनिधियों के किसी एक अफरसशाह के प्रति जवाबदेह होने का नहीं हैं। मामला है उस निर्वाचित प्रतिनिधि के देश और संविधान के प्रति जवाबदेह होने का। चाहे वह लोकपाल हो, कोई न्यायाधीश हो या कोई भी नियामक- वह कोई व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह एक संस्था होता है, जिसमें संविधान की शक्तियां निहित होती हैं। रामदेव का यह तर्क ठीक है कि भ्रष्ट तो लोकपाल भी हो सकता है। तो उसके लिए ज़रूरी उपाय किए जाने चाहिए। संविधान निर्माताओं ने चेक्स एंड बैलेंसेज के जिस सिद्धांत पर जवाबदेहियों का निर्धारण किया था, उसमें किसी व्यक्ति और संस्था को अवध्य नहीं माना गया। इसीलिए कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका सबको एक-दूसरे पर अंकुश रखने के कुछ अधिकार दिए गए।

अब आज़ादी के छह दशकों बाद वे चेक्स एंड बैलेंसेज नाकाफी साबित हो रहे हैं। भ्रष्टाचार का ज़हरीला पानी नाक के ऊपर से बह रहा है और इसके लिए तत्काल कुछ किए जाने की ज़रूरत है। लोकपाल का प्रयोग कितना सफल होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन इसके अधिकारों को लेकर सरकार की ओर से जो चालबाजियां की जा रही हैं, वह अपने आप में इसके प्रभावी हो सकने का संकेत है।

यह समझने के लिए कोई वैज्ञानिक होना ज़रूरी नहीं है कि भ्रष्टाचार का मूल सत्ता और ताक़त है। जहां अधिकार और शक्तियां हैं, वहीं से भ्रष्टाचार का जन्म होता है। इसलिए इस पर सबसे क़रारा प्रहार भी सत्ता के शीर्ष से ही होना चाहिए। भूखों, नंगों और ज़िंदगी की जद्दोज़हद में पानी-पानी हो रहे लोगों पर तो कानून का डंडा चलाइए और विधायकों, सांसदों, मंत्रियों और सबके मुखिया प्रधानमंत्री को आरती दिखाइए। और फिर सपना देखिए एक भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का। ऐसे सपने देखने वालों को अपनी सोच की दिशा सीधी करने के लिए सिर के बल खड़ा होने की ज़रूरत है, चाहे वह योग गुरू बाबा रामदेव ही क्यों न हों।

सोमवार, 17 जनवरी 2011

जंगपुरा और पुष्प विहार में अंतर के नतीजों से डरिए

12 जनवरी, दिन बुधवार। दिल्ली के दो अलग-अलग हिस्सों में दो अवैध पूजा स्थलों को ढहाया गया। जंगपुरा में एक मस्जिद ज़मींदोज की गई और पुष्प विहार में एक मंदिर गिराया गया। लेकिन हमारे समाज और राजनीति पर इन दोनों घटनाओं के असर में फ़र्क था। आइए, इसके बाद हुई घटनाओं की कड़ी से इस अंतर को देखा जाए।

अगले दिन यानी 13 जनवरी को राजधानी के लगभग तमाम अखबारों में मस्जिद गिराए जाने की ख़बर पहले पेज पर थी। होना लाज़िमी भी था। सुबह 6 से 9.30 बजे तक मस्जिद गिरी और 11.30 बजे जामा मस्जिद के शाही इमाम वहां पहुंच गए। हज़ार से ज़्यादा की संख्या में मुस्लिम वहां इकट्ठे हो गए। स्थानीय विधायक (जो कि एक ग़ैर मुस्लिम हैं) अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ मुसलमानों के ख़िलाफ हुए इस अत्याचार पर आवाज़ बुलंद करने वहां पहुंच गए। दो और विधायक, मटिया महल के शोएब इक़बाल और ओखला के आसिफ़ मोहम्मद ख़ान वहां आ गए। ज़ाहिर है, वह जनप्रतिनिधि होने के नाते नहीं, बल्कि मुसलमान होने के नाते अपना फर्ज़ अदा करने पहुंचे थे। बात यहीं नहीं थमी।

मस्जिद ढहने के बाद की पहली नमाज पास के थाने में पढ़ी गई। बाद के नमाज के लिए हज़ारों मुसलमान गिराई गई मस्जिद की जगह की ज़िद करने लगे, जो कि उन्हें बाद में दे दी गई। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और अपने नाम के आगे मुल्ला जुड़वाने के शौक़ीन मुलायम सिंह यादव ने उसी दिन घटनास्थल पर पहुंच कर घोषणा की कि यह मुसलमानों पर ज़ुल्म है। दिल्ली की मुख्यमंत्री कैसे पीछे रहतीं? वह भी भागी-भागी पहुंची। अल्पसंख्यकों के साथ हुए इस अत्याचार पर आंसू बहाया। फिर अगले दिन शाही इमाम के दरवाज़े पर मत्था टेकने जामा मस्जिद पहुंचीं। आधे घंटे की बैठक के बाद शाही इमान ने सच्चे देशभक्त की तरह मुसलमानों से शांति बरतने की अपील की और उन्हें बताया कि मस्जिद फिर वहीं बनेगी।

शीला जी ने उनसे वादा किया है कि पहले जिस ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा कर मस्जिद बनाई गई थी, उसे अब सरकार अपने खर्चे से (मतलब आम लोगों के खर्चे से) ख़रीद कर वक्फ़ बोर्ड को सौंपेगी। नतीजा- घटनास्थल पर मौजूद मुस्लिम श्रद्धालुओं ने डीडीए द्वारा बनाई गई चहारदिवारी ढाह दी और घटनास्थल पर एक अस्थाई मस्जिद बना दी गई। 12 जनवरी को मस्जिद तोड़े जाने के बाद से अब तक वहां हज़ारों मुसलमान मौजूद हैं और हर समय की नमाज मिलकर अदा कर रहे हैं।

अब दूसरी घटना। पुष्प विहार का मंदिर गिराए जाने के बाद न कोई पत्ता हिला, न कंकड़ गिरा। एक अवैध इमारत को ढहाने की घटना को वहां के पूरे हिंदू समाज ने सहर्ष स्वीकार किया। नतीजतन, अखबार और टीवी के लिहाज से कोई ख़बर ही नहीं बनी। लेकिन जंगपुरा में हो रहा खेल जब अखबारों की सुर्खियां बन रहा हो, तो स्वाभाविक तौर पर राहुल गांधी के शब्दों में लश्कर-ए-तोएबा से भी ख़तरनाक कट्टर हिंदुओं पर कुछ करने का दबाव तो बना ही होगा। तो फिर शनिवार को पुष्प विहार में सड़कों पर जाम लगा। बीआरटी भी जाम की गई।

रविवार को इंडियन एक्सप्रेस ने पांचवें पन्ने पर दो कॉलम में यह ख़बर लगाई, तो मुझे भी पहली बार पता चला कि पुष्प विहार में चार दिन पहले कोई मंदिर भी तोड़ा गया था। लेकिन इस खबर में एक ख़ास बात थी। जंगपुरा में इकट्ठा होने वाले, विरोध करने वाले और नारे लगाने वाले मुसलमान थे। पुष्प विहार मंदिर के लिए जमा होने वाले भाजपाई थे, विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस वाले थे। वहां कोई हिंदू नहीं था। जंगपुरा की जंग मुसलमानों की जंग है, लेकिन पुष्प विहार का विरोध भाजपाइयों और संघियों का पार्टी कार्यक्रम है।

हिंदुओं का न कोई सेकुलर शाही इमाम है, न कोई स्थानीय विधायक, न शोएब इक़बाल हैं, न आसिफ़ मोहम्मद ख़ान। न ही बगल के राज्य से भागा-भागा आने वाला कोई मुल्ला मुलायम है और न ही राज्य की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। हिंदुओं के लिए खड़े होने वाले केवल वही मुट्ठी भर लोग हैं, जो चिदंबरम जी और दिग्विजय सिंह की नज़र में हिंदू आतंकवादी हैं और राहुल गांधी की नज़र में पाकिस्तान की सेना से संचालित होने वाले लश्कर से भी ख़तरनाक हैं।

क्योकि इस देश के कम्युनिस्टों की आंखों पर तो हिंदू विरोध का पट्टी पड़ी है, इसलिए उनसे जागने की उम्मीद व्यर्थ है। लेकिन इन मुट्ठी भर बौद्धिक विकलांगों के अलावा जो देश की 98 फीसदी से ज्यादा आबादी है, उससे ज़रूर इस तरह की घटनाओं के निहितार्थ समझने की उम्मीद की जा सकती है। इस देश का मुसलमान देशभक्त है और मुख्यधारा के साथ चलना चाहता है, लेकिन इमाम, इक़बाल, ख़ान, मुलायम और शीला जैसों की दुकानदारी चलते रहने के लिए ज़रूरी है कि वह कूपमंडुक बना रहे और पूरे देश में उसकी छवि कट्टरपंथी और कानून के दुश्मन की बने। क्योंकि अगर ऐसा होगा, तभी बहुसंख्यक हिंदुओं के भीतर उसकी प्रतिक्रिया होगी, सुनील जोशी और असीमानंद जैसे नाम पैदा होंगे (यह मानते हुए कि वह दोषी हैं) और जब ऐसा होगा, तभी फिर उन्हें हिंदुओं का भय दिखा कर अपनी दावत चलती रहेगी।

अगर किसी को इस सिद्धांत में कोई अतिशयोक्ति दिखती हो, तो वह अपने दो बच्चों या घर के दो सदस्यों के बीच यही प्रयोग(जंगपुरा और पुष्प विहार के अंतर का) दुहरा कर देख ले। वे तमाम हिंदू, जिन्हें बम विस्फोटों के मामलों में आरोपी बनाया गया है, एक ही गुट के हैं। मतलब अगर ये सारे आरोप सही भी हैं, तो ये हिंदू समाज के स्वभाव में आ रहे किसी बदलाव का संकेत नहीं करते। लेकिन कल्पना कीजिए, अगर वास्तव में चिदंबरम, दिग्विजय और राहुल गांधी की राजनीतिक बयानबाजी सच साबित हो जाए, तो भारत को पाकिस्तान बनने में कितना समय लगेगा, जहां अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक कानून का विरोध करने वाले (न कि उन्हें विशेष सुविधाएं देने की मांग करने वाले) गवर्नर की हत्या करने वाले पर फूल बरसाने वालों में पुलिसवाले और वकील तक शामिल थे।

इसलिए अगर आप इस देश के मुसलमानों के हितचिंतक हैं, तो जंगपुरा और पुष्प विहार का अंतर ख़त्म किए जाने के लिए आवाज़ उठाइए। लेकिन अगर आपको केवल राजनीति करनी है, तो कीजिए, लेकिन फिर इस ग़लतफ़हमी में मत रहिए कि इस आग की लपटों से आपका घर और आपके बच्चे बच जाएंगे।

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

हम सब माओवादी हैं, लेकिन...

बिनायक सेन को उम्रक़ैद की सज़ा सुनने के बाद उनकी पत्नी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अवसाद भरा दिन है। यह प्रतिक्रिया थोड़ी अजीब है। माओवाद और चाहे जिस भी तरह की समाजसेवा कर रहे हों, कम से कम देश में लोकतंत्र की जड़ें तो मज़बूत नहीं ही कर रहे हैं। अगर बिनायक सेन की पत्नी को लोकतंत्र की चिंता है, तो इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि शायद एक ग़ैर सरकारी संगठन चला रहे सेन छत्तीसगढ़ सरकार के माओवाद विरोधी उत्साह का मिथ्या शिकार बन रहे हों। आख़िर अपने देश में पुलिस महकमे की सबसे बड़ी विशेषताओं में किसी को कहीं भी और किसी भी अपराध के लिए जेल में डाल देना और फिर उसका अपराध साबित करना भी शामिल है ही। लेकिन फिर सेन के समर्थन में खड़े होने वालों और धरना-प्रदर्शन करने वालों की लिस्ट पर नज़र जाते ही, उनके निर्दोष होने की कहानी का पोपलापन सामने आने लगता है। सेन के मित्र वही लोग हैं, जो माओवादियों के मारे जाने पर मानवाधिकार की दुहाई देने लगते हैं और माओवादी हिंसा को वंचितों और अन्याय के शिकार हुए लोगों की क्रांति कह कर जश्न मनाते हैं। तो दाल में कुछ काला लगना स्वाभाविक है।

फर्ज़ कीजिए की आपके बुज़ुर्ग पिताजी अपने पेंशन का चेक लेने जाएं और वहां क्लर्क 20 मिनट तक केवल इसलिए उन्हें लाइन में खड़ा रखे क्योंकि तेंदुलकर का शतक पूरा होने वाला था और वह क्रिकेट का दीवाना है, तो आप क्या करेंगे। क्या आपका खून नहीं खौलेगा और आपका मन नहीं होगा कि उस क्लर्क के मुंह में कालिख पोतकर, उसका सर मुंडा कर उसे पूरे शहर में घुमा देना चाहिए। अगर आप किसी मंत्री के बेटे या बेटी नहीं है, आपका कोई नज़दीकी संबंधी कहीं का सांसद, विधायक, डीएम, एसपी कोई अन्य प्रशासनिक अधिकारी नहीं है, तो मेरा दावा है कि आपने कम से कम एक दर्ज़न बार तो अपने किसी दोस्त या परिवार में यह प्रतिक्रिया ज़रूर दी होगी कि अमुक अधिकारी या क्लर्क या ड्राइवर या दुकानदार या डॉक्टर या इंजीनियर को चौराहे पर फांसी दे देनी चाहिए। आम लोगों की यह सबसे आम प्रतिक्रिया है, जो व्यवस्था के प्रति उनका गुस्सा व्यक्त करने के काम आता है। माओवादी आम आदमी के इसी गुस्से को अंजाम तक पहुंचाते हैं। बहुत अच्छा काम करते हैं।

माओवादियों के तमाम समर्थक यहीं तक आकर रुक जाते हैं। लेकिन कहानी यहां से आगे बढ़ती है। माओवादी संगठन बनाते हैं और संगठन चलाने के लिए पैसा चाहिए होता है। पैसा ग़रीब किसान और मज़दूर नहीं दे सकते। तो उसके लिए कारोबारियों, ठेकेदारों और वेतनभोगियों की ज़रूरत होती है। अब कोई भी कारोबारी, ठेकेदार या वेतनभोगी अपनी मेहनत की कमाई में से माओवादियों को टैक्स तो दे नहीं सकता। तो, फिर वह अपने-अपने धंधों में बेइमानी करता है। और एक बार फिर कारोबारी, ठेकेदार, इंजीनियर या डॉक्टर की बेइमानी का अंतिम शिकार वहीं ग़रीब किसान और मज़दूर होते हैं, जिन्हें न्याय दिलाने के लिए माओवादियों ने इस सारी कहानी की शुरुआत की थी। तो, यहीं आकर मेरे अंदर का माओवादी भी मर जाता है। क्योंकि व्यक्तिगत तौर पर अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति जहां मुझे अपील करती है, वहीं संगठन बनाकर राज्य को चुनौती देने का सैद्धांतिक आवरण मुझे डराता है।

इसमें दोष माओवादियों का ही नहीं है, यह तो संगठन का विज्ञान है। चाहे कथित खालिस्तान आंदोलन के नेता हों या कश्मीरी आतंकवाद के अगुवा या फिर उल्फा के अलंबरदार- सब ने करोड़ों की व्यक्तिगत संपत्तियां खड़ी की हैं और यह कोई गुप्त सूचना नहीं है। माओवादियों के प्रेरणा पुरुष नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड से पूछिए। सरकार को हर शोषण एवं अन्याय का मूल कारण बताकर और पूंजीवाद के जुमले गढ़ कर बिना जवाबदेही के अपहरण, हत्याएं और दूसरी आपराधिक गतिविधियां करना तो बहुत आसान है, लेकिन जब ख़ुद उन्हें ही देश का शीर्ष पद दे दिया गया तो वह निरर्थक विवाद पैदा करने और चीन के तलवे चाटने के अलावा कुछ नहीं कर सके। आजकल वह फिर आतंकवादी रास्तों पर लौटने की भूमिका तैयार कर रहे हैं।

मेरा यह सुविचारित मत है कि जंगल में घूमने वाले माओवादियों से ख़तरनाक क़ौम शहरों में रहने वाले कथित बुद्धिजीवी माओवादी हैं। बिनायक सेन की सज़ा पर एमनेस्टी इंटरनेशनल के लंदन कार्यालय से जताई गई चिंता की भाषा और तेवर देखिए। आपको समझ में आ जाएगा कि इन मानवाधिकार की आड़ में माओवाद बेच रहे ये कथित बुद्धिजीवी कितने ख़तरनाक हैं। गिलानी के साथ गलबहियां कर कश्मीर में भारतीय शासन को दुनिया का सबसे क्रूर और दमनकारी शासन बताने वाली अरुंधति राय इसी ख़तरनाक क़ौम का एक सिरा हैं। इसलिए जंगल को माओवादियों के सफाए से पहले इन शहरी माओवादियों को नकेल डालना बहुत ज़रूरी है, या कहें कि माओवाद पर विजय की पूर्व शर्त है। सवाल यह है कि रमन सिंह की सरकार की तरह क्या मनमोहन सिंह की सरकार भी इस पूर्व शर्त को पूरा करने का हिम्मत और इच्छा शक्ति रखती है।